Shri Deep Jyoti Kisan Producer Company ltd

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त्यौहार मनाने का मतलब केवल बधाई देना नहीं होता उस त्यौहार की भूमिका समझकर, त्यौहार के महत्व को अपने जीवन से जोड़ना , आचर...
03/03/2026

त्यौहार मनाने का मतलब केवल बधाई देना नहीं होता उस त्यौहार की भूमिका समझकर, त्यौहार के महत्व को अपने जीवन से जोड़ना , आचरण में , व्यवहार में उतरना ही सही मायने में उस त्यौहार को मनाना है

होलिका दहन का अर्थ है –
बुराई को त्यागकर, अच्छाई को ग्रहण करना l
अशुद्ध आहार को त्याग, शुद्ध आहार को ग्रहण करना
बुरे आचरण को त्याग , अच्छे आचरण को अपनाना
बुरे लोगों को साथ छोड़कर, अच्छे लोगों के साथ रहना l
केमिकल वाला भोजन त्याग , शुद्ध प्राकृतिक आहार अपनाना ll

मै राजाराम गोयल , संचालक : देशी फार्म उज्जैन
गत 10 वर्षों से स्वयं प्राकृतिक शुद्ध आहार का सेवन कर रहा हूं साथ ही अपने परिवार को भी इस दिशा में मोड़ रहा हूं l

विगत 5 वर्षों से भारतवर्ष में मेरी विचारधारा से जुड़े लोगों के साथ मिलकर " शुद्ध उगाओ , शुद्ध खाओ " का संकल्प लेकर जीवन पथ पर आगे बढ़ रहा हु। आगे की

योजना में " एक जिला एक जैविक स्टोर" की प्लानिंग है

यदि आप भी इसी प्रकार के विचार रखते है तो, हम साथ मिलकर इस मुहिम को बहुत आगे ले जा सकते है l मुझसे जुड़ने के लिए कॉल करे 9424099101

गेहूं पानी और खाद प्रबंधन
30/11/2025

गेहूं पानी और खाद प्रबंधन

गेहूं की फसल में 18 से 21 दिन का समय (CRI Stage) सबसे महत्वपूर्ण माना जाता है। इसी 3–4 दिनों की लापरवाही से उत्पादन 30% से 50% तक कम ह...

पहली सिंचाई के बाद गेहूं की पत्तियाँ पीली क्यों हो जाती हैं? जानिए वैज्ञानिक विश्लेषण एवं समाधानप्रोफेसर (डॉ.) एस.के. सि...
28/11/2025

पहली सिंचाई के बाद गेहूं की पत्तियाँ पीली क्यों हो जाती हैं? जानिए वैज्ञानिक विश्लेषण एवं समाधान

प्रोफेसर (डॉ.) एस.के. सिंह
विभागाध्यक्ष, पोस्ट ग्रेजुएट डिपार्टमेंट ऑफ प्लांट पैथोलॉजी एवं नेमेटोलॉजी एवं पूर्व सह निदेशक अनुसंधान , डॉ. राजेंद्र प्रसाद केंद्रीय कृषि विश्वविद्यालय, पूसा, समस्तीपुर, बिहार
Email: [email protected] / [email protected]

गेहूं भारत की प्रमुख खाद्यान्न फसल है, जिसकी उत्पादकता काफी हद तक प्रारंभिक वृद्धि चरणों पर निर्भर करती है। बुवाई के लगभग 18–21 दिन बाद दी जाने वाली पहली सिंचाई, जिसे क्राउन रूट इनिशिएशन (CRI) चरण कहा जाता है, गेहूं के लिए अत्यंत संवेदनशील अवस्था है। इसी समय कई किसानों द्वारा यह देखा जाता है कि सिंचाई के कुछ दिनों बाद पौधों की पत्तियाँ हल्की हरी से पीली होती चली जाती हैं। यह घटना सामान्य होने के बावजूद वैज्ञानिक रूप से महत्वपूर्ण है, क्योंकि यह पौधे की भौतिक–जैविक प्रक्रियाओं तथा मिट्टी–पोषक तत्व–जल संतुलन से सीधे जुड़ी होती है। नीचे इसका विस्तृत वैज्ञानिक विश्लेषण प्रस्तुत है—

