28/11/2023
*_─⊱━━━━━⊱(🙏)⊰━━━━⊰─मधुररात्री* *एक बार नारद जी द्वारिका गये तो उन्होंने श्रीकृष्ण से कहा कि महाराज! आप गोपियों की बड़ी तारीफ करते हैं तो ये आपकी आदत ठीक नहीं है। क्यों? क्या बात है भई, हमारी आदत को तुम अलेन्ज कर रहे हो। क्या बात है? आज कुछ बन्दर-वन्दर का मुह चाहिये क्या? हाँ-हाँ, मतलब कुछ ऐसी स्कीम बना कर आये हो तो वैसा ही हम खेल खेलें फिर। अरे! भगवान् में गलती निकालना, ये किसकी हिम्मत है? नहीं-नहीं महाराज! मैं बिल्कुल ठीक कह रहा हूं, मैं होश में हूँ, बेहोश नहीं हूँ, मैं ये कह रहा हूँ कि आप जो बार-गोपियों की प्रशंसा करते हैं तो रुक्मिणी, सत्यभामा वगैरह को बुरा लगता है क्योंकि ये तो कोई मानने को तैयार नहीं हो सकता कि रुक्मिणी से अधिक सुन्दर और कोई गोपी होगी। महालक्ष्मी की अवतार हैं, सभी कलाओं में परिपूर्ण हैं, खाली चमड़े की बात नहीं है। एक गुण किसी में होता है संसार में, किसी में दो गुण होता है. और एक ही में सब गुण हों, ऐसा विश्व में कोई भी नहीं हो सकता, लेकिन रुक्मिणी हैं ऐसी। तो महाराज! आप ये सब अपने मन में कुछ रखिये वो सब अलग बात है, उसमें हम दखल नहीं देते, आपका प्राइवेट मामला है सब लेकिन रुक्मिणी वगैरह के सामने जब आप गोपियों की प्रशंसा करते हैं तो उनको फीलिंग होती है। तो क्यों प्रशंसा करते हैं आप उनकी, क्या बात है? आज बताइये आप। क्यों माता जी! रुक्मिणी से कहते हैं नारद जी, मैं ठीक कह रहा हूँ न? हाँ-हाँ, बिल्कुल। नारद जी! आज इसका फैसला होना चाहिये। लिफ्ट मिल गई। अब क्या है? नारद जी एक बीच में और नारद जी ऐसे हैं कि श्रीकृष्ण के भक्त भी हैं और श्रद्धेय भी हैं। वो ब्रह्मा के पुत्र हैं, ब्राह्मण हैं, महर्षि हैं, देवर्षि हैं, श्रीकृष्ण उनके चरणों में सिर रखते हैं तो ऐसे का अवलम्ब मिल गया तो स्त्रियों ने कहा, बिल्कुल-बिल्कुल, आज इसका उत्तर दें, श्रीकृष्ण।*
*श्रीकृष्ण ने कहा- देखो नारद जी ! ये सब फालतू बकवास न करो, मेरे सिर में बहुत दर्द हो रहा है, फटा जा रहा है सिर। पहले मेरा इलाज करो, सोचो उसके लिये कुछ। ये फालतू बातें- उसका प्रेम, उसका प्रेम, ये सब प्रेम-व्रेम तब सुहाता है जब शरीर ठीक रहे और सिर में इतना दर्द हो रहा है और तुम प्रेम की बात ले के बैठ गये। हां, कोई आदमी चार दिन का भूखा हो और फिर अचानक उसकी माँ, बाप, बहिन, कोई आ जाय, हमसे प्यार करो। अरे भाग। प्यार वाली, बड़ी आई है, हमारे तो पेट में चूहे दौड़ रहे हैं- इसको प्यार करो। तो घबड़ा गईं स्त्रियाँ सब और कराहने लगे, पूरी एक्टिंग। अरे! वो तो एक्टरों के डायरेक्टर हैं, उनको क्या मेहनत है? एक्टिंग करने में। ऐसी एक्टिंग किया कि सब घबड़ा गईं रानियाँ, जैसे प्राण जा रहे हैं उनके। नारद जी ने कहा- भई! कुछ मामला है प्राइवेट। अब अपन सँभल जायें। एक बार बन्दर बन चुके हैं न! तो उन्होंने कहा- महाराज! ये आपके सिर में बहुत दर्द है, इसकी दवा भी आप ही बता दीजिये। आप ही दवा बता दीजिये, क्या दवा है? कहाँ मिलेगी? कैसे मिलेगी? उन्होंने कहा- दवा तो नारद जी बड़ी सरल है। ऐसा है कि मेरा कोई भक्त हो, मुझसे प्यार करने वाला हो कोई। ऐसा भक्त अगर अपनी चरणधूलि दे दे और मैं सिर में लगा लूं तो मैं ठीक हो सकता हूँ। अब वो क्वेश्चन तो धरा रह गया, गोपियों के प्यार का । अब ये नया प्रश्न आ गया, इलाज वाला। नारद जी ने सुन तो लिया, लेकिन सोचना प्रारम्भ किया, ऐसा भक्त तो मैं भी हूँ। अरे! किसी भक्त की चरणधूलि माँग रहे हैं लेकिन मैं झगड़े में नहीं पड़ता इनके। हाँ, ये माताएँ जो हैं सोलह हजार एक सौ आठ रानियाँ, ये सब महापुरुषों की दादी ही तो हैं- और कौन बनेगा इनकी स्त्री ? तो इनसे कह देते हैं अभी और इनके तो खास पति हैं। अरे पति के लिये तो स्त्री आत्मा तक का बलिदान कर देती है।*
