गोधूली परिवार - Gaudhuli Parivaar

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क्यों पीता हूँ मैं गोमूत्र?एक छोटा सा प्रयोग यह जानने के लिए की क्यों अमेरिका पागल हुआ जा रहा है गोमूत्र (जिसे आजकल के स...
12/05/2016

क्यों पीता हूँ मैं गोमूत्र?

एक छोटा सा प्रयोग यह जानने के लिए की क्यों अमेरिका पागल हुआ जा रहा है गोमूत्र (जिसे आजकल के समझदार Cow Urine मानते है )

शहर में रहने वाले लोगो लिए क्यों गोमूत्र का महत्त्व बहुत अधिक है इस प्रयोग से यह साबित हो जायेगा


A simple experiment to prove why America has been trying hard to patent Gomutra (which by the way is wrongly translated as Cow Urine).

This simple experiment shows the positive effects gomutra has on human body. How it neutralizes the ill effects of day to day hazards of modern lifestyle like fruits and vegetables laced with chemicals, pollution etc.

Issued in Public Interest by
Rishivan Arogya Trust

[email protected]

FB.com/BhaiRajivDixit

क्यों लूँ मैं गोमूत्र? इस विडियो को देखकर स्वयं निर्णय लीजिये

https://youtu.be/-nWodP8cLmY

क्यों पीता हूँ मैं गोमूत्र?

एक छोटा सा प्रयोग यह जानने के लिए की क्यों अमेरिका पागल हुआ जा रहा है गोमूत्र (जिसे आजकल के समझदार Cow Urine मानते है )

शहर में रहने वाले लोगो लिए क्यों गोमूत्र का महत्त्व बहुत अधिक है इस प्रयोग से यह साबित हो जायेगा

A simple experiment to prove why America has been trying hard to patent Gomutra (which by the way is wrongly translated as Cow Urine).

This simple experiment shows the positive effects gomutra has on human body. How it neutralizes the ill effects of day to day hazards of modern lifestyle like fruits and vegetables laced with chemicals, pollution etc.

Issued in Public Interest by
Rishivan Arogya Trust

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FB.com/BhaiRajivDixit

राजीव भाई की प्रेरणा से गाँव से शहर और शहर से गाँव को समृद्ध बनाने का एक अभियान का शुभारम्भ दिल्ली के 100 परिवार इस अभिय...
15/02/2016

राजीव भाई की प्रेरणा से गाँव से शहर और शहर से गाँव को समृद्ध बनाने का एक अभियान का शुभारम्भ

दिल्ली के 100 परिवार इस अभियान के लिए चाहिए

राजीव भाई की प्रेरणा और आशीर्वाद से आयुर्वेदाचार्य भाई सुनील यादव के सहयोग से हमने "ऋषिवन आरोग्य न्यास (ट्रस्ट)" की स्थापना की है

ट्रस्ट द्वारा ग्राम पंचायत के सहयोग से कल 14 फ़रवरी 2016 को गाँव में आयोजित इस कार्यक्रम की जानकारी आज केअखबार में भी है

जिसका उद्देश्य है
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गाय हमारी माँ है और माँ का स्थान वृद्धाश्रम (गोशाला) में नहीं, घर में है
उसे हमारा दान नहीं, ध्यान चाहिए
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और बड़ी बड़ी बाते और योजनायें निर्धारित करने के स्थान पर हमने गाँव में जाकर इस पर ज़मीनी स्तर पर कार्य प्रारंभ कर दिया है

हमें कुछ सहयोगियों की आवश्यकता होगी जो अपनी छुट्टी के दिन हमारे साथ गाँव में जाकर सप्ताह में एक दिन देकर सभी विषम परिस्थितियों में कार्य करने के इच्छुक हो
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इस विचार की जानकारी इस प्रशनावली से समझाने का प्रयत्न कर रहे है:

प्रश्न: इस विचार का जन्म क्यों हुआ?

