12/08/2023
"सख्त कार्यवाही की मांग" (कहानी)
लेखक- गोपाल कृष्ण वाणी इंदौर
बुद्धि चंद जी - बस्ती में सबसे ज्यादा प्रभावशाली व्यक्तित्व।अपने सिद्धांतोंं ,आदर्शो और न्याय प्रियता के साथ साथ सख्त मिजाज के कारण वे दूर-दूर के गांवों में भी प्रतिष्ठित एवं लोकप्रिय थे। यह अलग बात है कि उनका मंदबुद्धि पुत्र टप्पू अपनी हरकतों से बुद्धि चंद जी की प्रतिष्ठा को 'नजर का टीका' लगाते रहता था।
ऐसे ही एक बार टप्पू ने गांव में टहलते टहलते एक भैंस को बिना बात के डंडा मार दिया। किसी ने उसे यह सुकृत्य करते हुए देख लिया। तत्काल इसकी सूचना बुद्धि चंद जी के एकमात्र प्रतिद्वंदी एवं प्रबल विरोधी परदेशी जी को दे दी।
परदेसी जी बहुत दिनों से बुद्धिचंद जी को नीचा दिखाने की तलाश में थे। आखिर आज उन्हें वह मौका मिल ही गया था, क्योंकि टप्पू ने जिस भैंस को डंडा मारा था वह उनकी ही पालतू भैंस थी। बस फिर क्या था, इशारा पाते ही परदेसी जी के समर्थकों ने बुद्धिचंद जी के घर के सामने धरना दे दिया और टप्पू के इस कृत्य के लिए सख्त से सख्त कार्यवाही करने की मांग करने लगे। इधर जब बात बुद्धिचंद जी की छवि पर बात आई तो उन्होंनें आनन-फानन में तत्काल वास्तविकता का पता लगाने के आदेश देते हुए न्याय ना होने तक अपने स्थान पर ही खड़े रहने का वचन दे डाला। साथ ही दोषी पाए जाने पर टप्पू पर सख्त कार्यवाही करने की घोषणा भी कर दी।
टप्पू पर सख्त कार्रवाई करने का अर्थ उनके निकटस्थ अच्छी तरह से जानते थे,इसलिए सख्त कार्यवाही की घोषणा होते ही वे लोग तरह-तरह के भय से आक्रांत हो उठे। मास्टर जी को भय सताने लगा कि कहीं इस बिगड़ैल बेटे को वापस उनके हवाले न कर दिया जाए।टप्पू के सुरक्षाकर्मियों के रूप में रखे गये दोनों नौकरो को डर सताने लगा कि कहीं उनको ही नौकरी से नहीं निकाल दिया जाए। इधर 70 किलो वजनी 'मिनी एलिफेंटा टप्पू' की मां चिंतित हो उठी कि कही बुद्धिचंद जी उसके दुबलाते बेटे का 2लीटर दूध ही बंद ना करवा दे।
कुछ ही कोस की दूरी पर स्थित गांव में जब पप्पू के मामा जी को यह बात मालूम पड़ी तो वे भी चिंतित हो उठे। उनको लगा कहीं बुद्धिचंद जी इस गरीब मामा के घर को 'टप्पू का सुधार गृह' न बना दे।संकट की आहट पाते ही मामी ने आंखें तरैरते हुए कुछ करने का इशारा किया। मामा जी ने ईश्वर से 'शकुनी बुद्धि' की याचना की और तेजी से अपनी बहन के घर निकल पड़े।
गांव आकर मामाजी शीघ्रता से घटनास्थल पहुंचे। भैंस के मालिक परदेसी जी से आज्ञा लेकर उन्होंने भैंस का अवलोकन किया।
" डंडा कहाँ पर मारा गया?" प्रत्यक्षदर्शी से मामा जी ने पूछा।
"यहां पर.... एक नहीं बल्कि दो-दो डंडे मारे" गवाह ने इशारा करते हुए बताया।
चारा चरने में मग्न बेचारी भैंस सारे घटनाक्रम से अनभिज्ञ थी। मामा जी ने मोटी मोटी आंखों से उसकी चमड़ी का सुक्ष्म अवलोकन किया। तभी उनको डंडे वाली जगह पर कुछ भिनभिनाते मच्छर तथा रेंगते कीड़े दिखाई दिए। मामा जी होठों पर कुटिल मुस्कान लिये तत्काल वहां से चल दिए।
थोड़ी देर में पूरे गांव में खबर फैल गई कि टप्पू ने भैंस पर चल रहे कीड़ों और मच्छरों को मारने के लिए डंडा मारा,इस तरह उसने बहुत बड़ा परोपकार किया। यही नहीं बल्कि मामा जी ने टप्पू को अपने पिता के पद चिन्हों पर चलने वाला योग्य उत्तराधिकारी घोषित कर दिया।
इस सेवा कार्य के बदले टप्पू का ढोल ढमाकों के साथ जुलूस निकाला गया।
गांव की परिक्रमा कर जुलूस जब बुद्धि चंद जी के घर के सामने आकर रुका तो पुत्र मोह से ग्रस्त बुद्धिचंद जी ताली बजाए बिना नहीं रह सके। इस दृश्य को देखकर बुद्धि चंद जी के सिद्धांत दुखी मन से किसी सिद्ध पुरुष की तलाश में उनके शरीर से निकल पड़े। 'आदर्शों'को भी अपना अनादर सहन नहीं हुआ।
आदर्शों और सिद्धांतों के जाते ही बुद्धि चंद जी के घुटने कमजोरी महसूस करने लग गए और वे एक कुर्सी पर इतमिनान से बैठ गए।