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25/03/2023

लहसुन प्याज क्यों नहीं खाना चाहिए-- ?? श्रवण करें ६-००
#प्याज़_खाना_क्यों_मना!?!*

शाकाहार होने तथा चिकित्सीय गुण होने के बावजूद साधकों हेतु प्याज-लहसुन वर्जित क्यों है, इसपर विस्तृत शोध के कुछ बिंदु आपके समक्ष रख रहा हूं!....
1)मलूक पीठाधीश्वर संत श्री राजेन्द्र दास जी बताते हैं कि एक बार प्याज़-लहसुन खाने का प्रभाव देह में 27 दिनों तक रहता है,और उस दौरान व्यक्ति यदि मर जाये तो नरकगामी होता है!ऐसा शास्त्रों में लिखा है!वे ये भी बताते हैं कि प्याज़ की उत्पत्ति कुत्ते के अंडकोष से है,और लहसुन की कुत्ते के नख से!इसलिए प्याज़-लहसुन खानेवाला कुत्ते के मांस को पकाकर खानेवाले के समतुल्य माना जाता है!

2) प्याज़ का सेवन करने से 55 मर्म-स्थानों में चर्बी जमा हो जाती है, जिसके फलस्वरूप शरीर की सूक्ष्म संवेदनाएं नष्ट हो जाती हैं!

3) भगवान के भोग में, नवरात्रि आदि व्रत-उपवास में ,तीर्थ यात्रा में ,श्राद्ध के भोजन में और विशेष पर्वों पर प्याज़-लहसुन युक्त भोजन बनाना निषिद्ध है, जिससे समझ में आ जाना चाहिए कि प्याज-लहसुन दूषित वस्तुएं हैं!

4)कुछ देर प्याज़ को बगल में दबाकर बैठने से बुखार चढ़ जाता है! प्याज काटते समय ही आंखों में आंसू आ जाते हैं, जिससे यह अनुमान लगाया जा सकता है कि शरीर के भीतर जाकर यह कितनी अधिक हलचल उत्पन्न करता होगा!?!

5) हवाई-जहाज चलाने वाले पायलटों को जहाज चलाने के 72 घंटे पूर्व तक प्याज़ का सेवन ना करने का परामर्श दिया जाता है, क्योंकि प्याज़ खाने से तुरंत प्रतिक्रिया देने की क्षमता(Reflexive ability) प्रभावित होती है!

6) शास्त्रों में प्याज़ को "पलांडू" कहा गया है! याज्ञवल्क्य संहिता(श्लोक 76) और कूर्म पुराण(33.18) के अनुसार प्याज एवं गोमांस दोनों के ही खाने का प्रायश्चित है--- चंद्रायण व्रत!(इसीलिए श्री जटिया बाबा प्याज़ को गो मांस तुल्य बताते थे!)

7) ब्रह्मा जी जब सृष्टि कर रहे थे, तो दो राक्षस उसमें बाधा उत्पन्न कर रहे थे! उनके शरीर क्रमशः मल और मूत्र के बने हुए थे! ब्रह्मा जी ने उन्हें मारा तो उनके शरीर की बोटियां पृथ्वी पर जहां-जहां गिरीं, वहां प्याज़ और लहसुन के पेड़ उग आए! लैबोरेट्री में टेस्ट करने पर भी प्याज़ और लहसुन में क्रमशः गंधक और यूरिया प्रचुर मात्रा में मिलता है, जो क्रमशः मल मूत्र में पाया जाता है!

8) एक अन्य कथा के अनुसार,भगवान विष्णु के मोहिनी अवतार द्वारा राहूकेतू का सिर काटे जाने पर उसके कटे सिर से अमृत की कुछ बूंदे ज़मीन पर गिर गईं थीं,जिनसे प्याज़ और लहसुन उपजे! चूंकि यह दोनों सब्जियां अमृत की बूंदों से उपजी हैं, इसलिए यह रोगों और रोगाणुओं को नष्ट करने में अमृत समान होती हैं,पर क्योंकि यह राक्षस के मुख से होकर गिरी हैं, इसलिए इनमें तेज गंध है और ये अपवित्र हैं, जिन्हें कभी भी भगवान के भोग में इस्तमाल नहीं किया जाता! कहा जाता है कि जो भी प्याज और लहसुन खाता है उनका शरीर राक्षसों के शरीर की भांति मजबूत हो जाता है,लेकिन साथ ही उनकी बुद्धि और सोच-विचार राक्षसों की तरह दूषित भी हो जाते हैं!

9)इनके राजसिक तामसिक गुणों के कारण आयुर्वेद में भी प्याज़-लहसुन खाने की मनाही है! प्राचीन मिस्र के पुरोहित प्याज़-लहसुन नहीं खाते थे! चीन में रहने वाले बौद्ध धर्म के अनुयायी भी प्याज़-लहसुन खाना पसंद नहीं करते!

