रूप बदलती पल पल पर जो/
आचार्य आशुतोष जी आशु
रूप बदलती पल पल पर जो, सत्य कहूं तो कैसे कह दूं।
प्रकृति पल्लवित रूप मनोहर, सत्य कहूं तो कैसे कह दूं। ।
पल पल जन्मे मरे यह तन भी, सत्य कहूं तो कैसे कह दूं।।
नश्वर सारा जीव जगत यह, सत्य कहूं तो कैसे कह दूं। ।
यह संसार असार है माया, जीव जगत इसमें बौराया।
अहंकार मद दम्भ के बस में, सत्य कभी भी जान न पाया। ।
रावण भी कुछ रोक न पाया, सत्य कहूं तो कैसे कह दूं।
रूप बदलती पल पल0।।
सांसों की माला में पोया, हंसा यह छन छन, छन छन रोया।
सुख दुख हानि लाभ नित झूले, छन पाया तो छन ही खोया। ।
जो देखा वह सच ना होता, सत्य कहूं तो कैसे कह दूं।
रूप बदलती पल पल0।।
संसृति यह माया की नगरी, अधजल छलकत सी यह गगरी।
स्वप्न सदृस चलता है सब कुछ, सपनों से हैं नगर व नगरी। ।
परिवर्तन ही प्रकृति है इसकी, सत्य कहूं तो कैसे कह दूं।
रूप बदलती पल पल0।।
पानी का बुदबुद जग स
रिधि सिधिपते पादपंकज नतोहं/ आचार्य आशुतोष आशु गजाननाय लम्बोदराय गणाधिपाय शिवासुताय| विघ्नं बिनासाय शोकादि नासाय, रिधिसिधि पते पाद पंकज नतोहं|| सुग्रीव समशील दयाद्रभावं प्रभा प्रदीप्तं सुसुमेरु तुल्यं| शिव शिवाया नेहोत्कृष्टं गणेशरूपं शत शत नतोहं|| प्रथमैव पूजन शुभकार्य संतत अक्षीण यशसा निर्विघ्न जातं| विद्या विधाताय तुष्टिम् प्रदाताय रिधि सिधिपते पादपंकज नतोहं|| खेदो अखेदं भेदो अभेदं विद्या विनयशील कल्याणकर्तुम्| चिन्ता सुचित्या विमुक्तकारी रिधि सिधि पते पाद पंकज नतोहं|| शेषा अशेषा परदेश देशा ध्यानेन भक्तेन बिहितो सुकार्यः| भवत्येति सिद्धं सर्वेव ग्यातं गणेशरूपं शत शत नतोहं||