24/05/2025
राही को कौन राह दिखाबे, जब राहें खुद अनजान हों, हर मोड़ पे साया हो सन्नाटे का, हर साँझ में तूफ़ान हों।
मन के अंदर सवाल उठे हैं, उत्तर सब गुमसुम से हैं, हर चेहरा मुसकान लिए, पर दिल के ज़ख्म पुरानी धुन से हैं।
चलते-चलते थक सा गया हूँ, ना कोई साथी, ना कोई आवाज़, इस जंगल में खुद को ढूंढूं, या पूछ रस्तों से कुछ राजः।
शायद कोई दीप जलेगा, किसी मोड़ पर देर से सही, पर जब तक उम्मीद ज़िंदा है, तब तक ये राही भी हारे नहीं।