10) प्याज़-लहसुन खाने के बाद इसका असर रक्त में रहने तक मन में कामवासनात्मक विकार मंडराते रहते हैं! वीर्य की सघनता कम होती है और गतिमानता बढ़ जाने से कामवासना में वृद्धि होती है!आध्यात्मिक विकास बाधित होता है, जिसके फलस्वरूप व्यक्ति जन्म-मृत्यु के घोर चक्रव्यूह से निकलने में असमर्थ रहता है!

इतने प्रमाण होते हुए भी केवल जीभ के स्वार्थ हेतु प्याज़-लहसुन खाते रहेंगे,तो जड़ बुद्धि कहलाएंगे!इसलिए इनका तुरंत परित्याग करने में ही भलाई है!(घरवाले नहीं मानते,तो उन्हें उपरोक्त बातें समझाएँ)

12/01/2023

कर्मफल...

जब कर्ण के रथ का पहिया जमीन में फंस गया तो वह रथ से उतरकर उसे ठीक करने लगा। वह उस समय बिना हथियार के थे...भगवान कृष्ण ने तुरंत अर्जुन को बाण से कर्ण को मारने का आदेश दिया।

अर्जुन ने भगवान के आदेश को मान कर कर्ण को निशाना बनाया और एक के बाद एक बाण चलाए। जो कर्ण को बुरी तरह चुभता हुआ निकल गया और कर्ण जमीन पर गिर पड़े।

कर्ण, जो अपनी मृत्यु से पहले जमीन पर गिर गया था, उसने भगवान कृष्ण से पूछा,

"क्या यह तुम हो, भगवान? क्या आप दयालु हैं? क्या यह आपका न्यायसंगत निर्णय है! एक बिना हथियार के व्यक्ति को मारने का आदेश?

सच्चिदानंदमय भगवान श्रीकृष्ण मुस्कुराए और उत्तर दिया, "अर्जुन का पुत्र अभिमन्यु भी चक्रव्यूह में निहत्था हो गया था, जब उन सभी ने मिलकर उसे बेरहमी से मार डाला था, आप भी उसमें थे। तब कर्ण तुम्हारा ज्ञान कहाँ था? यह कर्मों का प्रतिफल है. यह मेरा न्याय है।"

सोच समझकर काम करें। अगर आज आप किसी को चोट पहुँचाते हैं, उनका तिरस्कार करते हैं, किसी की कमजोरी का फायदा उठाते हैं। भविष्य में वही कर्म आपकी प्रतीक्षा कर रहा होगा और शायद वह स्वयं आपको प्रतिफल देगा।

30/12/2022

कटु सत्य!

एक अंधेरी रात में एक काफिला एक रेगिस्तानी सराय में जाकर ठहरा। उस काफिले में सौ ऊँट थे। उन्होंने खूँटियाँ गाड़कर ऊँट बाँधे, किंतु अंत में पाया कि एक ऊँट अनबँधा रह गया है। उनकी एक खूँटी और रस्सी कहीं खो गई थी। अब आधी रात वे कहाँ खूँटी-रस्सी लेने जाएं?

काफिले के सरदार ने सराय मालिक को उठाया, "बड़ी कृपा होगी यदि एक खूँटी और रस्सी हमें मिल जाती। ९९ ऊँट बँध गए, एक रह गया, अंधेरी रात है, वह कहीं भटक सकता है।"

वृद्ध बोले, मेरे पास न तो रस्सी है, और न खूँटी, किंतु एक युक्ति है। जाओ, और खूँटी गाड़ने का नाटक करो, और ऊँट से कह दो, सो जाए।

सरदार बोले, अरे, कैसा पागलपन है?

वृद्ध बोले, बड़े नासमझ हो, ऐसी खूँटियाँ भी गाड़ी जा सकती हैं जो न हों, और ऐसी रस्सियाँ भी बाँधी जा सकती हैं जिनका कोई अस्तित्व न हो? अंधेरी रात है, आदमी धोखा खा जाता है, ये तो एक ऊँट है!

विश्वास तो नहीं था किंतु विवशता थी। उन्होंने गड्ढा खोदा, खूँटी ठोकी, जो नहीं थी। केवल आवाज हुई ठोकने की, ऊँट बैठ गया। खूँटी ठोकी जा रही थी। रोज-रोज रात उसकी खूँटी ठुकती थी, वह बैठ गया।

उसके गले में उन्होंने हाथ डाला, रस्सी बाँधी। रस्सी खूँटी से बाँध दी गई, रस्सी, जो नहीं थी। ऊँट सो गया! वे बड़े हैरान हुए! एक बड़ी अदभुत बात उनके हाथ लग गई। सो गए।

सुबह उठकर उन्होंने ९९ ऊँटों की रस्सियाँ निकालीं, खूँटियाँ निकालीं, वे ऊँट खड़े हो गए। किंतु सौवां ऊँट बैठा रहा। उसको धक्के दिए, पर वह नहीं उठा! फिर वृद्ध से पूछा गया। वृद्ध बोले, "ऊँट हिंदुओं की भाँति बड़ा धार्मिक है। जाओ, पहले खूँटी निकालो। रस्सी खोलो।"

सरदार बोले, "लेकिन रस्सी हो तब ना खोलूँ।

वृद्ध बोले, जैसा बाँधने का नाटक किया था, वैसे ही खोलने का करो।"

ऐसा ही किया गया, और ऊँट खड़ा हो गया।

सरदार ने उस वृद्ध का धन्यवाद किया, "बड़े अदभुत हैं आप, ऊँटों के बाबत आपकी जानकारी बहुत गहरी है!"