1. मिट्टी में जल–वायु संतुलन (Whapasa) का टूटना

सूखी या मध्यम नमी वाली मिट्टी में कणों के बीच लगभग 50% वायु और 50% जलवाष्प का सूक्ष्म वातावरण मौजूद रहता है, जिसे Whapasa कहा जाता है। इसी पर जड़ों का श्वसन, सूक्ष्म जीवों की क्रियाशीलता और पोषक तत्वों का घुलन–अवशोषण निर्भर करता है। पहली सिंचाई के बाद कई बार मिट्टी पूरी तरह जल से भर जाती है, जिससे यह संतुलन टूट जाता है।

वैज्ञानिक प्रभाव

जड़ों को ऑक्सीजन कम मिलने लगती है।
जड़ कोशिकाओं में एरोबिक श्वसन रुककर अनेरोबिक श्वसन शुरू होता है।
ऊर्जा (ATP) का उत्पादन कम हो जाता है।
जड़ें पोषक तत्वों को खींच नहीं पातीं।

इन प्रक्रियाओं के कारण क्लोरोफिल संश्लेषण धीमा पड़ता है, और पत्तियाँ पीली दिखने लगती हैं।

2. जड़ प्रणाली पर जल–तनाव और “Root Shock”

पहली सिंचाई के बाद अचानक अत्यधिक नमी मिलने पर जड़ों की कार्यक्षमता 48–72 घंटे तक घट जाती है। इसे जल-तनाव (Water Stress) या Root Shock कहा जाता है।

परिणाम

जड़ों का विस्तार रुकना
बारीक अवशोषी जड़ों का नुकसान
पोषक तत्वों का प्रवाह बाधित

जब जड़ें सक्रिय नहीं रहतीं, तो पत्तियों में नाइट्रोजन, सल्फर और आयरन की कमी के लक्षण स्पष्ट रूप से दिखाई देने लगते हैं, जिनका प्रमुख संकेत पीली पत्तियाँ (Chlorosis) है।

3. नाइट्रोजन की क्षणिक कमी (Transient Nitrogen Deficiency)

नाइट्रोजन गेहूं के लिए सबसे महत्वपूर्ण पोषक तत्त्व है, जो क्लोरोफिल निर्माण और प्रोटीन संश्लेषण में सीधा योगदान देता है। पहली सिंचाई के बाद मिट्टी में मौजूद नाइट्रोजन:

पानी के साथ नीचे की सतहों में लीच हो जाता है,
या अस्थायी रूप से पौधों के लिए अप्राप्य बन जाता है।

इससे पौधे को क्षणिक नाइट्रोजन कमी महसूस होती है, जिसके लक्षण हैं:

पुरानी पत्तियों का पीलापन
पौधों का धीमा विकास
हल्की हरापन से पूर्ण पीला रंग

यदि यह स्थिति लंबे समय तक बनी रहे, तो टिलरिंग क्षमता और दानों की संख्या प्रभावित हो सकती है।

4. मिट्टी के तापमान में अचानक गिरावट (Temperature Shock)

पहली सिंचाई अक्सर सर्दियों में दी जाती है। जब बहुत ठंडा पानी मिट्टी में पहुंचता है, तो मिट्टी का तापमान 3–6°C तक कम हो सकता है। कम तापमान से:

जड़ एंजाइम गतिविधि धीमी पड़ती है
पोषक तत्वों का अवशोषण कम होता है
प्रकाश संश्लेषण दर घटती है

इस वैज्ञानिक श्रृंखला का अंतिम परिणाम है—क्लोरोफिल टूटन में वृद्धि और पत्तियों का पीलापन।

