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14/12/2025

राजा महाराजा भस्म फार्मूला धातुरोग, यौन कमजोरी, शीघ्रपतन के लिए के राजाओं वाला कीमती रामबाण आयुर्वेदिक फार्मुला

बसंत कुसुमाकर रस- 1 ग्राम
त्रिवंग भस्म 5 ग्राम
अभ्रक भस्म 10 ग्राम
गिलोय सत्व 10 ग्राम
सिद्ध मकरध्वज 2 ग्राम
प्रवाल पिष्टी 10 ग्राम

सभी को मिलाकर रख लें। आधा ग्राम सुबह, आधा ग्राम शाम को शहद या दूध से लें। चंद्रप्रभा वटी- दो दो गोली सुबह-शाम गुनगुने दूध से लें।

वैवाहिक जीवन में शारीरिक कमी को बीच में न आने दें। संभोग-शक्ति बढ़ाने के लिए बहुत आसानी से ये योग बना कर, इसका लगातार दो से तीन माह लगातार सेवन करने से शीघ्रपतन कुछ समय में कम होने लगता है।

भस्में अनेक विधियों द्वारा बनाकर उचित अनुपान-भेद से अनेक रोगों में प्रयोग की जाती हैं और लाभ भी होता है। ऐसी अवस्था में यह शंका या प्रश्न उठाना कि अनुपान (जिसके साथ भस्म प्रयोग की जाती है) से जो लाभ होता है, वह अनुपान का प्रभाव है, भस्म तो नाममात्र की ही प्रभावकारी होती है, किन्तु यह केवल अज्ञानता है और अनुपान को स्वतन्त्र रूप से प्रयोग करके उसके गुणों का परीक्षण कर इसे दूर किया जा सकता है। भस्मों के योगवाही होने के कारण अनुपान से भस्मों के गुण अवश्य बढ़ते हैं। क्योंकि अनुभव इस बात को बताता है, कि जब भस्म साथ में न हो तब केवल अनुपान की इतनी थोड़ी मात्रा देने से शरीर पर कोई असर नहीं होता है। यह तो भस्म में ही ताकत है कि इतनी थोड़ी मात्रा में ही सम्पूर्ण शरीर पर अपना प्रभाव करती है। किसी भी धातु-उपधातु की भस्म हो, उसमें ऐसी रासायनिक शक्ति विद्यमान रहती है कि मुख में डालते ही सम्पूर्ण शरीर की नसों में व्याप्त हो जाती है और अपने स्वाभाविक एवं मौलिक गुण-धर्म एवं उस प्रत्येक औषध के प्रभाव की जिसमें वह भस्म बनायी गयी है, या जो अनुपान रूप में प्रयोग किया जा रहा है, उसके गुण-धर्म को भी सम्पूर्ण शरीर में विशेषकर रोगस्थान में अत्यन्त शीघ्रतापूर्वक पहुंचा देती है। अतः सभी भस्मों को उचित अनुपान के साथ प्रयोग करने पर पूर्ण सफलता प्राप्त होती है और यही ठोस कारण है कि आज आयुर्वेद के अलावा यूनानी, एलोपैथी आदि अन्य प्रसिद्ध चिकित्सा-पद्धतियों में भी भस्मों का प्रचुर प्रयोग बढ़ रहा है। जो दवा सेरों खाने से तब कहीं अपना प्रभाव शरीर में प्रकट करती है, वह 1-2 माशे की मात्रा में ही एक रत्ती भस्म के संग मिलाकर देने से तत्काल ही सेर भर औषध के प्रभाव से भी अधिक प्रभाव प्रकट करती है। यद्यपि यह प्रभाव भावित (भावना दी हुई) औषधियों का ही क्यों न हो, किन्तु औषध को इतनी स्वल्प मात्रा और प्रभाव को एवं उस तात्कालिक शक्ति को देखकर बरबस यह कहना पड़ेगा कि यह चमत्कार भस्म के ही हैं, जो उक्त औषध के साथ सम्मिलित होकर उसके प्रभाव को कई गुना बढ़ा देती हैं।

अतः अभ्रक भस्म को ही क्यों, सभी भस्मों को उचित अनुपान के साथ व्यवहार करने पर पूर्ण सफलता प्राप्त हो सकती है तथा मिलती भी रही है। अतः निर्भय होकर भस्मों का प्रयोग किया जा सकता है।