वृद्ध बोले, "यह सूत्र ऊँटों की जानकारी से नहीं, हिंदुओं की जानकारी से निकला है!"

वह हिंदू, जिसको अंग्रेजों ने जाने से पहले काँग्रेसी खूँटे से बाँध दिया था, आज भी वहीं बँधा है। वो आज भी अंग्रेजी भाषा और संस्कृति की गुलामी कर रहा है। उसे बार बार बताने पर कि तू स्वतंत्र हो गया है खड़ा नहीं हो रहा। सहस्र वर्षों की गुलामी की रस्सी गले में लटका कर घूम रहा है। जो उसे धक्के देकर उठाना चाह रहा है उसे शत्रु मान रहा है। फिर से गुलाम होना चाह रहा है।

अगर ये पोस्ट अच्छा लगे तो आगे शेयर जरूर करें. l. धन्यवाद

28/12/2022

समयसूचक AM और PM का उद्गगम भारत ही था, लेकिन हमें बचपन से यह रटवाया गया, विश्वास दिलवाया गया कि इन दो शब्दों AM और PM का मतलब होता है :
AM : Ante Meridian PM : Post Meridian
एंटे यानि पहले, लेकिन किसके? पोस्ट यानि बाद में, लेकिन किसके?
यह कभी साफ नहीं किया गया, क्योंकि यह चुराये गये शब्द का लघुतम रूप था।काफ़ी अध्ययन करने के पश्चात ज्ञात हुआ और हमारी प्राचीन संस्कृत भाषा ने इस संशय को साफ-साफ दृष्टिगत किया है। कैसे? देखिये...
AM = आरोहनम् मार्तण्डस्य Aarohanam Martandasya
PM = पतनम् मार्तण्डस्य Patanam Martandasya
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सूर्य, जो कि हर आकाशीय गणना का मूल है, उसी को गौण कर दिया। अंग्रेजी के ये शब्द संस्कृत के उस वास्तविक ‘मतलब' को इंगित नहीं करते।
आरोहणम् मार्तण्डस्य यानि सूर्य का आरोहण (चढ़ाव)।
पतनम् मार्तण्डस्य यानि सूर्य का ढलाव।
बारह बजे के पहले सूर्य चढ़ता रहता है - 'आरोहनम मार्तण्डस्य' (AM)।
बारह के बाद सूर्य का अवसान/ ढलाव होता है - 'पतनम मार्तण्डस्य' (PM)।
पश्चिम के प्रभाव में रमे हुए और पश्चिमी शिक्षा पाए कुछ लोगों को भ्रम हुआ कि समस्त वैज्ञानिकता पश्चिम जगत की देन है।

हम अपनी हजारों साल की समृद्ध विरासत, परंपराओं और संस्कृति का पालन करते हुए भी आधुनिक और उन्नत हो सकते हैं।इस से शर्मिंदा न हों बल्कि इस पर गौरव की अनुभूति करें और केवल नकली सुधारवादी बनने के लिए इसे नीचा न दिखाएं।समय निकालें और इसके बारे में पढ़ें / समझें / बात करें / जानने की कोशिश करें।
अपने “सनातनी" होने पर गौरवान्वित महसूस करें।

14/12/2022

*शिक्षक का अदभुत ज्ञान*

*मनुष्य मांसाहारी है या शाकाहारी है....पुरा पढिये*

एक बार एक चिंतनशील शिक्षक ने अपने 10th स्टेंडर्ड के बच्चों से पूछा कि
आप लोग कहीं जा रहे हैं और
सामने से कोई कीड़ा मकोड़ा या कोई साँप छिपकली या कोई गाय-भैंस या अन्य कोई ऐसा विचित्र जीव दिख गया, जो आपने जीवन में पहले कभी नहीं देखा हो, तो प्रश्न यह है कि
आप कैसे पहचानेंगे कि
वह जीव *अंडे* देता है *या बच्चे* ?
क्या पहचान है उसकी ?

अधिकांश बच्चे मौन रहे
जबकि कुछ बच्चों में बस आंतरिक खुसर-फुसर चलती रही...।

मिनट दो मिनट बाद
फिर उस चिंतनशील शिक्षक ने स्वयम ही बताया कि
बहुत आसान है,,
जिनके भी *कान बाहर* दिखाई देते हैं *वे सब बच्चे देते हैं*
और जिन जीवों के *कान बाहर नहीं* दिखाई देते हैं
*वे अंडे* देते हैं.... ।।
फिर दूसरा प्रश्न पूछा कि–
ये बताइए आप लोगों के सामने एकदम कोई प्राणी आ गया... तो आप कैसे पहचानेंगे की यह *शाकाहारी है या मांसाहारी ?*
क्योंकि आपने तो उसे पहले भोजन करते देखा ही नहीं,
बच्चों में फिर वही कौतूहल और खुसर फ़ुसर की आवाजें.....

