26/05/2025
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"बचपन में मैं नहीं जानता था कि मेरे पिता कितने मशहूर थे। क्योंकि उन्होंने हमें फ़िल्म इंडस्ट्री से दूर रखा था। हालांकि हमें ये पता था कि वो एक्टर हैं। और हम ये भी जानते थे कि उनके साथ मुंबई के किसी पब्लिक प्लेस में जाना मुश्किल बात है। मेरी मां और पिता, दोनों की फ़ैमिलीज़ में सब एक्टर्स ही हैं। अगर हमें चिड़ियाघर जाना होता था तो हम सुबह साढ़े छह बजे तक पहुंच जाया करते थे। और लोगों की भीड़ आने से पहले ही हमें वापस आना पड़ता था।"
शशि कपूर जी के बड़े पुत्र व खुद भी एक्टर रह चुके कुणाल कपूर ने कई साल पहले पत्रकार पैट्सी एन. को दिए एक इंटरव्यू में अपने पिता व दिग्गज एक्टर रहे शशि कपूर जी को याद करते हुए कई दिलचस्प बातें उनके बारे में बताई थी। उस इंटरव्यू के कुछ अंश आज किस्सा टीवी के इस लेख में आपको पढ़ने को मिलेंगे। हमें यकीन है कि किस्सा टीवी की ये पेशकश आपको पसंद आएगी। आज शशि कपूर जी का जन्मदिवस है साथियों। 18 मार्च 1938 को शशि कपूर जी का जन्म हुआ था। शशि कपूर जी को समर्पित किस्सा टीवी का ये लेख आपको पसंद आएगा, ऐसी हमें पूरी उम्मीद है। चलिए कुणाल कपूर जी के शब्दों में ही शशि कपूर जी की कहानी आगे बढ़ाते हैं।
"डैड ने कभी संडे को काम नहीं किया। संडे को सारा दिन वो फ़ैमिली के साथ रहते थे। हम सब साथ में खाना खाते थे। संडे के दिन अपने किसी दोस्त को वो घर नहीं बुलाते थे। लेट 1970s और अर्ली 1980s में वो बहुत काम कर रहे थे। वो छह शिफ़्टों में काम करते थे। तब हम लोग साथ में ब्रेकफ़स्ट करते थे। सुबह साढ़े सात बजे हमारे ब्रेकफ़ास्ट का टाइम होता था। वो चाहे रात को किसी भी समय आएं, सुबह साढ़े सात बजे तक ब्रेकफ़ास्ट टेबल पर आ जाते थे। हमारे जीवन का अभिन्न हिस्सा थे हमारे पिता। वो फ्रैंडली थे। स्ट्रिक्ट नहीं थे।"
"बहुत कम पिता होते हैं हमारी संस्कृति में जो अपने बच्चों के साथ इतना क्लॉज़ रिश्ता रखते हैं। किस्मत से हमारा रिश्ता उनके साथ बहुत ग्रेट था। मैं भी अपने बच्चों के साथ ऐसा ही रिश्ता रखता हूं। अपने बेटे की बॉटम तक मैंने अपने हाथों से धोई है। उसकी नैप्पीज़ बदली हैं। डैड के साथ मेरा रिश्ता ऐसा ही था। हालांकि उनका अपने डैड के साथ ऐसा रिश्ता नहीं था।"
"जब किसी फ़िल्म के आउटडोर शूट के लिए उन्हें जाना पड़ता था तो वो कोशिश करते थे कि शूटिंग तब शुरू हो जब हमारे स्कूल की छुट्टियां भी हों। ताकि वो हमें भी साथ ले जाया करें। मगर हम शूटिंग पर नहीं जाते थे। होटल में ही रुकते थे। फ्री होकर डैड हमें घुमाते थे। या मम्मी घुमाया करती थी। आजकल तो सुबह जल्दी ही शूटिंग शुरू हो जाती है। मगर उन दिनों शूटिंग साढ़े नौ बजे शुरू होती थी और चार बजे शाम तक खत्म हो जाती थी। साथ रहने का खूब टाइम मिलता था।"
