08/05/2026
"गुरुदेब के संरक्षण और आप सभी के असीम स्नेह और प्रोत्साहन ने एक नए "काव्य संकलन" लिखने का बल दिया है....जिस संकलन के कुछ भाग मैं प्रत्येक रविवार को पोस्ट करूँगी...आशा है आप सभी को यह काव्य संकलन ज्ञान के प्रकाश से प्रकाशित कर भावनाओं से भर देगा.....आध्यत्म गहरी श्रद्धा... असीम आत्मीयता...निरहंकारिता और भावनाशील होने का नाम है....कुछ हद तक समझाने की कोशिश करेगा.....
भाग-27
🌹बुझी ज्योत जब अखण्ड ज्योति से मिली🌹
सूर्य का उदय होने से पहले,
घना अंधकार दिखाई देता है.....
वह वक़्त भी नज़र आता है .....
जब कुछ न दिखायी देता है.....
देखो वह कैसे मचल रहे.....
दुनिया संग वह भी बदल रहे....
सच का आँचल क्या सचमुच धूमिल पड़ जायेगा.....
जिस अंधविश्वास और पाखंड की लड़ाई में लाखों बलिदान हुए.....
वही चश्मा धर्म के नाम से पहनाया जाएगा....
था भ्रष्ट दुर्योधन तो क्या??
कर्ण बनकर अधर्म का साथ दिया जाएगा.....
या फिर कृष्णा फिर से किसी अर्जुन को गीता का सार बताएगा.....
मानवता को कोई सहारा देकर ऊपर उठाएगा....
या फिर जैसे को तैसा देने को......
हर व्यक्ति ही दुर्योधन बन जायेगा.....
यह जवाब क्या देगी मुझे अखण्ड ज्योत??????
ऐसा धूमिल टिमटिमाती ज्योत ने कहा....
अखण्ड ज्योत की वाणी से जैसे अंगारे बरसे हों......
और उसने निर्देश में बस स्वयं को गढ़ने कहा......
नहीं वक़्त अब जो तू ज्योत बनेगी......
है पुकार अखण्ड ज्योत की......
क्या मेरी नन्हीं दीपकें अब मशालें बनना चाहेंगी......
नम्रता पांडेय "नमी"