शिक्षक ने कहा–
देखो भाई बहुत आसान है,,
जिन जीवों की *आँखों की बाहर की यानी ऊपरी संरचना गोल होती है, वे सब के सब माँसाहारी होते हैं*,
जैसे-कुत्ता, बिल्ली, बाज, चिड़िया, शेर, भेड़िया, चील या अन्य कोई भी आपके आस-पास का जीव-जंतु जिसकी आँखे गोल हैं वह माँसाहारी ही होगा है,
ठीक उसी तरह जिसकी *आँखों की बाहरी संरचना लंबाई लिए हुए होती है, वे सब के सब जीव शाकाहारी होते हैं*,
जैसे- हिरन, गाय, हाथी, बैल, भैंस, बकरी,, इत्यादि।
इनकी आँखे बाहर की बनावट में लंबाई लिए होती है ....

फिर उस चिंतनशील शिक्षक ने बच्चों से पूछा कि-
बच्चों अब ये बताओ कि मनुष्य की आँखें गोल हैं या लंबाई वाली ?

इस बार सब बच्चों ने कहा कि मनुष्य की आंखें लंबाई वाली होती है...
इस बात पर
शिक्षक ने फिर बच्चों से पूछा कि
यह बताओ इस हिसाब से मनुष्य शाकाहारी जीव हुआ या माँसाहारी ??
सब के सब बच्चों का उत्तर था *शाकाहारी* ।

फिर शिक्षक से पूछा कि
बच्चों यह बताओ कि
फिर मनुष्य में बहुत सारे लोग मांसाहार क्यों करते हैं ?
तो इस बार बच्चों ने बहुत ही गम्भीर उत्तर दिया
और वह उत्तर था कि *अज्ञानतावश या मूर्खता के कारण।*

फिर उस चिंतनशील शिक्षक ने बच्चों को दूसरी बात यह बताई कि
जिन भी *जीवों के नाखून तीखे नुकीले होते हैं, वे सब के सब माँसाहारी* होते हैं,
जैसे- शेर, बिल्ली, कुत्ता, बाज, गिद्ध या अन्य कोई तीखे नुकीले नाखूनों वाला जीव....
और
जिन जीवों के *नाखून चौड़े चपटे होते हैं वे सब के सब शाकाहारी* होते हैं,
जैसे-मनुष्य, गाय, घोड़ा, गधा, बैल, हाथी, ऊँट, हिरण, बकरी इत्यादि।

इस हिसाब से भी अब ये बताओ बच्चों कि मनुष्य के नाखून तीखे नुकीले होते हैं या चौड़े चपटे ??

सभी बच्चों ने कहा कि
चौड़े चपटे,,

फिर शिक्षक ने पूछा कि
अब ये बताओ इस हिसाब से मनुष्य कौन से जीवों की श्रेणी में हुआ ??
सब के सब बच्चों ने एक सुर में कहा कि *शाकाहारी ।*

फिर शिक्षक ने बच्चों से तीसरी बात यह बताई कि,
जिन भी *जीवों अथवा पशु-प्राणियों को पसीना आता है, वे सब के सब शाकाहारी* होते हैं,
जैसे- घोड़ा, बैल, गाय, भैंस, खच्चर, आदि अनेकानेक प्राणी... ।
जबकि
*माँसाहारी जीवों को पसीना नहीं आता है, इसलिए कुदरती तौर पर वे जीव अपनी जीभ निकाल कर लार टपकाते हुए हाँफते रहते हैं*
इस प्रकार वे अपनी शरीर की गर्मी को नियंत्रित करते हैं.... ।

तो प्रश्न यह उठता है कि
मनुष्य को पसीना आता है या मनुष्य जीभ से अपने तापमान को एडजस्ट करता है ??

सभी बच्चों ने कहा कि मनुष्य को पसीना आता है,

शिक्षक ने कहा कि अच्छा यह बताओ कि
इस बात से भी मनुष्य कौन सा जीव सिद्ध हुआ, सब के सब बच्चों ने एक साथ कहा –
*शाकाहारी ।*
सभी लोग विशेषकर अहिंसा में, सनातन धर्म, संस्कृति और परम्पराओं में विश्वास करने वाले लोग भी चाहे तो बच्चों को नैतिक-बौधिक ज्ञान देने अथवा सीखने-पढ़ाने के लिए इस तरह बातचीत की शैली विकसित कर सकते हैं,
इससे जो वे समझेंगे सीखेंगे वह उन्हें जीवनभर काम आएगा...
याद रहेगा, पढ़ते वक्त बोर भी नहीं होंगे....।

*बच्चे अगर बड़े हो जाएं तो उनको यह भी बताएं कि कैसे शाकाहारी मनुष्य जानकारी के अभाव में मांसाहार का उपयोग करता है और कहता है कि जब अन्न नहीं उपजाया जाता था तब मनुष्य मांसाहार का सेवन करते थे, जो सरासर गलत है तब मनुष्य कंद-मुल एवं फलों पर जीवित रहते थे, जो सही है एवं उसके संरचना और स्वभाव से मेल भी खाता है।
*।। प्रकृति की ओर लौटिये तथा ईश्वर, भगवान, प्रभु से सच्चे अर्थों में जुड़िये ।।*