उत्तर:

राजीव दीक्षित जी से प्रेरित होकर इस योजना का निर्धारण किया गया है

"गाँव है तो शहर है" इस कथन को सार्थक करने का एक प्रयत्न गन्नौर, सोनीपत के नयाबांस गाँव की सरपंच अनीताजी और पूर्व सरपंच दिलबाग सिंह जी के सहयोग सेे करने का निश्चय किया है परन्तु यह तभी संभव है जब कोई भी गाँव स्वस्थ और समृद्ध है

इसके अंतर्गत देशी गोवंश से बीमारी और गरीबी दोनों दूर करने का कार्य प्रारंभ किया है जिसकी एक सरल रूपरेखा बनायीं है
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प्रश्न: बीमारी और गरीबी दूर कैसे होगी?

उत्तर:

विश्व की कोई समस्या ऐसी नहीं जिसका हल गोवंश से नहीं हो सकता

इसी विचार के अंतर्गत कुछ चरणों में यह कार्य होगा

1) प्रथम चरण:
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पंचगव्य एवं आयुर्वेद गाँव को निरोगी और व्यसन मुक्त बनाना
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यदि गाँव के लोग ही बीमारियों और व्यसनों में उलझे रहेंगे तो यह कार्य संभव नहीं
छोटे छोटे स्वास्थय जाग्रति अभियान के साथ प्रयत्न होगा की इस अभियान के अंतर्गत हर घर में एक देसी गाय बाँधी जाए और जिस घर में गोमाता है वहां बीमारी का क्या काम?

> यह गोवंश की उपस्थिति ही कई रोगों को उस घर से दूर करेगी और
गोमय, गोमूत्र, घी, मक्खन, छाछ, दूध आदि के सेवन से बचे हुए रोग भी समाप्त होंगे

> फिर राजीव दीक्षित जी के द्वारा बताये गए वाग्भट्ट जी के नियमो से चिकित्सा होगी

2) दूसरा चरण:

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पंचगव्य उत्पादों के निर्माण का प्रशिक्षण
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पूर्णतया रसायन मुक्त साबुन, गोमूत्र अर्क, शैम्पू, मच्छर नाशक, उबटन, औषधि, आदि एवं गोबर गोमूत्र की खाद से प्राकृतिक विषमुक्त सब्जियां उगाने का प्रक्षिक्षण दिया जायेगा

गाँव में हो रही खेती को विषमुक्त करने का प्रयास होगा और खेती की उपज को सीधे मंडी में बेचने के स्थान पर

सरसों से तेल, विभिन्न अनाजो से आटा, गन्ने से गुड, खांड, बूरा आदि, बनवा कर शुद्ध स्वरुप में इन निर्धारित परिवारों

इन गोवंश के उत्पादों की मदद से हर घर के लिए सम्मानजनक जीविका की व्यवस्था हो जाएगी

इन प्राकृतिक उत्पादों के लिए दिल्ली के 100 परिवार अपना पंजीकरण करवाएंगे (पंजीकरण हेतु फॉर्म जल्दी ही उपलब्ध करवाया जायेगा)

और यह गाँव गोमाता की मदद से शहर के 100 परिवारों को बीमारी से मुक्त करेगा

और वह 100 परिवार उस गाँव को गरीबी से मुक्त करेंगे

उत्पादों की गुणवत्ता हमारे न्यास द्वारा नियुक्त गोभक्त निर्धारित करेंगे

फिर इसी प्रकल्प को एक नए गाँव में लागू किया जायेगा और अन्य 100 परिवार उस गाँव के लिए निर्धारित होंगे

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प्रश्न: 10 वर्ष बाद इस प्रयास का प्रभाव क्या होगा?

इस प्रयास का प्रभाव दूरगामी होगा

क्योंकि गाँव का पढ़ा लिखा शहर के लिए और शहर का पढ़ा लिखा विदेश के लिए तैयार होगा तो गाँव तो बर्बाद हो जायेंगे

गाँव का और देश का विकास केवल धन से नहीं अपितु गोधन से होगा

आज गाँव में केवल WIFI, TV, अंग्रेजी स्कूल आदि सुविधाओ से उसकी उन्नति का निर्धारण हो रहा है जो सही नहीं है

इनके सुविधाओ के साथ साथ स्वस्थ रहकर पढ़ लिखकर गाँव के बच्चे गाँव में कार्य करें, खेती की और बढे, वैज्ञानिक शोध करें और संस्कारो को सुरक्षित करें तो गाँव का विकास नहीं नहीं तो विनाश है