5. सूक्ष्म पोषक तत्वों की अस्थायी कमी (Especially Iron & Sulphur)

अत्यधिक नमी के कारण मिट्टी का pH और रासायनिक संतुलन प्रभावित होता है। आयरन (Fe) और सल्फर (S) जैसे तत्व:

घुलनशील रूप से अवघुलनशील रूप में परिवर्तित हो जाते हैं
पौधों द्वारा अवशोषित नहीं हो पाते

इससे नई पत्तियाँ नसों के बीच पीली (Interveinal Chlorosis) दिखाई देती हैं, जबकि नसें हरी रहती हैं। यह आयरन क्लोरोसिस का विशिष्ट लक्षण है।

6. मिट्टी की संरचना और भारी मिट्टी का प्रभाव

काली, भारी या दोमट मिट्टियाँ पानी रोकने की क्षमता अधिक रखती हैं। पहली सिंचाई के बाद इनमें....

जल निकास धीमा होता है
गैसों का विनिमय कम
जड़ क्षेत्र अधिक समय अनेरोबिक रहता है

इससे पीलापन अधिक तीव्र और लंबे समय तक बना रह सकता है।

7. उर्वरक प्रबंधन की त्रुटियाँ

यदि किसान

पूरी नाइट्रोजन बुवाई के समय ही दे दें,
टॉप ड्रेसिंग समय पर न करें,
या जैविक कार्बन कम हो,

तो पहली सिंचाई के बाद नाइट्रोजन तेजी से नीचे चली जाती है और पौधे को तुरंत उपलब्ध नहीं रहती। परिणामस्वरूप पत्तियाँ पीली पड़ने लगती हैं।

8. जैविक कारकों की भूमिका

अत्यधिक नमी से कुछ रोगजनक फफूंदें (जैसे Pythium, Fusarium) सक्रिय हो जाती हैं, जो जड़ गलन का कारण बनती हैं। प्रारंभिक अवस्था में रोग लक्षण भले स्पष्ट न हों, लेकिन पौधों में पोषक अवशोषण बाधित होने से पत्तियाँ पीली दिख सकती हैं।

अंत में....

पहली सिंचाई के बाद गेहूं की पत्तियों का पीला पड़ना मुख्यतः मिट्टी में जल–वायु संतुलन के टूटने, जड़ों की क्रियाशीलता घटने, नाइट्रोजन एवं सूक्ष्म तत्वों की अस्थायी कमी, तापमान परिवर्तन और भारी मिट्टी की जलधारण क्षमता से जुड़ा प्राकृतिक, लेकिन वैज्ञानिक रूप से महत्वपूर्ण परिणाम है। यह स्थिति सामान्यतः अस्थायी होती है और उचित प्रबंधन के बाद पौधे पुनः हरे और स्वस्थ हो जाते हैं।

वैज्ञानिक सुझाव

हल्की सिंचाई—खेत में जल जमाव न होने दें।
पहली टॉप ड्रेसिंग—सिंचाई के 3–4 दिन बाद नाइट्रोजन दें।
ड्रैनेज—नाली व्यवस्था अनिवार्य।
जिंक/सल्फर/आयरन स्प्रे—यदि 7–10 दिन बाद भी पीलापन रहे।
जैविक कार्बन बढ़ाएँ—व्हापासा में सुधार।

गेहूं में ज्यादा कल्ले 🌾🌾(tillering) और अधिक पैदावार के लिए सागरिका (Sagarika – Seaweed Extract) बहुत अच्छा बायो-स्टिमुल...
24/11/2025

गेहूं में ज्यादा कल्ले 🌾🌾(tillering) और अधिक पैदावार के लिए सागरिका (Sagarika – Seaweed Extract) बहुत अच्छा बायो-स्टिमुलेंट है। यह जड़ें मजबूत करता है, पौधे की ग्रोथ बढ़ाता है और कल्ले बढ़ाने में मदद करता है।

नीचे पूरा सही तरीका दिया है:

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✅ गेहूं में सागरिका का सही उपयोग (Zyada Kalle + High Yield)

1️⃣ सागरिका कब उपयोग करें?

