26/10/2025
"अक्टूबर–नवंबर में पपीता लगाने से पहले सोचें-समझें-फिर करें रोपण!"
प्रोफेसर (डॉ.) एस. के. सिंह
विभागाध्यक्ष, पोस्ट ग्रेजुएट विभाग, प्लांट पैथोलॉजी एवं नेमेटोलॉजी एवं पूर्व सह निदेशक अनुसंधान , डॉ. राजेंद्र प्रसाद केंद्रीय कृषि विश्वविद्यालय, पूसा, समस्तीपुर, बिहार
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किसानों में पपीते की बढ़ती लोकप्रियता
हाल के वर्षों में किसानों में पारंपरिक गेहूं–धान की खेती से हटकर फल, फूल और सब्जियों की खेती की प्रवृत्ति तेजी से बढ़ी है। इनमें पपीता एक ऐसी नकदी फसल के रूप में उभरा है, जिसने किसानों को उच्च आय का भरोसा दिया है। इसके औषधीय और पौष्टिक गुणों के कारण बाजार में इसकी मांग निरंतर बनी रहती है। यही कारण है कि किसानों को विपणन की कोई कठिनाई नहीं होती।
हालांकि यह समझना आवश्यक है कि पपीते की खेती में लाभ तभी संभव है जब इसे वैज्ञानिक ढंग से किया जाए। बिना पूरी जानकारी के पपीता लगाने से कभी-कभी किसानों को भारी आर्थिक नुकसान उठाना पड़ सकता है। अतः अक्टूबर–नवंबर के मौसम में रोपाई से पहले इसकी संपूर्ण जानकारी अत्यंत आवश्यक है।
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पपीते की खेती क्यों करें?
पपीता आम के बाद विटामिन ‘ए’ का सर्वश्रेष्ठ स्रोत है। इसमें पाया जाने वाला एंजाइम ‘पपेन’ औषधीय दृष्टि से अत्यंत महत्वपूर्ण है, जो पाचन सुधारने, घाव भरने, औषधि और सौंदर्य प्रसाधन उद्योगों में उपयोग होता है। पपीते का नियमित सेवन कोलेस्ट्रॉल को नियंत्रित करता है, डायबिटीज़ रोगियों के लिए उपयोगी है और वजन घटाने में मदद करता है।
पपीता एक तेज़ी से फल देने वाली नकदी फसल है। रोपाई के आठ से दस महीने के भीतर ही पौधे फल देने लगते हैं। औसतन एक पौधे से 70 से 80 किलोग्राम तक पपीता प्राप्त होता है। प्रति एकड़ खेती पर लगभग एक से डेढ़ लाख रुपये की लागत आती है और किसानों को दो से तीन लाख रुपये तक का शुद्ध लाभ प्राप्त हो सकता है।
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रोपाई का उपयुक्त समय और सावधानियाँ
पपीते की रोपाई वर्ष में तीन बार—जून–जुलाई, अक्टूबर–नवंबर तथा मार्च–अप्रैल में की जा सकती है। किंतु बिहार जैसे क्षेत्रों में जून–जुलाई में रोपाई से बचना चाहिए, क्योंकि मानसून के दौरान खेत में पानी ठहरने की संभावना अधिक रहती है। पपीते के पौधे जलभराव के प्रति अत्यंत संवेदनशील होते हैं। यदि खेत में 24 घंटे से अधिक समय तक पानी जमा रहे तो पौधों की जड़ें सड़ जाती हैं और फसल नष्ट हो जाती है।
इसलिए अक्टूबर–नवंबर में पपीते की रोपाई सर्वाधिक उपयुक्त मानी जाती है। इस समय मौसम संतुलित रहता है, जिससे पौधों की वृद्धि सुचारु रूप से होती है और रोगों का प्रकोप भी कम रहता है। पपीते के लिए 20 से 30 डिग्री सेल्सियस तापमान सबसे उपयुक्त है। बलुई दोमट मिट्टी, जिसमें जलनिकास अच्छा हो और जिसका पीएच मान 6.0 से 7.5 के बीच हो, पपीते की खेती के लिए सर्वोत्तम मानी जाती है।
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खेत की तैयारी और पौध रोपण
रोपाई से पहले खेत की गहरी जुताई कर खरपतवार एवं कीटों को नष्ट कर दें। प्रत्येक पौधे के लिए लगभग 60 सेंटीमीटर गहरा, चौड़ा और लंबा गड्ढा खोदें। गड्ढे की मिट्टी में 10 से 15 किलो सड़ी गोबर की खाद, 200 ग्राम सिंगल सुपर फॉस्फेट, 100 ग्राम म्यूरेट ऑफ पोटाश और 50 ग्राम नीम खली मिलाएँ। रोपाई से एक माह पहले गड्ढों को भरकर खुला छोड़ दें ताकि सूर्य के ताप से हानिकारक कीट मर जाएँ।
15 से 20 सेंटीमीटर ऊँचाई वाले स्वस्थ पौधे रोपें। बीज या पौधों को लगाने से पूर्व फफूंदनाशी और कीटनाशी दवाओं से उपचारित करना चाहिए। रोपाई के बाद खेत में जल निकास की उचित व्यवस्था रखें। गर्मियों में सप्ताह में एक बार तथा सर्दियों में दस से पंद्रह दिन के अंतराल पर सिंचाई आवश्यक है।
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रोग एवं कीट प्रबंधन