*गांव के पान की दुकान पर खड़े एक 35 वर्षीय निठल्ले बेरोजगार युवक से मेंने पूछा=कुछ कमाते धमाते क्यों नहीं...?           ...
14/12/2022

*गांव के पान की दुकान पर खड़े एक 35 वर्षीय निठल्ले बेरोजगार युवक से मेंने पूछा=कुछ कमाते धमाते क्यों नहीं...? दिन भर शराब पिए रहते हो,और राजश्री खाकर थूकते रहते हो?*

वह बोला :-- *मेरी मर्जी* 😳

मैं बोला :-- *शादी हो गई* ...?

वह बोला :-- *हो गई* ..😊

मैं बोला :-- *कैसे किये...??*

वह बोला :- *श्रम कार्ड से मुख्यमंत्री आदर्श विवाह योजना से 30,000 और अंतर्जातीय कन्यादान योजना से...250,000 मिलता है।,,,😆*

मैं बोला :-- *फिर बाल बच्चे भी होंगे उसके लिये कमाओ...?*

वह बोला :-- *जननी सुरक्षा से डिलेवरी फ्री और साथ मे 1500 रू का चेक.और*
*श्रम कार्ड में भगिनी प्रसूति योजना से 20,000 मिलता है*
😀😂😂

मैंने बोला :-- *तो बच्चों की पढ़ाई लिखाई के लिये कमाओ..?*

वह फिर :-- *गुटका पिचक कर कहा*
*उनके लिये तो पढ़ाई, यूनिफार्म,किताबें और भोजन सब सरकार की तरफ़ से फ्री...!*
और
*श्रम कार्ड से मुख्यमंत्री नौनिहाल और मेधावी छात्रवृत्ति योजना में हर साल पैसे मिलगे।*

*और जब लड़का कॉलेज करेगा तो*,

*BPLसूची मे होने की वजह से उसे फ्री एडमिशन और स्कोलरशिप भी मिलेंगे तो क्या टेशन ?*
😄😄😂😂

मैंने बोला :-- *यार घर कैसे चलाते हो ?*

वह बोला :-- *छोटी लड़की को अभी सरकार से साइकिल मिली है।*
*लड़के को लॅपटाप मिला है।*

*मॉ-बाप को वृद्धावस्था पेन्शन मिलती है और 1 रूपये किलो मे पूरे महिने भर का चावल मिलता है।*
😀😀😂😂

*मैं झुझलाँ कर बोला यार माॅ-बाप को तीर्थयात्रा के लिये तो कमाओ ...??*

उसने कहा ........*मुख्यमंत्री तीर्थयात्रा योजना से भेज दिया हूं*😀😄

मैं बोला ........*कम से कम इलाज के लिए कमाओ*

उसने कहा ....... *आयुष्मान कार्ड है न फ्री में पांच लाख तक का इलाज होता है*😃😂😂

मुझे गुस्सा आया और मैंने बोला :--
*माॅ बाप के मरने के बाद जलाने के लिये तो कमा..?*

वह बोला :-- *1 रू में विद्युत शवदाह गृह है..!*😊

मैंने कहा :-- *अरे बाप अपने बच्चों की शादी के लिये तो कमाओ..?*

वह मुस्कुराया 😊😊और बोला :--

*फिर वहीं प्रश्न आ गये...*

*वैसे ही होगी जैसे मेरी हुई*..!!
😄😄😄😂😂😂

यार एक बात बता *ये इतने अच्छे कपड़े तू कैसे पहनता है?*

वह बोला :-- *राज की बात हैं..फिर भी मैं बता देता हूँ*...😊

*सरकारी जमीन पर कब्जा कर आवास बनाओ , लोन लो और फिर मकान बेच कर फिर जमीन कब्जा कर पट्टा ले लो...!!*"😜

*तुम जैसे लाखों लोग काम करके हमारे लिए टैक्स भर ही रहे हैं।*

*और किसान खेती मे मेहनत करके अनाज पैदा करता है, और सरकार उसे खरीद कर हमे मुफ़्त में देती है तो फिर हम काम क्यों करें।*

😂😂😂😃😃😂😂

*कृपया यह मैसेज सभी समूहों में भेजिए सरकार को पता चले आखिर छोटा सा जापान देश ,,,,,,, हमारे देश से आगे क्यों है ?*

*🇮🇳 वंदे मातरम 🇮🇳*

30/11/2022

बहुरूपिया राज दरबार में पहुंचा, प्रार्थना की- "अन्नदाता बस ₹5 का सवाल है और महाराज से बहुरूपिया और कुछ नहीं चाहता।"
राजा ने कहा- मैं कला का पारखी हूं, कलाकार का सम्मान करना राज्य का नैतिक कर्तव्य है, कोई ऐसी कला दिखाओ कि मैं प्रसन्नता से ₹5 पुरस्कार में दे सकूं, पर दान नहीं दे सकता।
कोई बात नहीं अन्नदाता! मैं आप के सिद्धांत को तोड़ना नहीं चाहता, पर मुझे अपना स्वांग दिखाने के लिए 3 दिन का समय चाहिए, कहकर बहुरूपिया चला गया।

