31/12/2024
साल बीतता है; हम भी थोड़े-थोड़े बीतते जाते हैं; बीतने के साथ ही मन से थोड़ा रीतते भी जाते हैं। बीतने और रीतने से बचना सम्भव नहीं। कोई उमंग, कोई आशा, कोई उपलब्धि पीछे की क्षतिपूर्ति नहीं कर सकती। वास्तव में, "आगे बढ़ना" एक भ्रम है। आगे बढ़ना, स्वयं में "पीछे छूटते जाने" का द्योतन करता है।
जो मरते-मरते बच गए हैं, वे बचते-बचते मर जाएँगे। मार्मिक गुहारों से किसी का दिल नहीं पसीजा करता। आर्तनाद किसी का फ़ैसला नहीं बदलवाया करते। अपराध बोध या तो पैदा होते ही नहीं, अगर होते भी हैं तो इतने प्रबल नहीं कि किसी के सुखवाद पर हावी हो सकें।
ज़्यादा से ज़्यादा क्या, आपको प्रेम के बदले सहानुभूति मिल सकती है; सीने के बदले कन्धा मिल सकता है; अधिकार के बदले सांत्वना मिल सकती है; मदद के बदले दुआएँ मिल सकती हैं; भाव के बदले शब्द मिल सकते हैं। बस, इतना ही।
आप केवल कोशिश करके चीजें नहीं बदल सकते। जिसे जाना है, वो कैसे भी चला ही जाएगा, भले इल्ज़ाम आपके सर मढ़ कर जाए या अपनी खुद की असमर्थता के स्वीकरण का विनम्र चोला ओढ़ कर जाए। व्यक्ति जब पूर्ण समर्पण और प्रेम में भी यह कहे कि वह आपके लिए कुछ भी कर सकता है तब ही यह समझा जाना चाहिए कि वह कह रहा है कि वह अपने लिए कुछ भी कर सकता है।
किसी सुखद भ्रम में स्वयं को पोषित करने से बेहतर है कि दुःखद वास्तविकता में ख़ुद को अभ्यस्त किया जाए। कोई किसी का दुःख न छाँट सकता है, न बाँट सकता है।
सपने दिखाकर नींद छीन लेना भी नियति का पसन्दीदा खेल है। यूँ भी, कोई अपने सुख की निर्लज्जता में डूब मरेगा, कोई अपने दुःख के घमण्ड में धराशायी हो जाएगा।
आकस्मिकता सबसे बड़ा नियोजन है; अनिश्चितता सबसे बड़ी निश्चितता है। अन्त में समय से स्थिति हार ही जाती है।
ऐ बीते हुए साल और ऐ बीतने वाले साल !
केवल दिसम्बर ही नहीं है संतप्त, ये जनवरी भी रोएगा अब की बरस दिसम्बर में।
नया साल।