हम गाँव के बच्चो को आज की वैज्ञानिक भाषा में अपनी देश की प्राचीन धरोहर से अवगत करवा कर उनमे गाँव के प्रति सम्मान की दृष्टि उत्पन्न करेंगे

जब बच्चे गाँव को गोवंश और स्वदेशी कृषि से स्वस्थ और उन्नत होते देखेंगे तो वे शहर की और पलायन नहीं करेंगे और गाँव की बुद्धि गाँव में रहे तो उस गाँव को उन्नत होने में देर नहीं लगेगी
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प्रश्न: हर कार्य में गोवंश भूमिका ही महत्वपूर्ण क्यों?
उत्तर:

क्योंकि आने वाले 2 दशको में पेट्रोलियम के बाद विश्व अर्थव्यवस्था में भारतीय गोवंश बहुत बड़ी और निर्णायक भूमिका निभाएगा

और जिसने इसकी शक्ति को आज पहचान लिया वही विश्वगुरु होगा

यही कारण है की अमेरिका गोमूत्र का पेटेंट करवा कर बैठा है
ब्राज़ील भारतीय गोवंश को बढाने में लगा है
और दुनिया के सभी देश किसी न किसी स्तर पर भारतीय गोवंश के महत्त्व को समझने में लगे है

तो हम भारतीय कब समझेंगे की

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गाय हमारी माँ है और माँ का स्थान वृद्धाश्रम (गोशाला) में नहीं, घर में है
उसे हमारा दान नहीं ध्यान चाहिए
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यह बात किसी धर्म से सम्बंधित नहीं है बल्कि विश्व की भलाई से सम्बंधित है

इसलिए प्रत्यक्ष या परोक्ष रूप से गाय को अपने घर में लाना है

उसी प्रयास का यह आरम्भ है की प्रत्यक्ष रूप से गाँव के हर घर में गाय लाकर शहर के उन100 परिवारों में परोक्ष रूप से गाय लाने की तै्यारी है

जिसका लक्ष्य भारत को फिर से विश्वगुरु बनाना है जो बिना गोवंश के संभव नहीं

जो इस अभियान न्यास से अभी एक कार्यकर्ता के रूप में जुड़ने चाहे वह अपना विवरण इस नंबर पर whatsapp, Hike या सन्देश के द्वारा भेज दें 9599075203

न्यास का गठन एक ओपचारिकता मात्र है हमारे लिए सदैव

न्यास हित से सर्वोपरि राष्ट्रहित होगा

निवेदक:
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- वीरेंद्र सिंह एवं आयुर्वेदाचार्य सुनील यादव

सचिव एवं अध्यक्ष
ऋषिवन आरोग्य न्यास (ट्रस्ट)
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(न्यास की सदस्यता देने का कार्य जल्द ही आरम्भ होगा और जानकारी प्रेषित की जाएगी)

दही मंथन : सृष्टि की सबसे बड़ी खोज
28/01/2016

दही मंथन : सृष्टि की सबसे बड़ी खोज

दही मंथन : सृष्टि की सबसे बड़ी खोज
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क्षीर सागर मेरु पर्वत और दानव और देवताओ द्वारा प्रसिद्द समुद्र मंथन की घटना जो हजारो वर्षो से भारत के प्रत्येक घरो में ब्रह्म मुहूर्त के दौरान भी घटित होती रही है अर्थात गोमाता के दूध से बना दही और उसमे मंथन की प्रक्रिया से निकला हुआ मक्खन और उससे निर्मित घृत, यह सृष्टि की सबसे बड़ी खोज है

कैसे?
इसी खोज की प्रेरणा से पिछले दिनों "बिग बैंग थ्योरी" निकली गयी और बतलाया गया की सृष्टि के निर्माण में लगे हुए सूक्ष्म कण ही विष्णु और शिव ऊर्जा है

