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चैक से धोखाधड़ी 😭
01/07/2025

चैक से धोखाधड़ी 😭

01/12/2024

जब हमे खाद और कीटनाशकों वाले फ़सल नुकसान पहुंचा सकती है, तो बीमार और संक्रमित जीवों को खाने से स्वस्थ्य कैसे रहें?

27/10/2024
 #बुद्ध का चचेरा भाई था : देवदत्त। बचपन से बुद्ध के साथ खेला, बड़ा हुआ। लड़े भी होंगे, झगड़े भी होंगे, एक-दूसरे को कभी मारा...
26/10/2024

#बुद्ध का चचेरा भाई था : देवदत्त। बचपन से बुद्ध के साथ खेला, बड़ा हुआ। लड़े भी होंगे, झगड़े भी होंगे, एक-दूसरे को कभी मारा भी होगा, एक-दूसरे को कभी पटका भी होगा—सब कुछ हुआ होगा, दोनों बराबर उम्र के थे, साथ-साथ बड़े...एक ही महल में बड़े हुए। फिर बुद्ध तो तथागत हो गए, परम ज्ञान को उपलब्ध हुए,

देवदत्त के मन में बड़ी ईष्या जगी। उसने कहा‌ : जो बुद्ध कर सकते हैं, वह मैं भी कर सकता हूं। तो वह आ कर बुद्ध से दीक्षित हुआ। लेकिन दीक्षित होने में काइयांपन था; चालबाजी थी, दुकानदारी थी। वह दीक्षित हुआ कि जरा ठीक से देख लूं,
आखिर बुद्ध की प्रतिष्ठा का राज क्या है? क्या खाते हैं, क्या पीते हैं, क्या पहनते हैं; कब सोते, कब उठते; क्या-क्या करते हैं, ठीक से जांच कर लूं, साल-छह महीने में सब मेरी समझ में आ जाएगा; फिर मैं भी वही करूंगा। मैं भी बुद्ध हो जाऊंगा।

और साल-छह महीने में...देवदत्त बुद्धिमान आदमी था...उसने बुद्ध की ठीक से जांच-पड़ताल कर ली। ठीक से निरीक्षण कर लिया: ऐसे उठते, ऐसे बैठते, ऐसे चलते। वैसे ही उठने लगा, वैसे ही बोलने लगा, वैसे ही चलने लगा—बुद्ध की बिलकुल ही अनुकृति हो गया।

और तब कुछ लोग उससे प्रभावित भी होने लगे। अंधों की दुनिया है! इस अंधों की दुनिया में काने भी राजे हो जाते हैं। अंधों की दुनिया में काना ही राजा हो सकता है। आंखवालों को तो अंधे बर्दाश्त ही नहीं करते। अंधा समझौता कर लेता है काने से कि चलो, तुम आधे-आधे, आधे हम जैसे। कम-से-कम आधे तो हम जैसे!

देवदत्त का और सब व्यवहार तो अज्ञानी का था, मूर्च्छित का था, लेकिन उठता था, बैठता था, चलता था, बोलता था...बड़े सुभाषित बोलता था। वचन, परिमार्जित थे। भाषा, सुगठित थी, सुडौल थी। उद्धरण देता था परम शास्त्रों के। व्याख्या, अनूठी थी! विश्लेषण, गहरा था! तर्क, प्रतिष्ठित, प्रतिभापूर्ण।

अंधे साथ होने लगे! देवदत्त को भी पांच सौ शिष्य मिल गए। और जब पांच सौ शिष्य मिल गए, तो देवदत्त का असली अहंकार प्रकट हुआ जो अब तक छिपा था। उसने घोषणा कर दी: मैं भी बुद्ध हूं।

बुद्ध को खबर मिली, बुद्ध बहुत हंसे। बुद्ध ने कहा, मेरे जैसा चलना, मेरे जैसा उठना, मेरे जैसा बोलना—ऐसे कोई बुद्ध होता है! दो बुद्ध कभी एक-जैसे उठते हैं, एक-जैसे बैठते हैं, एक-जैसे चलते हैं! इस तरह तो पाखंड पैदा होता है।

और देवदत्त पागल है, ठीक, मगर ये पांच सौ लोग जो बुद्ध को छोड़कर देवदत्त के साथ हो लिए, इनके लिए क्या कहो?

देवदत्त बुद्ध को छोड़ कर अलग हो गया। उसने अपने अलग धर्म की घोषणा कर दी। मगर जल्दी ही वे लोग बिखर गए। और देवदत्त जब मरा तो पछताता हुआ मरा। बहुत पीड़ा में मरा। एक महा अवसर खो गया। मरते वक्त उसे समझ आई बात, बड़ी देर से समझ में आई बात, कि मैं ऊपर-ऊपर का आचरण सीख लिया, अंतस का दीया तो जला ही नहीं।

आचरण कितना ही तुम सुव्यवस्थित कर लो, इससे अंतस का दीया नहीं जलेगा। आचरण को सुव्यवस्थित करना ऐसा ही है जैसे कोई दीए की तसवीर बना ले...सुंदर तसवीर बना ले, प्यारे-प्यारे रंग भर दे, फिर उस तसवीर को ले जाकर अपने कमरे में टांग ले—अंधेरा उस तसवीर से प्रभावित नहीं होगा। अंधेरा उस तसवीर से डरेगा नहीं। तस्वीरों से कहीं अंधेरा भगा है? तसवीर टंगी रहेगी और अंधेरा कुंडली मार कर बैठा रहेगा। असली दीया चाहिए। फिर चाहे असली दीया मिट्टी का हो और तसवीर सोने की बनी हो।

