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हे दयामय दीन-दुख हर, द्रवित हो वर दीजिये। भक्त अपने कर कृपा निज, शरण अपनी लीजिये। ।संसार सृंसति सकल संप्रति, नाथ अतिशय  ...
06/11/2023

हे दयामय दीन-दुख हर, द्रवित हो वर दीजिये।
भक्त अपने कर कृपा निज, शरण अपनी लीजिये। ।

संसार सृंसति सकल संप्रति, नाथ अतिशय क्षुब्ध है।
धर्म बिह्वल हो चला है, बेधर्मता अति लुब्ध है। ।

अज्ञान का तम जगत छाया, लक्ष्य की बिध्वंशता।
विश्व युद्धों की रही हो, हर जगह आशंकता। ।

भ्रष्टता की श्रेष्ठता का, छद्म ही पहचान अब।
परमार्थ माया मोह में फंस, गा रहा अज्ञान अब। ।

है सनातन संकटों में, आसरा है आपका।
राक्षस इकट्ठे हो रहे हैं, घट भरे हैं पाप का। ।

आ आ समय पर आपने, उद्धार सबका है किया।
आसु तब ही आसरा यह आपका ही है लिया।
स्वरचित, आचार्य आशुतोष जी आशु

जो गहन गर्त में गिरा नहीं/आचार्य आशुतोष जी आशु*********************जो गहन गर्त में गिरा नहीं वह ऊपर चढ़ना क्या जाने।जो ठ...
29/10/2023

जो गहन गर्त में गिरा नहीं/
आचार्य आशुतोष जी आशु
*********************
जो गहन गर्त में गिरा नहीं वह ऊपर चढ़ना क्या जाने।
जो ठोकर खाकर बैठ गया वह आगे बढ़ना क्या जाने।।
स्वप्निल सागर की प्रवल लहर छन छन आ आ टकराती है।
ऊंचे नीचे दायें बायें निज जल ऊपर भटकाती है।।
जो पोत पवन ना झेल सका वह नाविक चलना क्या जानें।
जो गहन गर्त में गिरा नहीं 0।।
तरु ग्रीषम वर्षा शिशिर वात सह मास वसन्त महकता है।
सरदी गरमी बरसा सहकर अपना विकास नित करता है।।
जो प्रकृति कोप से दहल गया वह फुलना फलना क्या जाने।।
जो गहन गर्त में गिरा नहीं 0।।
आती सन्ध्या तम निखर धरा डूबे नित घन ही अन्धकार।
सोते नीरव जन पशु पक्षी पंखों में अपने शीस डार।।
जो कुम्भकरन की नींद भरा वह सूर्य निकलना क्या जाने।
जो गहन गर्त में गिरा नहीं 0।।
मावस का शशि निस्तेज हुआ जा सिंधु छिपाता शिर अपना।
घटता बढ़ता बढ़ता घटता आता जाता है क्या कहना।।
संकोच हो तिल तिल बढ़ने का पूनम का खिलना क्या जाने।
जो गहन गर्त में गिरा नहीं 0।।
तन मानव लख चौरासी मेंं मस्तिष्क व्योम में घर ढूंढे।
उर्जा अन्तस्थल धरा व्योम खींच स्वप्न के पर खींचे।।
जो अपनी नींव न उठा सका मानव कहलाना क्या जाने।
जो ठोकर खाकर बैठ गया 0।।

शिवोहं भजामि शिवोहं भजामि          आचार्य आशुतोष आशु ************************धराधीर वीरं सुधीरं सुधीयं                  ...
29/10/2023

शिवोहं भजामि शिवोहं भजामि
आचार्य आशुतोष आशु
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धराधीर वीरं सुधीरं सुधीयं
सदानन्दचिद्दैक तत्वं पुनीतं|
महामोह ममतादि नित्यं बिरक्तं
शिवोहं भजामि शिवोहं भजामि ||1||

महायोग योगी योगैव स्थित
योगेव भक्तौ लह सारतत्वं |
तत्वं पुनत्वं यो जीवधारिम्
शिवोहं भजामि शिवोहं भजामि ||2||

ग्यानेव बीजं ग्यानेव रूपं
ग्यानेव आनन्द परमं निधानं|
दातार अवतार सर्वेव संतत
शिवोहं भजामि शिवोहं भजामि ||3||

जपेन साध्यं तपेन साध्यं
ग्यानेन ध्यानेन भावेन साध्यं||
सः आशुतोषो हृदयो पुनीतो
शिवोहं भजामि शिवोहं भजामि ||4||

करुणालया सः वरुणालया सः
श्री सच्चिदानन्द घन सत्यरूपं|
मूक्तीम् भुक्तीम् हद्यासुधारा
शिवोहं भजामि शिवोहं भजामि ||5||

वायुर्यमो अग्नि वरुणो शशाकं
सर्वेव ध्यानेन सुधया सुरतया |
संसार सागर भवपार लक्छे
शिवोहं भजामि शिवोहं भजामि ||6||

बाघम्बरं वा दिगम्बरं वा
चर्माम्बरमेव मुदितं प्रशन्नं|
बिमुक्त चिन्ता चित चारु संतत
शिवोहं भजामि शिवोहं भजामि ||7ll

उठो सपूतो सजन सृष्टि का/ आचार्य आशुतोष जी आशु ********************उठो सपूतो  सृजन  सृष्टि  का, ताक  रहा  है ओर  तुम्हारी...
29/10/2023

उठो सपूतो सजन सृष्टि का/
आचार्य आशुतोष जी आशु
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उठो सपूतो सृजन सृष्टि का, ताक रहा है ओर तुम्हारी।
भोग नहीं यह योग योग्य तन, तुम ही पहले बढ़ो अगारी।।

रिसि मुनियों की पावन धरती, हम सब रिसीयों की सन्तानें।भ्रमित हुये पथ लक्ष्य नहीं कुछ, भटक रहे जाने अनजाने।।
जीवन तन अनमोल रतन यह, करें व्यर्थ हम बनें अनारी।।
उठो सपूतो सृजन सृष्टि का0।।

होता है विष बमन शमन का, नाम नहीं परिचय पाता।
काम क्रोध मद लोभ भ्रष्टता,बना है सबका अति प्रिय नाता।।
जूझ रही है आज शिष्टता, दहके स्वारथ की अंगारी।
उठो सपूतो सृजन सृष्टि का0।।

वैभव बिहंस रहा भ्रष्टों में, शिष्टों में रोटी के लाले।
वन उपवन श्रंगार लुटे हैं, नजर न आते है पर बाले।।
ठूंठ हुई जातीं जग प्रतिभा, जल-स्रोतों में भी दुश्वारी।
उठो सपूतो सृजन सृष्टि का0।।

आसु असीमित साहस धन तू, सेज शोक की सोता क्यों।
रुके न सूरज चांद प्रकृति पथ, तेज रहित तू रुकता क्यों।।
माफ नहीं इतिहास करेगा, सूखेगी जब जल की क्यारी।
उठो सपूतो सृजन सृष्टि का0।।
स्वरचित, आचार्य आशुतोष जी आशु

मां शारदे काव्य मंंच द्वारा सम्मानित करने के लिये धन्यवाद। आचार्य आशुतोष जी आशु
25/09/2023

मां शारदे काव्य मंंच द्वारा सम्मानित करने के लिये धन्यवाद।
आचार्य आशुतोष जी आशु

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