शुद्ध घी स्वास्थ्यवर्धक घी और तेल हमारे रसोईघर के प्रमुख स्थायी सदस्य माने जा सकते है। उनके उपयोग से शरीर में रुक्षता कम होती है तथा स्निग्धता बढ़ती है। पहले हमारे देश में शुद्ध देशी गाय का घी पर्याप्त मात्रा में उपलब्ध होता था तथा पौष्टिक भोजनों में उसका बहुत उपयोग होता था। जनसाधारण शारीरिक श्रम अधिक करता था, अतः उनमें घी को पचाने की क्षमता होती थी। शुद्ध देशी घी को भोजन में ताकत का महत्त्वपूर्ण
स्रोत समझा जाता था। कमजोर व्यक्तियों को विशेषकर सर्दी की मौसम में घी के उपयोग का परामर्ष दिया जाता था। देशी गाय का घी आक्सीजन का अच्छा स्रोत होता है। गोबर के कंड़ों के साथ चावल डाल घी से धुआं करने पर आक्सीजन इथेलिन आॅक्साईड, प्रोपलीन आॅक्साईड जैसी उपयोगी गैस बनती है जिससे पर्यावरण शुद्धि होती है। सोते समय नथुनों में घी डालने से श्वसन संबंधी रोगों में षीघ्र लाभ होता है। स्वयं अपने विद्यार्थी जीवन में सर्दियों में घी का नियमित पान किया है। आज भी तपस्या के पारणें में दूध अथवा उकाली (सोंठ, कालीमीर्च, गर्म मसालों आदि) के उबले पानी में घी मिलाकर पीने का प्रचलन है, जिससे भोजन नली की रूक्षता दूर होती है। गर्भवती महिलाओं, कमजोर व्यक्तियों को प्रत्यक्ष रूप से हमारे अनुभवी पूर्वज घी खाने का परामर्श देते हैं। शुद्ध देशी घी कीटाणु नाशक होता है। उसके उपयोग से काॅलस्ट्रोल नहीं बढ़ता। गाय के अवयवों से चिकित्सा करने वाले (पंच गव्य चिकित्सक) शुद्ध देशी गाय के घी से विभिन्न असाध्य रोगों का सफल उपचार करते हैं। वे हृदय रोगियों को भी ऐसे घी के प्रयोग का निशेध करने के बजाय, उपयोग हेतु परामर्श देते हैं। शुद्ध घी की मालिश शरीर में रोगाणुओं को दूर कर त्वचा को स्निग्ध बनाती है। प्रजनन के पश्चात् आज भी ग्रामीण महिलाओं में घी की मालिश का प्रचलन होता है। मानसिक रोगियों के सिर पर शुद्ध देशी घी की मसाज का परामर्श दिया जाता है। नाक में घी की बूंदें डालने से श्वसन संबंधी रोगों तथा नाभि केन्द्र पर घी की बूंदें डालने से पेट के विकार दूर होते हैं। घी मालिश से रक्त पित्त दूर हो जाता है। घी त्वचा के छिद्रों में प्रवेश कर सर्व देह को शांति पहुँचाता है, जिससे त्वचागत रोग दूर होते हैं। सार्थ योगरत्नाकर भाग 1 के श्लोक नं. 5 में इस बात की पुष्टि की गयी है। तैलाभ्यंग श्लेश्म वात प्रणाशी, पित्तं रक्तं नाशयेद्वा घृतष्य। देह सर्वं तर्पयेद्रोम कूपै-वैंवण्र्या दिख्यात रोगापकर्षी।। हम प्रायः अनुभव करते है कि जिन व्यक्तियों ने शुद्ध देशी घी का अपने यौवनावस्था में सेवन किया अथवा आज भी करते हैं, वे वृद्धावस्था में भी आधुनिक युवा व्यक्तियों की अपेक्षा अधिक परिश्रम करने की क्षमता रखते है। उनके जोड़ों में अपेक्षाकृत कम रोग होते हैं। इसीलिये तो कहा जाता है कि इन्होंने देशी घी खाया है, ऐसा कथन और मान्यता आज भी प्रायः सुनने को मिलती है। परन्तु भ्रामक विज्ञापनों एवं पश्चिम की मान्यताओं के अन्धाःनुकरण से ग्रस्त आधुनिक चिकित्सकों के एक पक्षीय चिन्तन तथा गो हत्या के समर्थकों द्वारा देशी गाय की नस्ल को अनुपयोगी बतलाने की साजिश के कारण अपने अज्ञानवश जीवनोपयोगी इस तत्त्व से आज जाने अनजाने हम वंचित हो रहे हैं। दूध को भी मांसाहारी बतलाने की साजिश हो रही है। दूध की मलाई से परहेज कराया जा रहा है। जिस पर समग्र दृष्टिकोण से चिन्तन एवं शोध अज्ञानवश है। वास्तव में शुद्ध देशी घी स्वास्थ्य के लिये शक्तिवर्धक होता है। आज जिस घी से परहेज रखने को कहा जाता है उसका तात्पर्य नकली अथवा रासायनिक पदार्थो से बने घी से ही होता है। परन्तु हमारे अज्ञान, सरकारी नीतियों के कारण देशी गाय का शुद्ध घी मिलना आज कल बहुत कठिन हो गया है। जो कुछ शुद्ध घी के नाम से बाजार में उपलब्ध होता है उसमें भी मिलावट की प्रबल संभावना रहती है। दूसरी तरफ पश्चिम की देखा-देखी हमारे यहाँ भी रासायनिक पदार्थो से मिश्रित घी के रूप में जो उपलब्ध होता है, उसकी तुलना देशी गाय के शुद्ध घी से नहीं की जा सकती। नकली घी खाने का दुष्परिणाम होता है, शरीर में कोलस्ट्रोल आदि रक्त के विकारों का बढ़ना। इसी कारण आधुनिक चिकित्सक शायद हृदय और रक्त संबंधी रोगों में घी के प्रयोग का स्पश्ट निषेध करते हैं। शुद्ध देशी घी के प्रयोग से कोलस्ट्रोल नहीं बढ़ता अपितु कम होता है।