दूसरे दिन नगर से बाहर एक टीले के ऊपर समाधि मुद्रा में एक साधु दिखाई दिए। नेत्र बंद, तेजस्वी चेहरा, लंबी जटाएं।
चरवाहों ने उस साधु को देखा। उन्होंने पूछा- स्वामी जी!आपका आगमन कहां से हुआ है?
कोई उत्तर नहीं!
क्या आपके लिए कुछ फल, दूध की व्यवस्था की जाए?
कोई उत्तर नहीं!
शाम को चरवाहों ने नगर में चर्चा की। घर-घर तपस्वी की चर्चा होने लगी। दूसरे दिन नगर के अनेक शिक्षित, धनिक, दरबारी, थाली में मेवा, फल, नाना प्रकार के पकवान लेकर दर्शन के लिए दौड़ पड़े।
सबके आग्रह करने पर भी साधु ने उन वस्तुओं को ग्रहण करना तो दूर, आंख भी नहीं खोली।

यह बात प्रधानमंत्री तक पहुंची। वह भी स्वर्ण मुद्राएं लेकर दर्शनार्थ पहुंचा और निवेदन किया- "बस एक बार नेत्र खोल कर कृतार्थ कीजिए!"
प्रधानमंत्री का निवेदन भी व्यर्थ गया। अब तो सभी को निश्चय हो गया कि यह संत अवश्य पहुंचा हुआ है।
प्रधानमंत्री ने राजा के महल में जाकर वस्तुस्थिति से अवगत कराया, तो राजा सोचने लगे, जब मेरे राज्य में इतने बड़े तपस्वी का आगमन हुआ है तो उनकी अगवानी के लिए मुझे जाना चाहिए।

दूसरे ही दिन सुबह वे दर्शनार्थ जाने को उद्यत हुए। खबर बिजली की तरह फैल गई। जिस मार्ग से राजा की सवारी निकलने वाली थी, वह साफ करा दिए गए। रास्ते में सुरक्षा व्यवस्था ठीक कर दी गई।
राजा ने तपस्वी के चरणों में अशर्फियों का ढेर लगा दिया और उनके चरणों में मस्तक टेककर आशीर्वाद की कामना करने लगे ।
पर तपस्वी विचलित नहीं हुआ।
अब तो प्रत्येक व्यक्ति को निश्चय हो गया कि तपस्वी बहुत त्यागी और सांसारिक वस्तुओं से दूर है।

चौथे दिन बहुरूपिया फिर दरबार में पहुंचा, हाथ जोड़कर बोला- "राजन! अब तो आपने मेरा स्वांग देख लिया होगा और पसंद भी आया होगा, अब तो मेरी कला पर प्रसन्न होकर मुझे ₹5 का पुरस्कार दीजिए, ताकि परिवार के पालन पोषण हेतु आटा दाल की व्यवस्था कर सकूं!"
राजा चौका- कौन सा स्वाँग?
बहुरूपिए ने कहा-"वही तपस्वी साधु वाला, जिसके सामने आप ने अशर्फियों का ढेर लगा दिया था!"
राजा ने कहा- "तू कितना मूर्ख है! जब राजा सहित पूरी जनता, तेरे चरणों में सर्वस्व लुटाने आतुर खड़ी थी, तब तुमने धन दौलत पर दृष्टि तक नहीं डाली,और अब ₹5 के लिए चिरौरी कर रहा है।"

बहुरूपिए ने कहा- "राजन! उस समय एक तपस्वी की मर्यादा का प्रश्न था। एक साधु के वेश की लाज रखने की बात थी। भले ही साधु के रूप में मैं, बहुरूपिया था,पर था तो एक साधु ही! फिर उस धन दौलत की ओर दृष्टि उठाकर कैसे देख सकता था? उस समय सारे वही भाव थे,और अब पेट की ज्वाला को शांत करने के लिए, अपने श्रम के पारिश्रमिक और पुरस्कार की मांग है आपके सामने।"
"काश! वर्तमान समय के कुछ साधुवेश धारी इस बात को समझ सकते और अपनी शक्ति समाज कल्याण में लगाते, तो भारत निश्चित ही आध्यात्मिक विश्व गुरु हो सकता है।"

श्री राधे राधे

15/11/2022

भक्त नारद तथा भक्तवत्सल प्रभु श्री राम

अरण्यकांड के अंतर्गत महादेव शिव जी माता उमा से कहते हैं कि प्रभु श्री राम पंपा नामक सुंदर सरोवर के तट पर पहुंच गए हैं। कृपालु श्री राम प्रसन्नचित्र बैठकर लक्ष्मण को रसीली कथाएं सुना रहे हैं। नारद के शाप के कारण भगवान विरहयुक्त होकर नाना प्रकार के दु:ख उठा रहे हैं।यह विचार कर नारद जी हाथ में वीणा लिए हुए वहां गए , जहां प्रभु सुखपूर्वक बैठे हुए थे।

आनंदमग्न प्रभु को देखकर नारद जी ने कहा -
राम जबहि प्रेरेउ निज माया।
मोहेहु मोहि सुनहु रघुराया।।
तब बिबाह मैं चाहउं कीन्हा।
प्रभु केहि कारन करै न दीन्हा ।
हे रामजी ! हे रघुनाथ जी ! सुनिए , जब आपने अपनी माया को प्रेरित करके मुझे मोहित किया था , तब मैं विवाह करना चाहता था। हे प्रभु ! आपने मुझे किस कारण विवाह नहीं करने दिया ?