1. पहली खुराक – 20–25 दिन बाद (टिलरिंग स्टेज पर) – यही समय कल्ले बढ़ाने के लिए सबसे महत्वपूर्ण है।

2. दूसरी खुराक (Optional) – 45–50 दिन पर – यदि पौधे कमजोर हों, कल्ले कम दिख रहे हों या फसल पीली हो रही हो।

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✅ 2️⃣ सागरिका कैसे उपयोग करें?

⭐ स्प्रे के रूप में (सबसे असरदार तरीका)

✔ 1 लीटर पानी में 2–3 ml
✔ प्रति एकड़ 300–400 लीटर पानी, अर्थात:
👉 प्रति एकड़ 600–900 ml सागरिका

🌱 स्प्रे समय

सुबह या शाम

तेज धूप में न करें

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✅ 3️⃣ सागरिका किस फ़र्टिलाइज़र के साथ दें?

⭐ टिलरिंग में सबसे अच्छा कॉम्बिनेशन → सागरिका + NPK 19:19:19

✔ NPK 19:19:19 → 1–1.5 kg/एकड़
✔ सागरिका → 600–900 ml/एकड़
✔ दोनों को एक साथ स्प्रे कर सकते हैं।

➡ इससे

कल्ले बढ़ते हैं

जड़ तेज बनती है

पत्ते हरे और चौड़े होते हैं

टिलर मजबूत बनते हैं

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✅ 4️⃣ सिंचाई के साथ (जड़ क्षेत्र में) – यदि आप Drench डालना चाहें

✔ सागरिका 1 लीटर/एकड़
✔ पहली सिंचाई के समय भी दे सकते हैं।
➡ इससे जड़ें मजबूत होती हैं और कल्ले जल्दी बढ़ते हैं।

⭐ बोनस टिप्स (कल्ले सबसे ज्यादा बढ़ते है

✔ घनी बुवाई से बचें, नहीं तो कल्ले दब जाते हैं।

#गेहूंमेंखादप्रबंधन

02/11/2025

ऑर्गेनिक आहार हमारे खेत से सीधे आपके द्वार

"अक्टूबर–नवंबर में पपीता लगाने से पहले सोचें-समझें-फिर करें रोपण!"प्रोफेसर (डॉ.) एस. के. सिंहविभागाध्यक्ष, पोस्ट ग्रेजुए...
26/10/2025

"अक्टूबर–नवंबर में पपीता लगाने से पहले सोचें-समझें-फिर करें रोपण!"

प्रोफेसर (डॉ.) एस. के. सिंह
विभागाध्यक्ष, पोस्ट ग्रेजुएट विभाग, प्लांट पैथोलॉजी एवं नेमेटोलॉजी एवं पूर्व सह निदेशक अनुसंधान , डॉ. राजेंद्र प्रसाद केंद्रीय कृषि विश्वविद्यालय, पूसा, समस्तीपुर, बिहार
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किसानों में पपीते की बढ़ती लोकप्रियता

हाल के वर्षों में किसानों में पारंपरिक गेहूं–धान की खेती से हटकर फल, फूल और सब्जियों की खेती की प्रवृत्ति तेजी से बढ़ी है। इनमें पपीता एक ऐसी नकदी फसल के रूप में उभरा है, जिसने किसानों को उच्च आय का भरोसा दिया है। इसके औषधीय और पौष्टिक गुणों के कारण बाजार में इसकी मांग निरंतर बनी रहती है। यही कारण है कि किसानों को विपणन की कोई कठिनाई नहीं होती।
हालांकि यह समझना आवश्यक है कि पपीते की खेती में लाभ तभी संभव है जब इसे वैज्ञानिक ढंग से किया जाए। बिना पूरी जानकारी के पपीता लगाने से कभी-कभी किसानों को भारी आर्थिक नुकसान उठाना पड़ सकता है। अतः अक्टूबर–नवंबर के मौसम में रोपाई से पहले इसकी संपूर्ण जानकारी अत्यंत आवश्यक है।
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पपीते की खेती क्यों करें?

