26/12/2025
यहाँ अपराधी अकेला नहीं होता,
कुर्सियों पर बैठा मौन भी दोषी होता है।
जब चीखें काग़ज़ों में दबा दी जाएँ,
तब सिस्टम भी अपराधी होता है।
उन्नाव की सड़कों ने सब देखा,
न्याय ने आँखें फेर लीं।
सत्ता की छाया में पलता पाप,
और सच की आवाज़ कुचल दी गई।
जिसने लूटी अस्मत, वह खुला घूमता रहा,
जिसने सच कहा, वही जलाई गई।
यह कैसा न्याय, कैसी व्यवस्था,
जहाँ पीड़िता ही बार-बार मारी गई।
क़ानून किताबों में सोता रहा,
संवेदनाएँ फाइलों में खो गईं।
सेंसर बना बैठा जो रखवाला था,
उसकी चुप्पी सबसे बड़ी सज़ा हो गई।
कवच बना जब ताक़तवरों के लिए,
तो न्याय नंगा क्यों खड़ा रहा?
पूछता है आज हर ज़िंदा ज़मीर,
क्या अपराध से बड़ा ओहदा रहा?
यह कविता केवल उन्नाव की नहीं,
हर उस बेटी की है कहानी।
जब तक मौन टूटेगा नहीं,
तब तक शर्मिंदा रहेगी ये राजधानी, ये दुनिया, ये इंसानी।
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