तब कृपा निधान भक्तवत्सल प्रभु श्री राम कहते हैं -
सुनु मुनि तोहि कहउं सहरोसा।
भजहिं जे मोहि तजि सकल भरोसा।।
करउं सदा तिन्ह कै रखवारी।
जिमि बालक राखइ महतारी।।
गह सिसु बच्छ अनल अहि धाई ।
तहं राखइ जननी अरगाई।।
अर्थ - हे मुनि ! सुनो , मैं तुम्हें हर्ष के साथ कहता हूं कि जो समस्त आशा - भरोसा छोड़कर केवल मुझको ही भजते हैं , मैं सदा उनकी वैसे ही रखवाली करता हूं , जैसे माता बालक की रक्षा करती है। छोटा बच्चा जब दौड़ कर आग और सांप को पकड़ने जाता है , तो वहां माता उसे अलग करके बचा लेती है।

प्रौढ़ भए तेहि सुत पर माता।
प्रीत करइ नहिं पाछिलि बाता।।
मोरें प्रौढ़ तनय सम ग्यानी।
बालक सुत सम दास अमानी।।
अर्थ - सयाना हो जाने पर उस पुत्र पर माता प्रेम तो करती है , परंतु पिछली बात नहीं रहती अर्थात् मातृपरायण शिशु की तरह फिर उसको बचाने की चिंता माता नहीं करती क्योंकि वह माता पर निर्भर न कर अपनी रक्षा आप करने लगता है। ज्ञानी मेरे प्रौढ़ (सयाने) पुत्र के समान हैं और (तुम्हारे - जैसा) अपने बल का मान न करने वाला सेवक मेरे शिशु पुत्र के समान है।

जनहि मोर बल निज बल ताही।
दुहु कहं काम क्रोध रिपु आही।।
अर्थ - मेरे सेवक को केवल मेरा ही बल रहता है और उसे (ज्ञानी को) अपना बल होता है । पर , काम - क्रोधरूपी शत्रु तो दोनों के लिए हैं। (भक्त के शत्रु को मारने की जिम्मेवारी मुझ पर रहती है क्योंकि वह मेरे परायण होकर मेरा ही बल मानता है , परंतु अपने बल को मानने वाले ज्ञानी के शत्रुओं का नाश करने की जिम्मेवारी मुझ पर नहीं है।)

काम क्रोध लोभादि मद प्रबल मोह कै धारि।
तिन्ह महं अति दारुन दुखद मायारुपी नारि।।
अवगुन मूल सूलप्रद प्रमदा सब दुख खानि।
ताते कीन्ह निवारन मुनि मैं यह जियो जानि।।
अर्थ - काम , क्रोध , लोभ और मद आदि मोह (अज्ञान) की प्रबल सेना है। इनमें मायारूपिणी (माया की साक्षात् मूर्ति) स्त्री तो अत्यंत दारुण दु:ख देने वाली है। युवती स्त्री अवगुणों की मूल , पीड़ा देने वाली और सब दु:खों की खान है। इसलिए हे मुनि ! मैंने जी में ऐसा जानकर तुम को विवाह करने से रोका था।

यह सुनकर नारदजी कहते हैं -
जे न भजहिं अस प्रभु भ्रम त्यागी।
ग्यान रंक नर मंद अभागी।।
अर्थ - जो मनुष्य भ्रम को त्याग कर ऐसे प्रभु को नहीं भजते ,वे ज्ञान के कंगाल यानी अज्ञानी , दुर्बुद्धियुक्त तथा अभागे होते हैं।
मिथिलेश ओझा की ओर से आपको नमन एवं वंदन।
।।बोलिए प्रेम से भक्त व भक्तवत्सल भगवान की जय।।

14/11/2022

देवता शराब नहीं पीते थे।
#सोमरस सोम के पौधे से प्राप्त रस था ये पौधा आज लगभग विलुप्त है,

शराब पीने को सुरापान कहा जाता था, सुरापान असुर करते थे, ऋग्वेद में सुरापान को घृणा के तौर पर देखा गया है।

टीवी सीरियल्स ने भगवान इंद्र को अप्सराओं से घिरा दिखाया जाता है और वो सब सोमरस पीते रहते हैं, जिसे सामान्य जनता शराब समझती है।

सोमरस, सोम नाम की जड़ीबूटी थी जिसमें दूध और दही मिलाकर ग्रहण किया जाता था, इससे व्यक्ति बलशाली और बुद्धिमान बनता था।

जब यज्ञ होते थे तो सबसे पहले अग्नि को आहुति सोमरस से दी जाती थी।

ऋग्वेद में सोमरस पान के लिए अग्नि और इंद्र का सैकड़ों बार आह्वान किया गया है।

आप जिस इंद्र देवता को सोचकर अपने मन में टीवी सीरियल की छवि बनाते हैं वास्तव में वैसा कुछ नहीं था।

जब वेदों की रचना की गयी तो अग्नि देवता, इंद्र देवता, रुद्र देवता आदि इन्हीं सब का महत्व लिखा गया है।

मन में वहम मत पालिये...