पपीते में रिंग स्पॉट विषाणु और पर्ण संकुचन (लीफ कर्ल) जैसी बीमारियाँ अत्यंत हानिकारक हैं। ये रोग एफिड (चूसक कीट) और सफेद मक्खी जैसे वाहकों से फैलते हैं। इन रोगों के प्रबंधन हेतु डॉ. राजेंद्र प्रसाद केंद्रीय कृषि विश्वविद्यालय, पूसा एवं आईसीएआर–एआईसीआरपी (फ्रूट्स) द्वारा विकसित तकनीकें अत्यंत प्रभावी सिद्ध हुई हैं।
सबसे पहले रोग सहिष्णु किस्मों का चयन करना आवश्यक है। पूसा में किए गए परीक्षणों से यह पाया गया है कि ‘रेड लेडी’ किस्म रिंग स्पॉट विषाणु के प्रति सर्वाधिक सहिष्णु है और इसकी उत्पादकता भी उच्च होती है। पौध तैयार करने के लिए नेट हाउस या पाली हाउस का प्रयोग करें, जिससे एफिड का नियंत्रण सरल हो जाता है।
रोपाई ऐसे समय करनी चाहिए जब एफिड की संख्या न्यूनतम हो—आमतौर पर मार्च–अप्रैल या सितंबर–अक्टूबर में। खेत की मेंड़ों पर ज्वार, बाजरा, मक्का या ढैंचा लगाने से एफिड के प्रसार में बाधा उत्पन्न होती है। रोगग्रस्त पौधों को तुरंत उखाड़कर जला देना चाहिए, अन्यथा यह संक्रमण का स्रोत बन जाते हैं।
एफिड नियंत्रण के लिए इमीडाक्लोप्रिड दवा की एक मिली मात्रा प्रति लीटर पानी में घोलकर 15 दिन के अंतराल पर छिड़काव करें। पपीते को वार्षिक फसल के रूप में ही उगाएँ, क्योंकि बहुवर्षीय फसल के रूप में रखने पर रोग का संचय बढ़ जाता है। मृदा में कार्बनिक पदार्थों की अधिकता से रोग की तीव्रता में कमी आती है। साथ ही मिट्टी की जांच कर जिंक और बोरॉन की कमी अवश्य दूर करें, जिससे फल सुडौल एवं गुणवत्तापूर्ण बनते हैं।
सिल्वर या काले रंग की प्लास्टिक शीट से मल्चिंग करने से भी एफिड का प्रकोप घटता है, क्योंकि यह परावर्तन के कारण पंखदार कीटों को खेत से दूर रखता है। यद्यपि ये सभी उपाय रोग को पूरी तरह समाप्त नहीं करते, लेकिन इसकी तीव्रता कम कर देते हैं और फसल अधिक समय तक स्वस्थ रहती है।
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उपयुक्त किस्में और उनकी विशेषताएँ
देशी किस्मों में रांची, बारवानी और मधु बिंदु प्रमुख हैं। विदेशी किस्मों में सोलो, सनराइज, सिन्टा और रेड लेडी अत्यधिक लोकप्रिय हैं। ‘रेड लेडी’ किस्म रोग सहिष्णु, शीघ्र फल देने वाली और उच्च उपज वाली है। पूसा संस्थान द्वारा विकसित ‘पूसा नन्हा’ पपीते की बौनी प्रजाति है, जो केवल 30 सेंटीमीटर की ऊँचाई से फल देना प्रारंभ करती है। ‘सीओ–7’ गायनोडायोसिस प्रजाति का पौधा है, जो 52 सेंटीमीटर की ऊँचाई से फल देना शुरू करता है और प्रति पौधा 100 से अधिक फल देता है। इन किस्मों से प्रति हेक्टेयर 300–340 टन तक उपज प्राप्त की जा सकती है।
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अंतरवर्तीय खेती: अतिरिक्त लाभ का अवसर
पपीते के पौधों के बीच पर्याप्त स्थान रहता है, जिसका उपयोग अंतरवर्तीय फसलों के लिए किया जा सकता है। प्याज, पालक, मेथी, मटर, लोबिया जैसी फसलें पपीते के साथ लगाकर किसान अतिरिक्त आय अर्जित कर सकते हैं। इन फसलों से न केवल आय बढ़ती है, बल्कि मिट्टी की उर्वरता और नमी संरक्षण में भी मदद मिलती है।
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फसल चक्र और मिट्टी का स्वास्थ्य
एक बार पपीते की फसल लेने के बाद उसी खेत में लगातार दो से तीन वर्ष तक पपीते की खेती नहीं करनी चाहिए। एक ही स्थान पर लगातार खेती करने से मिट्टी में रोगजनक सूक्ष्मजीवों का संचय होता है और फलों का आकार छोटा पड़ने लगता है। अतः फसल चक्र में दलहनी या सब्जी फसलें अवश्य लें, जिससे मिट्टी की उर्वरता बनी रहे।
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अंत मे ......
पपीता एक उच्च लाभ देने वाली नकदी फसल है, लेकिन इसमें सफलता तभी मिलती है जब किसान समय, जल प्रबंधन, रोग नियंत्रण और उन्नत कृषि तकनीकों का पालन करें। अक्टूबर–नवंबर में पपीते की रोपाई सबसे सुरक्षित मानी जाती है, क्योंकि इस समय जलभराव का खतरा नहीं होता और रोगों का प्रकोप न्यूनतम रहता है।
वैज्ञानिक पद्धति अपनाकर किसान प्रति एकड़ दो से तीन लाख रुपये तक का शुद्ध लाभ कमा सकते हैं। अतः कहा जा सकता है—
“सावधानी, विज्ञान और सही समय का संग-पपीते की खेती बनेगी किसानों का उम्दा रंग।”
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