इन दोनों उर्जाव के स्वरुप के लिए एक ब्रह्म ऊर्जा है जो अदृश्य है इस अदृश्य ऊर्जा में प्रज्ञा रुपी चेतना है सृष्टि में इस उर्जा की अधिकता केवल देसी गाय के दूध से वैदिक प्रक्रियाओ द्वारा निकाले गए मक्खन में है इसीलिए मक्खन रूपी गव्य ही इस सृष्टि में साक्षात् ब्रह्म ऊर्जा है जिसे धारण कर जीव जगत बुद्धिशाली, बलशाली और सृष्टि को संतुलित रखने वाली चित्त प्रवृति वाला होता है
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विषय विस्तार से :

क्या हमने कभी कल्पना की है की सृष्टि उदय के बाद वह कौन होगा जिसने पहली बार दूध से दही बनाने की प्रक्रिया खोजी होगी ।

दही को मथ कर उसमे से मक्खन निकला होगा और मक्खन को अग्नि पर तपाकर उसमे से सृष्टि का सबसे सुद्ध अग्नि-घृत की खोज की होगी ।

गोमाता इस सृष्टि को उसके संतुलन के लिए तीन महाभूत प्रत्यक्ष रूप में देती है गोबर रुपी मिटटी महाभूत, मूत्र रुपी वायु महाभूत और दूध रुपी जल महाभूत लेकिन सृष्टि के निर्माण में दो और महाभूत है अग्नि और आकाश । इन दोनों की ख़ोज ही क्षीर सागर, मेरु पर्वत और देव दानवो द्वारा की गयी मंथन क्रिया है इसमें क्षीर सागर दूध से भरा घड़ा है मेरु पर्वत उस दही को मथने वाली मथनी है और हमारे दो हाथ जिनसे यह क्रिया होती है उसमे एक देव हस्त (पुण्य) है और दूसरा दानव हस्त (पाप) है

इस मंथन की क्रिया में मथनी का एक बार पृथ्वी की दिशा में घूमने से और दूसरी बार विपरीत दिशा में घूमने से दही के परमाणु आपस में टकराते है और परमाणुओं का सामूहिक रूप से विखंडन होता है । उस विखंडन से निकले हुए दही के प्रोटोन (Proton) आपस में तेज़ गति से टकराते है और उनका विखंडन भी होता है । यही पर सृष्टि के निर्माण में लगे हुए तीनो ऊर्जाओ का अलग होना और फिर सम्मिलित होने की प्रक्रिया काफी देर तक चलती है । इस क्रिया के फलस्वरूप ही दही अपने अन्दर छिपे हुए अग्नि को जल के साथ मिश्रित कर मक्खन के रूप में बाहर निकाल देता है ।

यह मक्खन जो सहज रूप से अर्द्धतरल के रूप में दीखन है यह वास्तव में सृष्टि का ऐसे अद्भुत पदार्थ है जिसमे दो विरुद्ध महाभूतो का समावेश है -अग्नि और जल । जो कभी साथ रहने की प्रकृति वाले नहीं है लेकिन मक्खन में साथ-साथ रहते है इसी मक्खन को जब हम अग्नि पर तपाते है तब उसमे से जल वाष्प के रूप में उड़ जाता है और सृष्टि की शुद्ध अग्नि जो अग्नि महाभूत के नाम से जाना जाता है वह हमे प्राप्त होता है। इस घृत को जलने से जो लौ बनती है और उस से निकलने वाली प्रकाश की किरणें सूर्य नारायण की किरणों के सदृश्य है जिसमे सृष्टि के सञ्चालन की दो ऊर्जाए "प्रज्ञा एवं क्रिया ऊर्जा" का समावेश होता है। ऐसे घृत से जलता हुआ दीपक सौर मंडल के सूरज का एक छोटा हिस्सा है । इस प्रकार से बना 10 ml घृत यदि किसी दीपक में जले तब उससे सोलह सौ लीटर अशुद्ध वायु का रूपांतरण प्राण वायु (ऑक्सीजन) रूप में होता है ।

यही कारण है की वेदों में सूर्य नारायण की किरणों का नाम "गौ" भी है। वेद कहते है सूर्य की किरणों में ज्योति, आयु और "गौ" यह तीन प्रकृति है। इन तीनो से ही वनस्पति जगत और जीव जगत को यथा संभव उर्जा मिलती है। किरणों में जो "गौ" प्रकृति है उसका शोषण केवल भारतीय नस्ल की गौमाताएं ही कर सकती है । इसीलिए भारत के महर्षियों ने इस जीव को "गौ" कहा और अपने लिए, अपने उपयोग की वनस्पतियों के लिए पृथ्वी और सृष्टि को दीर्घायु बनाने के लिए "गौ" का सानिध्य किया । यजुर्वेद की एक ऋचा में एक प्रश्न है

"कस्य मात्र न विद्यते"?