"पांच-छह सालों तक हम लगातार गर्मियों की छुट्टियों में डैडी के साथ कश्मीर गए थे। उनकी शूटिंग चलती रहती थी वहां। वो शूटिंग करते थे और हम मां के साथ रहते थे। जब मुंबई में होते थे तो वो हमें ब्रीच कैंडी पूल क्लब ले जाते थे। आप कह सकते हैं कि हम तीनों भाई बहन वहीं बड़े हुए हैं। खूब स्वीमिंग करते थे हम। हम जुहू बीच भी जाते थे। और वहीं पर सारा दिन स्पैंड करते थे।"
"मेरा जन्म 26 जून 1959 को हुआ था। मेरे पैदा होने के बाद डैड फ़िल्मों में आए थे। उससे पहले वो स्टेज नाटकों में काम करते थे। मेरे पैदा होने के बाद उन्होंने चार दीवारी और धर्मपुत्र में काम किया। एज़ ए हीरो धर्मपुत्र उनकी पहली फ़िल्म थी। फिर उन्होंने वक्त में काम किया। जब धर्मपुत्र में उन्हें साइन किया गया था तब कोई भी हीरोइन उनके साथ काम करने को तैयार नहीं हो रही थी। मगर फिर नंदा जी ने उनकी हीरोइन बनना स्वीकार किया। जबकी वो खुद भी उस वक्त की स्टार एक्ट्रेस थी।"
"लोग कहते हैं कि मेरे नाना मेरे मॉम-डैड की शादी से खुश नहीं थे। ये गलत बात है। उन्हें कोई दिक्कत नहीं थी डैड और मॉम की शादी से। उन्हें बस इस बात की फ़िक्र थी कि उनकी हीरोइन चली जाएगी। मेरी मां ही मेरे नाना ज्यॉफ़्री कैंडल की थिएटर कंपनी शेक्सपियराना के सभी नाटकों की हीरोइन हुआ करती थी। मेरे नाना-नानी बहुत अमेज़िंग थे। उनके जैसे लोग मुश्किल से मिलते हैं। दूसरे विश्वयुद्ध के दौरान मेरे नाना ब्रिटिश आर्मी के साथ भारत आए थे। उन्हें भारत बहुत पसंद आया। इसलिए 1950 में वो फिर से भारत लौट आए।"
"शादी करने से पहले मेरे डैड और मॉम, दोनों शेक्सपियराना में ही काम कर रहे थे। वो सिंगापुर गए हुए थे। वहां शो था उनका। उसके बाद मलेशिया जाना था उन्हें। मगर दोनों शोज़ कैंसल हो गए। मॉम-डैड को बहुत बुरा लगा। मॉम-डैड शादी करना चाहते थे। तब राज अंकल ने उन्हें टिकट के पैसे दिए और मुंबई बुला लिया। मुंबई आकर उन्होंने शादी(1958 में) कर ली। दोनों एक-दूजे को बहुत प्यार करते थे। हमेशा एक-दूजे का ख्याल रखते थे। मात्र 50 साल की उम्र में ही मेरी मां जेनिफ़र कैंडल की मौत हो गई थी। डैड उस वक्त 46 साल के ही थे। मां की मौत से हमें बहुत सदमा पहुंचा था। खासतौर पर डैड को। बहुत मुश्किल वक्त था वो।"
"राज कपूर अंकल मेरे डैड से 14 साल बड़े थे। और शम्मी अंकल 7 साल बड़े थे। जबकी डैड का वज़न भी उसी उम्र में बढ़ना शुरू हुआ जिस उम्र में राज अंकल और शम्मी अंकल का बढ़ना शुरू हुआ था। मेरे दादा पृथ्वीराज कपूर को एक्टिंग पसंद थी। वो फ़िल्मों में आ गए। उन्हें फॉलो करते हुए राज अंकल, शम्मी अंकल और डैड भी एक्टिंग की दुनिया में आ गए। बाद में राज अंकल फ़िल्में बनाने लगे। लेकिन शम्मी अंकल और डैड एक्टिंग करते रहे। वो स्टार्स नहीं बनना चाहते थे। बस अच्छे एक्टर्स बनना चाहते थे। उन्हें अपने काम से बहुत प्यार था।"
