26/01/2024
वर्ष 2015, पेरिस में
विश्व के 782 शीर्ष वैज्ञानिकों ने,
66,000 रिसर्च पेपरों पर शोध करके,
2000 पन्नों की ‘क्लाइमेट चेंज’ पर एक रिपोर्ट बनाई।
और चिल्लाकर कहा,
“भाईसाहब! सम्भलो! विनाश दरवाज़े पर खड़ा है!”
तब 196 देशों के शीर्ष राजनेता एकत्रित हुए,
कई करार हुए, कसमे-वादें किए, जुमले उछाले।
आश्वासन दिया कि हम इस भयावह आपदा पर
समय रहते विजय प्राप्त कर लेंगे।
लेकिन आज हालात कैसे हैं?
कुछ दिनों पहले, वैज्ञानिकों ने बताया,
“पिछले वर्ष पृथ्वी का औसत तापमान
1.48 डिग्री से बढ़ गया है,
कुछ दिनों के लिए 2 डिग्री से भी अधिक रहा!” 😓
जो सीमा वर्ष 2100 तक नहीं पार होनी चाहिए थी,
उसको हमने 2023 में ही पार कर दिया,
और निश्चित है कि
2024 में बात और बिगड़ेगी।
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धरती फट रही है,
आसमान गिर रहा है,
आप सो तो नहीं रहे?
क्लाइमेट चेंज का विज्ञान समझिए: औद्योगिक क्रांति की शुरुआत हुई 18वीं सदी में। ये क्रांति जिन मशीनों से आई उनका ईंधन बना कोयला व तेल। जो सब काम हाथों से होता था, वो मशीनों से होने लगा। रोटी, कपड़ा, मकान, सुख-सुविधाएँ - हर चीज़ का भारी उत्पादन शुरू हो गया।
साथ में, कोयले और तेल के जलने से बन रही थीं वो गैसें, जो पर्यावरण का तापमान बढ़ाती हैं। और 18वीं सदी से लगातार इन गैसों की मात्रा भयानक रूप से बढ़ रही है। तो पृथ्वी का औसत तापमान भी बढ़ता जा रहा है।
समस्या का एक और पक्ष: जब औद्योगिक क्रांति की शुरुआत हुई थी तब पृथ्वी पर 77 करोड़ लोग थे।
और अब 2024 में? लगभग 800 करोड़! और अनुमान है 2050 तक 1000 करोड़ हो जाएँगे।
अब मास-प्रोडक्शन, बढ़ती जनसंख्या, और हमारी बेहोशी के इस मिश्रण में विज्ञापनदाताओं ने लगाया है लालच का तड़का। अब हम आवेश में आकर वो चीज़ें भी ख़रीद लेते हैं जिसकी हमें ज़रूरत भी नहीं। और भूलिएगा नहीं हम जैसे 800 करोड़ हैं!
यही है उपभोक्तावाद का खेल,
जिसके चलते हमने प्रकृति को जमकर तबाह किया
और अब जैसे हालात बन रहे हैं प्रकृति भी हमें माफ़ नहीं करेगी।
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असम, हिमाचल में आई भारी बाढ़,
फसल ख़राब होने की वजह से सब्ज़ियों व फलों के बढ़ते दाम,
उत्तर भारत की भीषण गर्मी और ज़हरीली हवा,
तमिलनाडु में पहली बार शून्य के नीचे पहुँचता पारा,
कश्मीर में बिना बर्फ़बारी-बारिश की सर्दी के चलते पानी की किल्लत।
आप ये सब भूल तो नहीं रहे?
ऐसी कई असामान्य घटनाएँ आपके आसपास रोज़ घट रही हैं।
लेकिन दुनिया ने हमें मनोरंजन का ऐसा गहरा नशा दिया है कि
हमारी नींद टूट ही नहीं रही।
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ख़तरा भयानक है।