#बसंत_कुसुमाकर_रस - छोटी आयु में अप्राकृतिक ढंग (हस्तमैथुन, गुदामैथुन आदि) से वीर्य नाश करने से अथवा ज्यादा स्त्री-प्रसंग (मैथुन) करने से वीर्य पतला हो जाता है, ऐसे मनुष्य का स्त्रियों के विषय में सोचने मात्र से वीर्य-पतन हो जाता है। ऐसी स्थिति में बसन्त कुसुमाकर के सेवन से बहुत शीघ्र फायदा होता है, क्योंकि यह रसायन और वृष्य होने के कारण वीर्यवाहिनी शिरा तथा अण्डकोष में ताकत पहुँचाता है, जिससे वीर्यवाहिनी शिरा में वीर्य धारण करने की शक्ति उत्पन्न होती है।

#सिद्ध_मकरध्वज_रसायन_गुटिका - यह अत्यन्त कामोत्तेजक, बलवर्धक और पुष्टिकारक है। यह दिल और दिमाग के लिये पुष्टिकारक, शीघ्रपतननाशक, स्तम्भनशक्तिवर्धक, नपुंसकतानाशक और बल-वीर्य बढ़ाने में अपूर्व गुणकारी है। इसके सेवन से क्षीण हुए धातु पुष्ट होकर शरीर का भार बढ़ने लगता है। नशीली वस्तु का सेवन किए बिना स्तम्भन शक्ति बढ़ाने के लिए यह प्रसिद्ध उत्कृष्ट औषधि है। ढलती आयु में सम्भोग शक्ति बनाये रखने के लिए इस वटी का प्रयोग करना सर्वोत्तम है। गाढ़ी निद्रा और मानसिक बलवृद्धि के लिए भी यह अत्युत्तम औषधि है।

#अभ्रक_भस्म - यह अनेक रोगों को नष्ट करता है, देह को दृढ़ करता है एवं वीर्य बढ़ाता है। तरुणावस्था प्राप्त कराता है और सम्भोग (मैथुन) करने की शक्ति प्रदान करता है। मानसिक दुर्बलता होने पर कार्य करने का उत्साह नष्ट हो जाता है। चित्त में अत्यधिक चंचलता रहती है। रोगी निस्तेज, चिन्ताग्रस्त और क्रोधी हो जाता है, ऐसी अवस्था में अभ्रक भस्म का सेवन मुक्तापिष्टी के साथ करना अधिक लाभप्रद है। अभ्रक भस्म योगवाही है। अतः यह अपने साथ मिले हुए द्रव्यों के गुणों को बढ़ाती है। पाचन विकार को नष्ट कर आंत को सशक्त बनाने और रुचि उत्पन्न करने के लिए अभ्रक भस्म का मिश्रण देना अत्युत्तम है। धातुक्षीणता की बीमारी में प्रवाल पिष्टी के साथ इसका सेवन करना उत्तम होता है।

#त्रिबंग_भस्म - वीर्यवर्द्धक होती है। अतः जननेन्द्रिय(लिंग )की शिथिल नसों को सख्त कर देती है, जिससे वीर्य का स्वतः (अपने-आप) वीर्य स्राव हो जाना तथा स्वप्नावस्था या स्त्री-प्रसंग की इच्छा होते ही अथवा स्त्री-प्रसंग से पूर्व ही जो वीर्यस्राव हो जाता है, वह रुक जाता है। त्रिबंग भस्म के सेवन करने से जननेन्द्रिय की मांसपेशियाँ और नसें कड़ी हो जातीं, साथ ही शुक्र भी गाढ़ा हो जाता है। अतः वीर्य विकार के लिये यह त्रिबंग भस्म बहुत उपयोगी है।

#प्रवाल _पिष्टी - पित्तनाशक और सौम्य होने के कारण पित्त युक्त शुष्क कास, रक्तप्रदर, रक्त-पित्त, अम्लपित्त, नेत्र-प्रदाह और वमन आदि विकारों में विशेष हितकर है। पित्तविकारों की तो यह सर्वोत्कृष्ट दवा है। पित्त की तीक्ष्णता, उष्णता एवं अम्लता को शांत करने में यह अपूर्व है। यह अपने शीतवीर्य-शामक और प्रसादक गुणों के कारण अनेक रोगों में उपयुक्त होती है। शुक्रस्थान की अत्यन्त निर्बलता अथवा स्नायुमण्डल की दुर्बलता के कारण शुक्र बहुत पतला और शक्तिहीन हो जाता है। इस अवस्था में प्रवाल पिष्टी का निरन्तर सेवन करने से स्थायी लाभ होता है।

#स्वस्थ रहना है तो भारतीय चिकित्सा पद्धति को अपनाना ही होहमारेगा अन्यथा एक बार एलोपैथी चिकित्सा के चक्कर में फंसे तो बिमारियों के जाल से निकलना मुश्किल होगा

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