06/08/2026
#किसके_लिए_कमा_रहे_हो?
दिन-रात भाग-दौड़ करके, नींदें उड़ाकर और अपनों को समय न देकर आखिर यह बेहिसाब धन-दौलत किसके लिए जमा की जा रही है?शहर के बड़े व्यापारियों में गिने जाने वाले एक बुजुर्ग अपने अंतिम दिन एक वृद्धाश्रम के कमरे में बिता रहे थे। पूरी ज़िंदगी की गाढ़ी कमाई लगाकर उन्होंने अपनी बेटियों को पढ़ा-लिखाकर समाज में बड़े पदों तक पहुँचाया। जब एक दिन आश्रम से बेटियों को पिता के शांत हो जाने की सूचना दी गई, तो वहाँ से संवेदना की जगह एक बेहद व्यावहारिक जवाब आया। दूरियाँ इतनी बढ़ चुकी थीं कि अंतिम दर्शन के लिए आने के बजाय तुरंत कुछ रुपए ऑनलाइन ट्रांसफर कर दिए गए और संदेश आया—"अंतिम संस्कार वहीं कर दीजिए, हमारा आना संभव नहीं है।"श्मशान घाट पर जब चिता सजाई गई, तो मोबाइल पर एक वीडियो कॉल की घंटी बजी। बेटियाँ स्क्रीन के उस पार से अपने पिता का अंतिम संस्कार देख रही थीं। जिन हाथों को थामकर कभी उन्होंने चलना सीखा था, आज उन्हीं पिता को अंतिम विदाई देने के लिए उनके पास कुछ मिनटों की फुर्सत नहीं थी।इसीलिए, केवल पैसा कमाने और डिग्रियाँ दिलाने की अंधी दौड़ में मत भागिए। पैसा कमाने के साथ-साथ अपने बच्चों को नैतिकता, अच्छे संस्कार और जीवन के वास्तविक मूल्य भी ज़रूर सिखाएँ। अगर वे सही संस्कार नहीं सीखेंगे, तो याद रखिए—एक दिन अंत में आपके अपने भी साथ छोड़ देंगे, और पीछे रह जाएगी तो बस यह खोखली तरक्की और डिजिटल औपचारिकताएँ