पपीता आम के बाद विटामिन ‘ए’ का सर्वश्रेष्ठ स्रोत है। इसमें पाया जाने वाला एंजाइम ‘पपेन’ औषधीय दृष्टि से अत्यंत महत्वपूर्ण है, जो पाचन सुधारने, घाव भरने, औषधि और सौंदर्य प्रसाधन उद्योगों में उपयोग होता है। पपीते का नियमित सेवन कोलेस्ट्रॉल को नियंत्रित करता है, डायबिटीज़ रोगियों के लिए उपयोगी है और वजन घटाने में मदद करता है।
पपीता एक तेज़ी से फल देने वाली नकदी फसल है। रोपाई के आठ से दस महीने के भीतर ही पौधे फल देने लगते हैं। औसतन एक पौधे से 70 से 80 किलोग्राम तक पपीता प्राप्त होता है। प्रति एकड़ खेती पर लगभग एक से डेढ़ लाख रुपये की लागत आती है और किसानों को दो से तीन लाख रुपये तक का शुद्ध लाभ प्राप्त हो सकता है।
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रोपाई का उपयुक्त समय और सावधानियाँ

पपीते की रोपाई वर्ष में तीन बार—जून–जुलाई, अक्टूबर–नवंबर तथा मार्च–अप्रैल में की जा सकती है। किंतु बिहार जैसे क्षेत्रों में जून–जुलाई में रोपाई से बचना चाहिए, क्योंकि मानसून के दौरान खेत में पानी ठहरने की संभावना अधिक रहती है। पपीते के पौधे जलभराव के प्रति अत्यंत संवेदनशील होते हैं। यदि खेत में 24 घंटे से अधिक समय तक पानी जमा रहे तो पौधों की जड़ें सड़ जाती हैं और फसल नष्ट हो जाती है।
इसलिए अक्टूबर–नवंबर में पपीते की रोपाई सर्वाधिक उपयुक्त मानी जाती है। इस समय मौसम संतुलित रहता है, जिससे पौधों की वृद्धि सुचारु रूप से होती है और रोगों का प्रकोप भी कम रहता है। पपीते के लिए 20 से 30 डिग्री सेल्सियस तापमान सबसे उपयुक्त है। बलुई दोमट मिट्टी, जिसमें जलनिकास अच्छा हो और जिसका पीएच मान 6.0 से 7.5 के बीच हो, पपीते की खेती के लिए सर्वोत्तम मानी जाती है।
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खेत की तैयारी और पौध रोपण

रोपाई से पहले खेत की गहरी जुताई कर खरपतवार एवं कीटों को नष्ट कर दें। प्रत्येक पौधे के लिए लगभग 60 सेंटीमीटर गहरा, चौड़ा और लंबा गड्ढा खोदें। गड्ढे की मिट्टी में 10 से 15 किलो सड़ी गोबर की खाद, 200 ग्राम सिंगल सुपर फॉस्फेट, 100 ग्राम म्यूरेट ऑफ पोटाश और 50 ग्राम नीम खली मिलाएँ। रोपाई से एक माह पहले गड्ढों को भरकर खुला छोड़ दें ताकि सूर्य के ताप से हानिकारक कीट मर जाएँ।
15 से 20 सेंटीमीटर ऊँचाई वाले स्वस्थ पौधे रोपें। बीज या पौधों को लगाने से पूर्व फफूंदनाशी और कीटनाशी दवाओं से उपचारित करना चाहिए। रोपाई के बाद खेत में जल निकास की उचित व्यवस्था रखें। गर्मियों में सप्ताह में एक बार तथा सर्दियों में दस से पंद्रह दिन के अंतराल पर सिंचाई आवश्यक है।
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रोग एवं कीट प्रबंधन

