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07/12/2025

पुष्यमित्र शुंग : सनातन धर्म के महान रक्षक, भारतमाता के चिरंजीवी वीर पुत्र

जय घोष करो उस महान ब्राह्मण वीर का, जिसने जब समस्त आर्यावर्त म्लेच्छों की लूट और बौद्ध अहिंसा के पंगु बन चुके साम्राज्य के कारण मृतप्राय हो रहा था, तब एक तलवार के प्रचंड वार से अधर्म के अंतिम मौर्य सम्राट का संहार कर स्वयं सिंहासन पर विराजमान होकर घोषणा की थी –
“अब भारत में फिर से वेदों की गर्जना गूँजेगी, यज्ञ की ज्वाला प्रज्वलित होगी और म्लेच्छों का रक्त सिंधु तक बहाया जाएगा!”

पुष्यमित्र शुंग कोई साधारण सेनापति नहीं थे। वे भारद्वाज गोत्र के परम तेजस्वी ब्राह्मण थे – एक ओर वेद-वेदांग, मीमांसा-न्याय के महापंडित, दूसरी ओर महान धनुर्धर जिनकी प्रत्यंचा की टंकार से यवन सेनाएँ थर्राती थीं। जब अशोक के कमजोर उत्तराधिकारियों ने अहिंसा के नाम पर सेना को हथियार त्यागने का आदेश दे दिया, जब सैनिक भिक्षुओं जैसे जप-तप करने लगे, जब पाटलिपुत्र से लेकर तक्षशिला तक यूनानी घुड़सवार बिना किसी विरोध के लूट-खसोट मचा रहे थे, जब मंदिर तोड़े जा रहे थे, यज्ञ बंद हो चुके थे, ब्राह्मणों का खून सड़कों पर बहाया जा रहा था – ठीक उसी काल में भगवान विष्णु ने स्वयं पुष्यमित्र के हृदय में अवतार लिया। जैसे परशुराम ने इक्कीस बार पृथ्वी को अधर्मी सहस्त्रबाहु जैसे क्षत्रिय-अहंकार से मुक्त किया था, वैसे ही पुष्यमित्र ने विष्णु-कृपा से वह महाकार्य किया जो उस युग में कोई क्षत्रिय भी न कर सका।

उस ऐतिहासिक दिन जब बृहद्रथ सेना की परेड देख रहा था, पुष्यमित्र ने एक ही प्रचंड वार में उस अहिंसक, कायर्यावर्त-विरोधी सम्राट का सिर धड़ से अलग कर दिया। वह वार केवल तलवार का नहीं था – वह सनातन धर्म की पुनर्जीवित ज्वाला का पहला अंगारा था। उसी क्षण से भारत में नया जन्म ले रहा था।
पुष्यमित्र ने जो किया, वह कोई साधारण राज्य-परिवर्तन नहीं था – वह था धर्म का महाप्रलय और फिर सतयुग की पुनर्स्थापना।

उन्होंने तुरंत लाखों सैनिकों की विशाल सेना खड़ी की।
यवनों को पटक-पटक कर मारा। मेनांडर जैसे बलशाली यूनानी सम्राट को भी पराजित कर सिंधु पार खदेड़ दिया।
मथुरा, साकेत, उज्जयिनी, विदिशा – सभी को म्लेच्छों के पंजे से मुक्त कर फिर से वैदिक संस्कृति के दीपस्तंभ बनाया।
सैकड़ों-हजारों वैदिक पाठशालाएँ खोलीं, यज्ञशालाएँ बनवाईं, ब्राह्मणों को हज़ारों ग्राम दान किए।

दो अश्वमेध यज्ञ किए – वह घोषणा थी कि अब भारत फिर से चक्रवर्ती साम्राज्य है, कोई यवन, शक या पार्थियन यहाँ आँख उठाकर नहीं देख सकता।
बौद्धों पर अत्याचार का एक भी प्रामाणिक स्रोत नहीं है। हाँ, पुष्यमित्र ने बौद्ध धर्म को राज्य-संरक्षण देना बंद कर दिया – क्योंकि वह राज्य-संरक्षण ही भारत को गुलाम बनाने का हथियार बना हुआ था। इसके विपरीत, उन्होंने बौद्धों को भी अपने-अपने विहारों में शांतिपूर्वक रहने दिया, पर राजकोष था केवल सनातन वैदिक धर्म का। यही धर्म नीति थी – न अत्याचार, न सहिष्णुता की भीख।