*तो तुरन्त रुक्मिणी वगैरह के सामने गये और कहा कि माताओं ! ऐसा है कि वो कह रहे हैं कि चरणधूलि कोई भक्त दे दे, तो आप लोग दे दीजिये, बस अभी ठीक हो जायें। तो रुक्मिणी ने कहा कि तुम नॉर्मल तो हो। एक स्त्री अपने पति को चरणधूलि दे, अरे नरक-वरक तो बाद में मिलेगा, लेकिन हिस्ट्री में बदनाम हो जाय सो अलग। अगर कोई छोटा-मोटा आदमी कोई गलत काम करे तो बात मोहल्ले में रह जाती है और बड़ा आदमी वही गलत काम करे तो फिर मोटे मोटे अक्षरों में अखबारों में निकलता है यानी जब महालक्ष्मी और भगवान् का मामला है तो ये तो अनन्त काल को इतिहास में अमर हो जायेगा कि श्रीकृष्ण की ऐसी स्त्रियाँ थीं कि अपनी चरणधूलि दिया। नारद जी ने सोचा और सोच कर कहा हाँ, बात तो ये ठीक कहती हैं। अच्छा, इनको छोड़ो और जो महात्मा हैं, उनके पास जाते हैं। जहाँ-जहाँ वो समझे महात्मा, सब जगह गये। सबने मना कर दिया- तुम्हारा दिमाग़ खराब है? अरे! श्यामसुन्दर के चरण की धूलि हम लोग चाहते हैं कि हम अपनी चरणधूलि उनको देंगे और वह भी होश में! तो फिर लौट आये नारद जी। उन्होंने कहा कि महाराज! आप यह भी बता दीजिये- वो कौनसा भक्त कहाँ रहता है जिसके चरण की धूलि से आप अच्छे होंगे? तो श्रीकृष्ण ने कहा वो, उधर एक है न, यू. पी. में एक मथुरा, वृन्दावन वगैरह, ब्रज है? हाँ-हाँ, मालूम है, त्रैलोक्य में कौनसी जगह है जो मुझे नहीं मालूम, तो तो वहाँ गोपियाँ रहती हैं। नारद जी ने कहा- फिर गोपियों का नाम लिया। देखो, यहीं से तो बात चली थी कि गोपियों की प्रशंसा न करो, इससे रानियों को कष्ट होता है। ये फिर गोपियों को ले आये बीच में। खैर, अपन को क्या पड़ा है, चलते हैं। गये गोपियों के पास और उनसे कहा- माताओं! श्यामसुन्दर ने भेजा है मुझे । उनको बड़ा शारीरिक कष्ट है, इस समय। क्या है? सारी गोपियों की हालत सीरियस एक वाक्य सुन के। नहीं-नहीं घबराओ मत, घबराओ मत, ऐसा है कि उनके सिर में बहुत दर्द है। वो कहते हैं कोई भक्त चरणधूलि हमको दे दे तो मैं ठीक हो जाऊं। सबने पैर फैला दिये, ले जाओ। अरे। थोड़ी नहीं क्विंटल के क्विंटल ले जाओ। यहां तो करोड़ों गोपियां हैं। हाँ, नारद जी ने कहा- ये तुम लोग जो कुछ करने जा रही हो, सोचा है इसका क्या फल होगा? देखिये नारद जी! ये फल-बल बाद में बताना, पहले ले जाओ। जल्दी करो। श्यामसुन्दर को कष्ट है और तुम फल- बल की बात करने आये हो? इसका फल क्या होगा, क्या होगा, जो होगा, होता रहेगा। अरे! नरक मिलेगा यही फल होगा न। तो कौन नई बात है। अनन्त जन्म, अनन्त बार नरक भोग चुके हैं, एक बार और सही। हमारे प्रियतम को सुख तो मिल जाये। कौन नया है हमारे लिये नरक? कौनसा जीव ऐसा है जो अनन्त बार नरक नहीं गया, अनन्त बार स्वर्ग नहीं गया? तो क्या है, वो तो अभ्यास पड़ जाता है वैसे ही। जो गन्दगी का कीड़ा होता है उसको गन्दगी की बदबू में खुश्बू आती है, उसी के अनुकूल हो जाता है। दूसरे को विचित्र बात लगती है, अरे! ये कैसे जिन्दा है, इतनी गन्दी हवा में, गन्दी बदबू में। वो कहता है- बदबू तुम्हारी खोपड़ी में है, हमको तो खुशबू आ रही है। किसी पाखाने के कीड़े से पूछ लो, वो बता देगा।*
