25/12/2024
किन्नू का इतिहास बहुत दिलचस्प है। यह फल 60 साल पहले भारत में लाया गया था तथा सबसे पहले हिमाचल प्रदेश के धौलाकुंआँ, सिरमौर में इसे उगाया गया था। इस फल को रिवरसाइड रिसर्च स्टेशन, कैलिफोर्निया यूनिवर्सिटी के फ्रूट ब्रीडर, डा. एच. बी. फ्रोस्ट ने 1915 में तैयार किया था। यह किस्म संतरे और माल्टे के मेल से बनी है (Citrus nobilis citrus deliciosa) । शुरु शुरु में किन्नू की तरफ अधिक ध्यान नहीं गया तथा पारम्परिक छीलकर खाने वाले संतरों को महत्व मिलता रहा। फिर धीरे- धीरे किसानों को लगा कि यह 15 दिन पहले पक जाता है, इसमें जूस की मात्रा भी अधिक है तथा छिलका पतला है और 15-20 दिनों तक फल तरोताजा रहता है। पहले यहाँ के स्थानीय किसान कहा करते थे कि ये कौन सा फल है जो न काट के खाने वाला माल्टा है न छील के खाने वाला संतरा। लेकिन बाद में इसकी धीरे- धीरे मार्केट बन गयी व यह मशहूर हो गया। वर्ष 2015 में आईआईएम सिरमौर स्थापित होने की वजह से इसके बगीचे खत्म हो गए। तत्पश्चात वर्ष 2019-20 के दौरान एफ आर एस यूनिट में पुनः क्षेत्रीय बागवानी अनुसंधान एवं प्रशिक्षण केन्द्र,धौलाकुआं के वैज्ञानिक, ऑफिस व फील्ड स्टाफ ने इसके 250 से अधिक पौधे वन महोत्सव में रोपित किए थे। इस वर्ष इसके पौधों से किन्नू फलों का उत्पादन हुआ है।और एस के बाद किन्नु की फसल अबोहर में की जाने लगी,अबोहर में1975 के दशक में किन्नु आया और अबोहर का नाम रोशन किया🍊..Abohar kinnow farmer