पपीते में रिंग स्पॉट विषाणु और पर्ण संकुचन (लीफ कर्ल) जैसी बीमारियाँ अत्यंत हानिकारक हैं। ये रोग एफिड (चूसक कीट) और सफेद मक्खी जैसे वाहकों से फैलते हैं। इन रोगों के प्रबंधन हेतु डॉ. राजेंद्र प्रसाद केंद्रीय कृषि विश्वविद्यालय, पूसा एवं आईसीएआर–एआईसीआरपी (फ्रूट्स) द्वारा विकसित तकनीकें अत्यंत प्रभावी सिद्ध हुई हैं।
सबसे पहले रोग सहिष्णु किस्मों का चयन करना आवश्यक है। पूसा में किए गए परीक्षणों से यह पाया गया है कि ‘रेड लेडी’ किस्म रिंग स्पॉट विषाणु के प्रति सर्वाधिक सहिष्णु है और इसकी उत्पादकता भी उच्च होती है। पौध तैयार करने के लिए नेट हाउस या पाली हाउस का प्रयोग करें, जिससे एफिड का नियंत्रण सरल हो जाता है।
रोपाई ऐसे समय करनी चाहिए जब एफिड की संख्या न्यूनतम हो—आमतौर पर मार्च–अप्रैल या सितंबर–अक्टूबर में। खेत की मेंड़ों पर ज्वार, बाजरा, मक्का या ढैंचा लगाने से एफिड के प्रसार में बाधा उत्पन्न होती है। रोगग्रस्त पौधों को तुरंत उखाड़कर जला देना चाहिए, अन्यथा यह संक्रमण का स्रोत बन जाते हैं।
एफिड नियंत्रण के लिए इमीडाक्लोप्रिड दवा की एक मिली मात्रा प्रति लीटर पानी में घोलकर 15 दिन के अंतराल पर छिड़काव करें। पपीते को वार्षिक फसल के रूप में ही उगाएँ, क्योंकि बहुवर्षीय फसल के रूप में रखने पर रोग का संचय बढ़ जाता है। मृदा में कार्बनिक पदार्थों की अधिकता से रोग की तीव्रता में कमी आती है। साथ ही मिट्टी की जांच कर जिंक और बोरॉन की कमी अवश्य दूर करें, जिससे फल सुडौल एवं गुणवत्तापूर्ण बनते हैं।
सिल्वर या काले रंग की प्लास्टिक शीट से मल्चिंग करने से भी एफिड का प्रकोप घटता है, क्योंकि यह परावर्तन के कारण पंखदार कीटों को खेत से दूर रखता है। यद्यपि ये सभी उपाय रोग को पूरी तरह समाप्त नहीं करते, लेकिन इसकी तीव्रता कम कर देते हैं और फसल अधिक समय तक स्वस्थ रहती है।
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उपयुक्त किस्में और उनकी विशेषताएँ

देशी किस्मों में रांची, बारवानी और मधु बिंदु प्रमुख हैं। विदेशी किस्मों में सोलो, सनराइज, सिन्टा और रेड लेडी अत्यधिक लोकप्रिय हैं। ‘रेड लेडी’ किस्म रोग सहिष्णु, शीघ्र फल देने वाली और उच्च उपज वाली है। पूसा संस्थान द्वारा विकसित ‘पूसा नन्हा’ पपीते की बौनी प्रजाति है, जो केवल 30 सेंटीमीटर की ऊँचाई से फल देना प्रारंभ करती है। ‘सीओ–7’ गायनोडायोसिस प्रजाति का पौधा है, जो 52 सेंटीमीटर की ऊँचाई से फल देना शुरू करता है और प्रति पौधा 100 से अधिक फल देता है। इन किस्मों से प्रति हेक्टेयर 300–340 टन तक उपज प्राप्त की जा सकती है।
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अंतरवर्तीय खेती: अतिरिक्त लाभ का अवसर