*यही प्रश्न परीक्षित ने एक बार शुकदेव से किया था तो शुकदेव जंगल में गये, लैट्रीन के लिये, उनके पीछे-पीछे परीक्षित भी थे। शुकदेव परमहंस तीन-चार फूल ले गये थे, खुशबूदार। एक जगह सूखा लैट्रीन पड़ा हुआ था, उसमें कीड़े उस लैट्रीन को इकट्ठा करके, गोला बना-बना के उसी के चारों ओर घूम रहे थे तो शुकदेव परमहंस ने कहा- परीक्षित ! वो देख रहे हो, कीड़े क्या कर रहे हैं? उन्होंने कहा- हाँ, देख रहे हैं महाराज ! पन्द्रह-बीस फुट पर फूल रख दिये और परीक्षित से कहा- देखो ! वो लकड़ी से वो पाखाने का जो गोला बना हुआ है न सूखा-सूखा, जिसमें कीड़ा लिपटा हुआ है, उसको पकड़ के इस फूल में डाल दो, खाली कीड़े को। उन्होंने कीड़े को बड़ी मुश्किल से पकड़ा- अपनी लकड़ी से और पकड़ के उसको फूल में डाल दिया। अब परीक्षित कह रहे हैं, ये क्यों करवा रहे हैं हमसे ऐसा, गुरु जी ! ये अजीब काम, इतना गन्दा काम, बिना वज़ह। तो कुछ देर खड़े रहे शुकदेव परमहंस, मुस्कराते हुये। वो कीड़ा जो है, फूल के अन्दर जब डाला तो तुरन्त एबाउट टर्न, क्विक मार्च, सीधे वहीं पहुँच गया। शुकदेव परमहंस ने कहा- परीक्षित! देखा! तुम कहते हो- दुनिया वाले सन्तों के बताने पर भी, भगवान् के अवतार लेने पर भी, ये ईश्वर से प्रेम नहीं करते, संसार में ही मर रहे हैं। क्यों ऐसा कर रहे हैं, इतना दु:ख भोग रहे हैं? तो देखो! ये कारण है। इनकी प्रियता इसी में है।*
*तो गोपियाँ कहती हैं- ये सब नरक-फरक की बातें हमको न सुनाओ। जल्दी से ले जाओ तुम, हमारे प्राणवल्लभ को ठीक करो। नारद जी ने कहा पहले मैं ही लगा लूँ अपने, बाद में उनको ठीक करूँगा। ऐसे अद्भुत भक्त हैं जिनका प्रियतम के सुख का ही लक्ष्य है। न लोक की परवाह, न वेद की, न नरक की। इसलिए कहा है- इन गोपियों के लिये कि श्रुतिभिर्विमृग्याम्- वेद की ऋचायें जहाँ नहीं पहुँच सकीं, वहाँ ये खड़ी हैं गोपियाँ। जो आर्य धर्म है यानी संसार की माँ, बाप, बेटा, बहू, सास, ससुर, सब समाज, देश, इसकी परवाह भी न करें-*
*या दुस्त्यजं स्वजनमार्यपथं च हित्वा।*
*भेजुर्मुकुन्दपदवीं श्रुतिभिर्विमृग्याम्॥*
(भाग. १-४७-६१)
*तो श्यामसुन्दर के सुख के लिये ही जिनका लक्ष्य है, ऐसी गोपियाँ- ये निष्काम हैं लेकिन क्या इनको माहात्म्य ज्ञान है? है, इनको माहात्म्य ज्ञान है और जो सकाम भाव से गई थीं, उनको माहात्म्य ज्ञान नहीं है।*
*तद्विहीनं जाराणामिव।*
*जो कहा, जिसके लिये सूत्र बनाया, यानी कुछ गोपियाँ सकाम हैं, कुछ निष्काम हैं तो जो गोपियाँ निष्काम हैं वो तो भगवान् को जानती हैं और जो सकाम हैं वो श्रीकृष्ण को भगवान् नहीं जानतीं। जब नहीं जानतीं तो उनका प्रेम स्थिर कैसे रहा? ये प्रश्न है- क्योंकि माहात्म्य ज्ञान के बिना वाला प्रेम स्थिर नहीं रह सकता उसका आधार गलत है। उलटा व्यवहार कर दिया प्रियतम ने, प्रेम खत्म हो गया। आज डॉट दिया, प्रेम खत्म हो गया। हम जिस चीज़ से प्यार किये उसके, उस चीज़ में जरा भी कमी आई, गड़बड़ी हुई या वो चीज़ मिट गई, हमारा प्यार भी मिट जायेगा क्योंकि हमारा आधार ही गलत है। इसका समाधान कल होगा।*
*॥बोलिये वृन्दावन बिहारी लाल की जय॥*
*जय श्री कृष्ण*🌷🙏
*_─⊱━━━━⊱(शुभ)⊰━━━━━⊰─_मधुररात्री*