असली दीया चाहिए। फिर चाहे असली दीया दो कौड़ी का हो और तसवीर पर हीरे-जवाहरात जड़े हों। तो भी अंधेरा असली दीए को पहचानेगा। असली दीए को पहचानते ही बाहर हो जाएगा। बाहर हो जाना ही पड़ेगा। असली दीए के पास आने का उपाय नहीं है।

ओशो; सपना ये संसार

24/10/2024
24/10/2024

आकांक्षाओं के अनुपात में आदमी गरीब होता है। उसी अनुपात में दुखी होता है। फिर तुम्हारी आकांक्षाएं बहुत है। सुंदरतम देह होनी चाहिए; तो गरीब हो गए, तो कुरुप हो गए। धन होना चाहिए, तो निर्धन हो गए। महल होना चाहिए, तो जिस मकान में रहते है थे वह झोपड़ा हो गया। झोपड़पट्टी हो गया। एक सुंदर स्त्री होनी चाहिए, क्लियोपैत्रा जैसी सुंदर हो, कि नुरजहां हो, कि मुमताज महल हो, बस तुम्हारी स्त्री एकदम कुरुप हो गई। बेढंगी हो गई। तुम्हारा बेटा अलबर्ट आइंस्टीन जैसा बुद्धिमान हो, बस, अड़चन हो गई। अब तुम्हारा बेटा बुद्धू हो गया। अब तुम दुख ही दुख में घिरे जा रहे हो। फिर तुम हिसाब लगा सकते हो। अपनी फेरहिस्त बनाना कि क्या- क्या तुम चाहते हो, जिससे तुम सुखी हो जाओगे ? उसी के कारण तुम दुखी हो।

जरा फेरहिस्त को विदा कर दो, तुम्हारा बेटा तुम्हारा बेटाहै, अलबर्ट आइंस्टीन से क्या लेना-देना? और अगर तुम किसी से तुलना न करो, और जो आशा नहीं करता; वह तुलना नहीं करता; तुलना आशा की छाया है--तब तुम्हारा बेटा जैसा है वैसा है।

जरा भी दुख देने वाला नहीं है। कोई कारण दुख का नहीं रह गया। तुम्हारे पास दस हजार रूपये हैं, तो तुम दस हजार से जो सुख ले सकते हो, लोगे। क्योंकि ऐसे लोग है बहुत, जिनके पास दस रुपये भी नहीं हैं। और जिनके पास दस रुपये नहीं हैं, वे सोचते हैं, दस हजार हो जाएं तो सुखी हो जाएंगे। और तुम जरा सोचो, तुम्हारे पास दस हजार हैं, मगर तुम सुखी कहां हो? और तुम सोचते हो, दस अरब हो जाए तो हम सुखी हो जाएंगे--तो एण्ड्रू कारनेगी का विचार करना। एंण्ड्रू कारनेगी के पास दस अरब रुपये हैं, सुखी कहां है?

तुम्हारी तुलनाओं को विदा करके देखो और तुम अचानक पाओगे, दुख के पहाड़ कट गए, छंट गए।

बुध्द ने कहा है : तृष्णा दुख का मूल है। तो एक बात--तृष्णा जितनी बड़ी होगी, उतना बड़ा दुख होता चला जाता है।

दूसरी बात--तुम अगर तृष्णाओं को किसी तरह पूरी भी कर लो, सारी जिंदगी दुख उठा-उठा कर, नरक झेल-झेल कर, भीख मांग-मांग कर, चोरी करके, बेईमानी करके, सब तरह की जालसाजियां करके किसी तरह तुम महल में पहुंच जाओ, तो भी तुम सुखी न हो सकोगे। क्योंकि वासना का दूसरा रंग भी समझ लो।

जो मिल जाती है, वासना उसी को भूल जाती है। जो नहीं मिलती उसी को याद रखती है। दस हजार है तो लाख की मांग करती हैं। जब लाख हो जाएंगे तो दस लाख की मांग करेगी। तुम्हारा और तुम्हारी वासना का अंतर सदा उतना ही रहता है जितना पहले था-उसमें अंतर नहीं पड़ता। वासना और मनुष्य के बीच जो संबंध है, वह क्षितिज जैसा है। जैसे दूर पास ही कुछ मील चलकर आकाश जुड़ता हुआ लगता है पृथ्वी से।

तुम सोचते हो घंटे दो घंटे चलूंगा तो पहुंच जाउंगा जहां आकाश जमीन से मिलता है। या बहुत होगा तो सांझ, सुबह चलूंगा तो सांझ तक पहुंच जाऊंगा। मगर तब तुम कभी नहीं पहुंच पाओगे क्योंकि जितने तुम आगे बढ़ जाओगे उतना ही क्षितिज आगे बढ़ जाता है। क्षितिज कहीं है ही नहीं, सिर्फ आभास है।

ऐसे ही तुम्हारी वासना बढ़ती जाती है। तुम झोपड़े में हो, तो मकान मांगती है; मकान में होते हो तो महल मांगती है, महल में हो जाते हो, और बड़ा महल मांगती है। वासना का अर्थ है, ‌और... और...और... । वह वासना का स्वरुप है। वह कभी भी नहीं कहती कि बस, पर्याप्त। पर्याप्त शब्द वासना को आता ही नहीं। वह उसकी भाषा में नहीं है।

ओशो

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