पपीते के पौधों के बीच पर्याप्त स्थान रहता है, जिसका उपयोग अंतरवर्तीय फसलों के लिए किया जा सकता है। प्याज, पालक, मेथी, मटर, लोबिया जैसी फसलें पपीते के साथ लगाकर किसान अतिरिक्त आय अर्जित कर सकते हैं। इन फसलों से न केवल आय बढ़ती है, बल्कि मिट्टी की उर्वरता और नमी संरक्षण में भी मदद मिलती है।
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फसल चक्र और मिट्टी का स्वास्थ्य

एक बार पपीते की फसल लेने के बाद उसी खेत में लगातार दो से तीन वर्ष तक पपीते की खेती नहीं करनी चाहिए। एक ही स्थान पर लगातार खेती करने से मिट्टी में रोगजनक सूक्ष्मजीवों का संचय होता है और फलों का आकार छोटा पड़ने लगता है। अतः फसल चक्र में दलहनी या सब्जी फसलें अवश्य लें, जिससे मिट्टी की उर्वरता बनी रहे।
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अंत मे ......

पपीता एक उच्च लाभ देने वाली नकदी फसल है, लेकिन इसमें सफलता तभी मिलती है जब किसान समय, जल प्रबंधन, रोग नियंत्रण और उन्नत कृषि तकनीकों का पालन करें। अक्टूबर–नवंबर में पपीते की रोपाई सबसे सुरक्षित मानी जाती है, क्योंकि इस समय जलभराव का खतरा नहीं होता और रोगों का प्रकोप न्यूनतम रहता है।
वैज्ञानिक पद्धति अपनाकर किसान प्रति एकड़ दो से तीन लाख रुपये तक का शुद्ध लाभ कमा सकते हैं। अतः कहा जा सकता है—
“सावधानी, विज्ञान और सही समय का संग-पपीते की खेती बनेगी किसानों का उम्दा रंग।”
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20/10/2025

Celebrating my 7th year on Facebook. Thank you for your continuing support. I could never have made it without you. 🙏🤗🎉

दीपावली की हार्दिक शुभकामनाएं ll आइए इस दीपावली की अपने मिलवाती आहार को घर से निकाल फेंगे, शुद्ध और प्राकृतिक आहार ग्रहण...
20/10/2025

दीपावली की हार्दिक शुभकामनाएं ll

आइए इस दीपावली की अपने मिलवाती आहार को घर से निकाल फेंगे, शुद्ध और प्राकृतिक आहार ग्रहण करे l अपने परिवार को निरोगी जीवन जीने का उपहार दे ll

शुभ दीपावली
श्री दीप ज्योति जैविक किसान परिवार

26/09/2025

सोयाबीन के लिए प्रदेश में लागू होगी "भावांतर योजना" : मुख्यमंत्री डॉ. मोहन यादव

✅किसानों को मिलेगा भावांतर योजना का लाभ
✅किसानों का कल्याण राज्य सरकार की प्राथमिकता

मुख्यमंत्री डॉ. मोहन यादव ने कहा है कि किसानों का कल्याण मध्यप्रदेश सरकार की सर्वोच्च प्राथमिकता है। सोयाबीन उत्पादक किसानों के लिए भावान्तर योजना लागू की जा रही है। किसानों को किसी भी हालत में घाटा नहीं होने देंगे।

मुख्यमंत्री डॉ. यादव ने कहा कि हमारी सरकार किसानों को सोयाबीन का उचित मूल्य दिलवाने के लिए प्रतिबद्ध है। प्रधानमंत्री श्री नरेन्द्र मोदी ने सोयाबीन के लिए एमएसपी प्रति क्विंटल 5328 रुपए घोषित की है। किसान संघों के सुझाव पर राज्य सरकार ने निर्णय लिया है कि इस वर्ष सोयाबीन के किसानों को भावान्तर का लाभ दिया जाएगा।

