28/05/2026
जब रानी लक्ष्मीबाई अंग्रेजों से अंतिम युद्ध लड़ते हुए घायल हो गई और अंग्रेज उनका पीछा कर रहे थे, तब एक अंग्रेज ने गोली चलाई, जो रानी लक्ष्मीबाई की बाई जंघा में लगी। इस समय रानी के दोनों हाथों में तलवारें थीं, लेकिन गोली लगने के बाद जब सम्भलना मुश्किल हुआ, तो उन्होंने बाएं हाथ की तलवार फेंक दी और लगाम पकड़ी।
इतिहास की किताबों ने आपको झांसी की रानी की बहादुरी तो बताई, लेकिन उनके शरीर पर हुए उन ज़ख्मों की दास्तां शायद कहीं छुप गई, जिसे सुनकर आज भी पत्थरों का कलेजा फट जाए।
मैदान-ए-जंग में चारों तरफ अंग्रेज थे और बीच में अकेली अपनी मातृभूमि की लाज बचाती वो शेरनी! एक अंग्रेज की गोली रानी की जंघा में जा धंसी। असहनीय पीड़ा, बहता खून... पर रानी ने अपनी लगाम नहीं छोड़ी। जिस हाथ ने गोली मारी थी, रानी की तलवार ने उसी पल उस अंग्रेज का अस्तित्व मिटा दिया।
लेकिन इसके बाद जो हुआ, वो रोंगटे खड़े कर देगा...
तभी एक अंग्रेज ने पीछे से रानी के सिर पर तलवार का ऐसा भयानक वार किया कि सिर का दाहिना हिस्सा कटकर अलग हो गया और उनकी दाईं आंख बाहर निकल आई।
ज़रा सोचिए! एक महिला, जिसके शरीर का हिस्सा कट चुका हो, जिसकी आँख बाहर आ गई हो... उसने क्या किया होगा? वो गिरी नहीं! उस भीषण दर्द के बीच भी उन्होंने अपनी आखिरी ताकत समेटी और सामने खड़े अंग्रेज का कंधा काट फेंका!
जब रानी वीरगति को प्राप्त हुईं, तो उनके पास न कोई फौज थी, न कोई आलीशान महल। वहाँ मौजूद थे तो बस कुछ वफादार साथी और उनकी पीठ पर बंधा छोटा सा बालक दामोदर, जो अपनी माँ के लहू से लथपथ शव को देख रहा था।
ये वो बलिदान है जिसकी कीमत हम कभी नहीं चुका सकते। यह शौर्य गाथा उस 'मदर-इंडिया' की है जिसने जीते-जी तो क्या, मरकर भी अंग्रेजों को अपना शरीर छूने नहीं दिया।
रानी लक्ष्मीबाई के अंतिम समय का ये वर्णन वृंदावनलाल वर्मा ने किया है। वृंदावनलाल वर्मा के परदादा झांसी के दीवान आनंदराय थे, जिन्होंने रानी लक्ष्मीबाई का साथ देते हुए वीरगति पाई। इस अंतिम समय के बारे में वृंदावनलाल को उनकी परदादी ने बताया, उस समय वृंदावनलाल की आयु 10 वर्ष थी।
आज जब आप आज़ाद हवा में सांस ले रहे हैं, तो इस वीरांगना के इन घावों को याद ज़रूर करना।
अगर इस बलिदान ने आपकी आँखों में आंसू और सीने में गर्व भर दिया है, तो कमेंट में 'नमन' लिखना न भूलें