"1950s में बॉलीवुड में अच्छी फ़िल्में बनती थी। मगर लेट 1970s में फ़िल्मों का स्तर गिरने लगा। डैड ने जब गौर किया कि अब अच्छी फ़िल्में नहीं बन रही हैं, और फ़िल्म इंडस्ट्री बड़े-बड़े धन्ना सेठों के कब्जे में जाने लगी है, तो उन्होंने अपनी फ़िल्म कंपनी "फ़िल्म वालास" शुरू की। डैड ने जुनून, कलयुग, 36 चौरंगी लेन, विजेता, उत्सव और अजूबा का निर्माण किया। मेरे पिता बहुत प्रोफ़ेशनल थे। उनके साथ काम करना सबके लिए आसान था। वो कभी किसी को फ़िल्मस्टार्स वाले नखरे नहीं दिखाते थे। कभी किसी के साथ मिस बिहेव उन्होंने नहीं किया। वो हमेशा पंक्चुअल रहते थे। उनके साथ काम करना सबको अच्छा लगता था।"
"डैड ने सिर्फ़ एक फ़िल्म, अजूबा का डायरेक्शन किया था। उस फ़िल्म की शूटिंग के दौरान सबने मौज की। मुझे नहीं लगता कि वो डायरेक्शन को लेकर सीरियस थे। वो सिर्फ़ एक्टर थे। उसी तरह, वो बिजनेसमैन भी नहीं थे। उन्होंने कुछ अच्छी फ़िल्में ज़रूर बनाई। मगर कास्ट एंड क्य्रू ने उनसे जो डिमांड की, उन्होंने हर डिमांड पूरी की। लेट 60s में एक टाइम ऐसा आया था जब उनके पास काम नहीं था। वो घर पर ही रहते थे अधिकतर समय।"
"उसी दौरान हमने गोवा डिस्कवर किया था। गोवा हमारा आना-जाना होने लगा। मगर पैसे नहीं थे डैड के पास ज़्यादा तो उन्होंने अपनी स्पोर्ट्स कार बेच दी। मां ने भी अपनी चीज़ें बेचनी शुरू कर दी। फिर डैड को शर्मिली फ़िल्म मिली। वो फ़िल्म बड़ी हिट रही। और हमारी फाइनेंशियल दिक्कतें फिर से दूर हो गई। हमारे जीवन में बहुत से अप्स एंड डाउन्स आए थे। मगर हम उनसे घबराए नहीं।"
"आखिरी दिनों में डैड की तबियत बहुत खराब रहती थी। सप्ताह में 3 दफ़ा उन्हें डायलिसिस करानी पड़ती थी। उसी दौरान उन्हें दादासाहेब फ़ाल्के पुरस्कार देने की घोषणा हुई थी। मगर तबियत खराब होने की वजह से वो दिल्ली भी नहीं जा सके थे। डैड ने कई शानदार फ़िल्मों में काम किया। कुछ अच्छी फ़िल्में बनाई। उन्हें दादासाहेब फ़ाल्के अवॉर्ड जल्दी देना चाहिए था। अगर ऐसे अवॉर्ड सही एज में दिए जाएं तो कलाकर को अच्छा लगता है। जब कोई इंसान अपने जीवन के आखिरी सालों में हो और उसे तब कोई अवॉर्ड दिया जाए तो उसके लिए वो अवॉर्ड कोई मायने नहीं रखता। वैसे, डैड ने भी कभी अवॉर्ड्स की परवाह नहीं की थी।"
साथियों 4 दिसंबर 2017 को 79 साल की उम्र में शशि कपूर जी का देहांत हुआ था। और शशि कपूर जी के साथ ही एक दौर भी इस दुनिया से चला गया था। शशि कपूर जी को किस्सा टीवी का नमन। अगर आपने ये लेख यहां तक पढ़ा है तो कमेंट करके अपनी प्रतिक्रिया, अपना फ़ीडबैक अवश्य दीजिएगा। पसंद आया हो तो इस लेख को अधिक से अधिक लोगों तक पहुंचाने में अपना योगदान भी कीजिएगा। यानि लाइक और शेयर कर दीजिएगा इस लेख को। शशि कपूर जी से जुड़ी कोई और अच्छी जानकारी आज मिली तो वो भी ज़रूर शेयर की जाएगी। आपका सहयोग बना रहेगा ऐसी उम्मीद है मुझे।