भावांतर योजना में पंजीयन होगा आवश्यक

मुख्यमंत्री डॉ. यादव ने कहा कि किसान पहले की भांति मंडियों में सोयाबीन का विक्रय करेगा। अगर एमएसपी से कम कीमत पर सोयाबीन बिकता है तो किसानों के घाटे की भरपाई भावान्तर योजना के तहत सरकार द्वारा की जाएगी। फसल के विक्रय मूल्या और न्यूनतम समर्थन मूल्य MSP के अन्तर की राशि सीधे सरकार देगी। उन्होंने कहा कि भावांतर योजना में किसानों के पंजीयन की प्रक्रिया शीघ्र प्रारंभ की जा रही है।

ऐसे होगा क्षतिपूर्ति का आकलन

यदि मंडी में औसत गुणवत्ता की कृषि उपज का विक्रय मूल्य न्यूनतम समर्थन मूल्य से कम हो लेकिन राज्य सरकार द्वारा घोषित औसत मॉडल भाव से अधिक हो तो किसान को केवल न्यूनतम समर्थन मूल्य और वास्तविक बिक्री मूल्य के अंतर की क्षतिपूर्ति दी जाएगी।

यदि मंडी में कृषि उपज का विक्रय मूल्य राज्य सरकार द्वारा घोषित औसत मॉडल भाव से भी कम हो तो किसान को न्यूनतम समर्थन मूल्य और घोषित औसत मॉडल भाव के अंतर की क्षतिपूर्ति दी जाएगी।

किसानों के साथ सदैव खड़ी है राज्य सरकार

मुख्यमंत्री डॉ. यादव ने कहा कि पूर्व में भी फसलों की क्षति पर किसानों को राहत राशि प्रदान की गई है। किसान हितैषी निर्णय पहले भी लिए गए हैं। बाढ़ से प्रभावित किसानों को भी सहायता दी गई। सकंट की घड़ी में किसानों के साथ सरकार सदैव खड़ी है। पीले मोजेक से हुए नुकसान के लिए भी सर्वे करवाया जा रहा है। किसानों को प्रभावित फसलों के लिये आवश्यक राहत प्रदान की जाएगी।

Dr Mohan Yadav
Aidal Singh Kansana
Jansampark Madhya Pradesh
CM Madhya Pradesh
Ministry of Agriculture & Farmer’s Welfare, Government of India

27/08/2025

हल छट स्पेशल बिना जुताई की खीरा लौकी
देशी फार्म उज्जैन 9424099101

प्राकृतिक सोनामोती ( पैगंबरी ) गेहूं की खेती lइस वर्ष जो किसान साथी– सोनामोती की प्राकृतिक खेती करना चाहते है  वे किसान ...
22/08/2025

प्राकृतिक सोनामोती ( पैगंबरी ) गेहूं की खेती l

इस वर्ष जो किसान साथी– सोनामोती की प्राकृतिक खेती करना चाहते है वे किसान श्री दीप ज्योति जैविक किसान प्रोड्यूसर कंपनी लि में पंजीयन करवाए l

पंजीकृत किसान को एक एकड़ का बीज FPO द्वारा *मयभुगतान दिया जाएगा* एवं उत्पादन फिर से FPO द्वारा खरीदा जाएगा I

अधिक जानकारी हेतु संपर्क करें 🙏
श्री दीप ज्योति जैविक किसान प्रोड्यूसर कंपनी लि

CEO दीपक राव 9770834465
जैविक खेती विशेषज्ञ

राजाराम गोयल 9424099101
जैविक बाजार हेड
डायरेक्टर: देशी फार्म उज्जैन

सोना मोती के स्वास्थ्य लाभ 👇
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