पृथ्वी और सृष्टि दोनों ही गोमाता के स्वरुप है उनमे कोई भेद नहीं है । दोनों ही एक दूसे के सहायक और परिपूरक है ।

इसी क्रिया को आधुनिक विज्ञानं ने समझा और उसे प्रमाणित करने के लिए इस कलयुग का सबसे बड़ा परिक्षण "Big Bang Test" के नाम से वर्ष 2006 में स्विट्ज़रलैंड की सीमा पर किया । इस परिक्षण में 27 km परिधि की एक सुरंग धरती के गर्भ में बनाया गया । उसमे बड़े बड़े चुम्बकीय ऊर्जा वाले यंत्र जिसे इकोलाईज़र मशीन कहते है लगाये गए । इन मचीनो की मदद से शुद्ध हाइड्रोजन परमाणुओं को तोड़ कर इसके Protons को सूर्या की किरणों के बराबर वेग देकर आपस में टकराया गया।

जिसे प्रोटोन Bombardment कहा गया। इस क्रिया ने protons को तोड़ दिया । इसके तीन खंड हुए जिनमे दो खंडो के पास आकृति मिली । पहली आकृति जिसकी संरचना शिवलिंग की तरह दिखलाई दी और दूसरी संरचना भगवन विशुर के सहस्र रूप की तरह एवं तीसरा खंड एक ज्योति पुंज की तरह निकला और ओझल हो गया । यही ब्रह्मा है जिसकी कोई आकृति नहीं है लेकिन जैसे ही शिव और विष्णु स्वरुप के बीच से निकला प्रोटोन नष्ट हो गया । अर्थात वह ज्योति पूंज ही वह ऊर्जा है जो इस सृष्टि को बांधे हुए है इसीलिए ब्रम्हा रूप यह जयोगी पुंज ही इश्वर है जिनसे इस सृष्टि का निर्माण हुआ है । यही कारण है की आधुनिक वज्ञानिको ने पहली बार स्वीकार किया की इश्वर का अस्तित्व है जिसका दर्शन उन्होंने क्षण भर के लिए किया और माना की भारत की धरना "कण-कण में इश्वर है" यह शाश्वत सत्य है

इस प्रयोग की प्रक्रियाओ का ज्ञान वैज्ञानिको को भारत के उन घरो से मिला जहाँ आज भी ब्रह्म मुहूर्त में दही मंथन की क्रिया होगा है । मक्खन रुपी आण्विक ऊर्जा निकली जाती है । इसी आण्विक ऊर्जा के सेवन से भारत भूमि पर ऋषि और क्रन्तिकारी पैदा होते आये लेकिन दुर्भाग्य हम भारतवासियों का की सृष्टि के इस उत्क्रष्ट अनुसंधान हमने खोया यही कारण है की आज के भारत में ऋषि व्यक्तित्व और भगवन श्री कृष्ण जैसे क्रन्तिकारी व्यक्तित्व जन्म नहीं ले रहे।

भारत का भविष्य इस पर निर्भर
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जब भारत के बच्चो को दोबारा मक्खन रूपी ब्रह्म उर्जा और गोमाता का सानिध्य प्राप्त होगा तभी इस धरती पर फिर से ऋषि और वीर पुरुष पैदा होंगे

यदि भारत को समृद्ध और शक्तिशाली, ऋषियों-क्रांतिकारियों का देश बनाना है तो इस आण्विक परिक्षण के लघु रूप को घरो में स्थापित करना होगा

अतः किसी भी कीमत पर यह कार्य करें तभी हम भारत को विदेशी कंपनियों की लूट से मुक्त कर स्वदेशी और स्वावलंबी भारत बना सकते है

स्वदेशी रक्षक
वीरेंद्र

ज्ञान स्त्रोत : भाई निरंजन वर्मा
panchgavya.org

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