कहीं पढ़ रहा था, किसी ने पोस्ट किया था कि देवता भी सोमरस पीते थे तो हम भी पीयेंगे तो अचानक मन में आया तो लिख दिया।

आज का चरणामृत/पंचामृत सोमरस की तर्ज पर ही बनाया जाता है बस प्रकृति ने सोम जड़ीबूटी हमसे छीन ली।

तो एक बात दिमाग में बैठा लीजिये, सोमरस नशा करने की चीज नहीं थी।

आपको सोमरस का गलत अर्थ पता है अगर आप उसे शराब समझते हैं।
शराब को शराब कहिए सोमरस नहीं।
सोमरस का अपमान मत करिए, सोमरस उस समय का चरणामृत/पंचामृत था।

13/11/2022

*जामुन एक ऐसा वृक्ष जिसके अंग अंग में औषधि है।*🍇

🍇अगर जामुन की मोटी लकड़ी का टुकडा पानी की टंकी में रख दे तो टंकी में शैवाल, हरी काई नहीं जमेगी और पानी सड़ेगा भी नहीं।

🍇जामुन की इस खुबी के कारण इसका इस्तेमाल नाव बनाने में बड़ा पैमाने पर होता है।

🍇पहले के जमाने में गांवो में जब कुंए की खुदाई होती तो उसके तलहटी में जामून की लकड़ी का इस्तेमाल किया जाता है जिसे जमोट कहते है।

🍇दिल्ली की निजामुद्दीन बावड़ी का हाल ही में हुए जीर्णोद्धार से ज्ञात हुआ 700 सालों के बाद भी गाद या अन्य अवरोधों की वजह से यहाँ जल के स्तोत्र बंद नहीं हुए हैं।

🍇भारतीय पुरातत्व विभाग के प्रमुख के.एन. श्रीवास्तव के अनुसार इस बावड़ी की अनोखी बात यह है कि आज भी यहाँ लकड़ी की वो तख्ती साबुत है जिसके ऊपर यह बावड़ी बनी थी। श्रीवास्तव जी के अनुसार उत्तर भारत के अधिकतर कुँओं व बावड़ियों की तली में जामुन की लकड़ी का इस्तेमाल आधार के रूप में किया जाता था।

🍇स्वास्थ्य की दृष्टि से विटामिन सी और आयरन से भरपूर जामुन शरीर में न केवल हीमोग्लोबिन की मात्रा को बढ़ाता। पेट दर्द, डायबिटीज, गठिया, पेचिस, पाचन संबंधी कई अन्य समस्याओं को ठीक करने में अत्यंत उपयोगी है।

🍇एक रिसर्च के मुताबिक, जामुन के पत्तियों में एंटी डायबिटिक गुण पाए जाते हैं, जो रक्त शुगर को नियंत्रित करने करती है। ऐसे में जामुन की पत्तियों से तैयार चाय का सेवन करने से डायबिटीज के मरीजों को काफी लाभ मिलेगा।

🍇सबसे पहले आप एक कप पानी लें। अब इस पानी को तपेली में डालकर अच्छे से उबाल लें। इसके बाद इसमें जामुन की कुछ पत्तियों को धो कर डाल दें। अगर आपके पास जामुन की पत्तियों का पाउडर है, तो आप इस पाउडर को 1 चम्मच पानी में डालकर उबाल सकते हैं। जब पानी अच्छे से उबल जाए, तो इसे कप में छान लें। अब इसमें आप शहद या फिर नींबू के रस की कुछ बूंदे मिक्स करके पी सकते हैं।

🍇जामुन की पत्तियों में एंटी बैक्टीरियल गुण होते हैं. इसका सेवन मसूड़ों से निकलने वाले खून को रोकने में और संक्रमण को फैलने से रोकता है। जामुन की पत्तियों को सुखाकर टूथ पाउडर के रूप में प्रयोग कर सकते हैं. इसमें एस्ट्रिंजेंट गुण होते हैं जो मुंह के छालों को ठीक करने में मदद करते हैं। मुंह के छालों में जामुन की छाल के काढ़ा का इस्तेमाल करने से फायदा मिलता है। जामुन में मौजूद आयरन खून को शुद्ध करने में मदद करता है।

🍇जामुन की लकड़ी न केवल एक अच्छी दातुन है अपितु पानी चखने वाले (जलसूंघा) भी पानी सूंघने के लिए जामुन की लकड़ी का इस्तेमाल करते।

*☘️एक कदम आयुर्वेद की ओर☘️*

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