25/03/2026
सम्राट अशोक
सम्राट अशोक (304–232 ईसा पूर्व) मौर्य साम्राज्य के तीसरे और सबसे प्रसिद्ध शासक थे। वे अपने विशाल भारतीय साम्राज्य, कलिंग युद्ध के पश्चात हुए नैतिक परिवर्तन, और बौद्ध धर्म के प्रचार-प्रसार के लिए जाने जाते हैं। उनका शासन भारतीय इतिहास में शांति, धार्मिक सहिष्णुता और नैतिक शासन का आदर्श माना जाता है।
मुख्य तथ्य
वंश: मौर्य वंश
पिता: बिंदुसार मौर्य; दादा: चंद्रगुप्त मौर्य
राजधानी: पाटलिपुत्र (आधुनिक पटना)
शासनकाल: 269 – 232 ईसा पूर्व
उपाधियाँ: देवानांप्रिय, प्रियदर्शी, चक्रवर्ती सम्राट
धर्म परिवर्तन: कलिंग युद्ध (261 ईसा पूर्व) के बाद बौद्ध धर्म स्वीकार किया
प्रारंभिक जीवन और राज्याभिषेक
अशोक का जन्म पाटलिपुत्र में हुआ और युवावस्था में ही उन्होंने उज्जैन के गवर्नर रूप में प्रशासनिक कुशलता दिखाई। पिता की मृत्यु के बाद 272 ईसा पूर्व वे राजसिंहासन पर बैठे। उन्होंने मौर्य साम्राज्य को अफगानिस्तान से गोदावरी घाटी तक विस्तारित किया, जो प्राचीन भारत का सबसे वृहद साम्राज्य था।
कलिंग युद्ध और परिवर्तन
कलिंग (वर्तमान ओडिशा) के विरुद्ध युद्ध में अशोक ने विजय तो पाई, परंतु भयंकर रक्तपात से उनका हृदय द्रवित हो गया। 13वें शिलालेख में उन्होंने इस युद्ध के दुःख का विवरण दिया और अहिंसा का मार्ग अपनाया। यही क्षण उनके बौद्ध धर्म ग्रहण का मोड़ बना।
बौद्ध धर्म और ‘धम्म’
बुद्ध की शिक्षाओं से प्रेरित होकर अशोक ने धर्म (“धम्म”) की नीति अपनाई, जिसका मुख्य लक्ष्य नैतिकता, सदाचार और सर्वधर्म सम्मान था। उन्होंने तृतीय बौद्ध संगीति (पाटलिपुत्र) आयोजित की और अपने पुत्र महेंद्र तथा पुत्री संघमित्रा को श्रीलंका धर्म प्रचार के लिए भेजा।
शिलालेख, स्तंभ और कला
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अशोक ने अपने संदेशों को शिलालेखों और स्तंभों पर लिखवाया जो भारत, नेपाल और अफगानिस्तान तक मिले हैं। सारनाथ का सिंह स्तंभ (चार शेरों की त्रिमूर्ति) भारत का राष्ट्रीय चिह्न और उसके आधार का धर्म चक्र (अशोक चक्र) राष्ट्रीय ध्वज का भाग है।
विरासत
अशोक का शासन भारतीय इतिहास में नैतिक राजनीति का प्रतीक माना जाता है। उन्होंने अहिंसा, धर्मनिरपेक्षता और लोककल्याण के आदर्शों पर आधारित राज्य की नींव रखी। आज भी उनकी नीतियाँ विश्व शासन के नैतिक आदर्श के रूप में अध्ययन की जाती हैं।