06/09/2026
बदलाव का नाम, या सिर्फ नाम का बदलाव? 📍जारी बाजार, प्रयागराज (इलाहाबाद)
तस्वीर इलाहाबाद के जारी बाजार की है। यह वही ऐतिहासिक शहर है, जिसे कागज़ों में बदलकर 'प्रयागराज' बना दिया गया। दावे किए गए थे कि नाम बदलते ही विकास की ऐसी बयार बहेगी कि लंदन, पेरिस और फ्रांस जैसे शहर पीछे छूट जाएंगे। लेकिन धरातल की हकीकत यह है कि कब्रिस्तान तक जाने के लिए भी लोगों को एक टूटी-बिखरी पुलिया के सहारे अपनी जान जोखिम में डालनी पड़ रही है।
चुनाव आते हैं, बड़ी-बड़ी तकरीरें होती हैं, वादों के आसमान सजाए जाते हैं। इस इलाके के जनप्रतिनिधि—चाहे पार्षद हों, विधायक हों या सांसद—वोट समेटकर अपना उल्लू सीधा कर चुके हैं और जनता के हाथ सिर्फ अनदेखी आई है। जब अंतिम सफर के रास्ते भी बदहाल हों, तो समझ आ जाता है कि 'तरक्की का परचम' किस हद तक बुलंद हुआ है।
एक बार फिर इलेक्शन की आहट है। फिर से वही भाषण, वही वादे और वही मंच सजेंगे। सवाल यह है कि क्या इस बार भी जनता सिर्फ खोखले भाषणों पर ताली बजाएगी या अपने हक, सड़क और बुनियादी सुविधाओं पर जवाब मांगेगी?
अपने हक के लिए आवाज़ उठाइए, इस पोस्ट को ज्यादा से ज्यादा शेयर कीजिए ताकि सोई हुई व्यवस्था तक जनता का दर्द पहुंचे।