पुष्यमित्र के कारण ही भारत ने सैकड़ों वर्ष और विदेशी गुलामी से अपनी रक्षा की। यदि पुष्यमित्र न होते तो आज समस्त भारत बौद्ध अहिंसा के कारण यूनानी, फिर पार्थियन, फिर कुशाण साम्राज्य का एक प्रांत बन चुका होता। न वेद बचते, न यज्ञ बचते, न मंदिर बचते। गंगा-यमुना का जल भी म्लेच्छों के घोड़ों की नालों से रौंदा जाता।
पुष्यमित्र शुंग कोई साधारण राजा नहीं थे। वे थे साक्षात भगवान विष्णु के भेजे हुए धर्म-रक्षक अवतार, परशुराम के बाद सबसे प्रचंड ब्राह्मण योद्धा, जिन्होंने अपने रक्त से भारत को फिर से सोने की चिड़िया बनाया।
हे भारतमाता के अमर सपूत पुष्यमित्र शुंग!
तुम्हारी तलवार की चमक आज भी हमारे हृदय में जल रही है।

तुमने सिद्ध कर दिया कि जब-जब धर्म पर संकट आएगा, तब-तब एक ब्राह्मण योद्धा खड़ा होगा और म्लेच्छों का संहार करके सनातन धर्म को पुनः प्रतिष्ठित करेगा।

19/11/2025
कौन सी धातु के बर्तन में भोजन करने से क्या क्या लाभ और हानि होती है।                         *सोना*सोना एक गर्म धातु है।...
09/03/2025

कौन सी धातु के बर्तन में भोजन करने से क्या क्या लाभ और हानि होती है।

*सोना*

सोना एक गर्म धातु है। सोने से बने पात्र में भोजन बनाने और करने से शरीर के आन्तरिक और बाहरी दोनों हिस्से कठोर, बलवान, ताकतवर और मजबूत बनते है और साथ साथ सोना आँखों की रौशनी बढ़ता है।

*चाँदी*

चाँदी एक ठंडी धातु है, जो शरीर को आंतरिक ठंडक पहुंचाती है। शरीर को शांत रखती है इसके पात्र में भोजन बनाने और करने से दिमाग तेज होता है, आँखों स्वस्थ रहती है, आँखों की रौशनी बढती है और इसके अलावा पित्तदोष, कफ और वायुदोष को नियंत्रित रहता है।

*कांसा*

काँसे के बर्तन में खाना खाने से बुद्धि तेज होती है, रक्त में शुद्धता आती है, रक्तपित शांत रहता है और भूख बढ़ाती है। लेकिन काँसे के बर्तन में खट्टी चीजे नहीं परोसनी चाहिए खट्टी चीजे इस धातु से क्रिया करके विषैली हो जाती है जो नुकसान देती है। कांसे के बर्तन में खाना बनाने से केवल ३ प्रतिशत ही पोषक तत्व नष्ट होते हैं।

*तांबा*

तांबे के बर्तन में रखा पानी पीने से व्यक्ति रोग मुक्त बनता है, रक्त शुद्ध होता है, स्मरण-शक्ति अच्छी होती है, लीवर संबंधी समस्या दूर होती है, तांबे का पानी शरीर के विषैले तत्वों को खत्म कर देता है इसलिए इस पात्र में रखा पानी स्वास्थ्य के लिए उत्तम होता है. तांबे के बर्तन में दूध नहीं पीना चाहिए इससे शरीर को नुकसान होता है।

*पीतल*

पीतल के बर्तन में भोजन पकाने और करने से कृमि रोग, कफ और वायुदोष की बीमारी नहीं होती। पीतल के बर्तन में खाना बनाने से केवल ७ प्रतिशत पोषक तत्व नष्ट होते हैं।

*लोहा*

लोहे के बर्तन में बने भोजन खाने से शरीर की शक्ति बढती है, लोह्तत्व शरीर में जरूरी पोषक तत्वों को बढ़ता है। लोहा कई रोग को खत्म करता है, पांडू रोग मिटाता है, शरीर में सूजन और पीलापन नहीं आने देता, कामला रोग को खत्म करता है, और पीलिया रोग को दूर रखता है. लेकिन लोहे के बर्तन में खाना नहीं खाना चाहिए क्योंकि इसमें खाना खाने से बुद्धि कम होती है और दिमाग का नाश होता है। लोहे के पात्र में दूध पीना अच्छा होता है।

*स्टील*

स्टील के बर्तन नुक्सान दायक नहीं होते क्योंकि ये ना ही गर्म से क्रिया करते है और ना ही अम्ल से. इसलिए नुक्सान नहीं होता है. इसमें खाना बनाने और खाने से शरीर को कोई फायदा नहीं पहुँचता तो नुक्सान भी नहीं पहुँचता।

*एलुमिनियम*

एल्युमिनिय बोक्साईट का बना होता है। इसमें बने खाने से शरीर को सिर्फ नुक्सान होता है। यह आयरन और कैल्शियम को सोखता है इसलिए इससे बने पात्र का उपयोग नहीं करना चाहिए। इससे हड्डियां कमजोर होती है. मानसिक बीमारियाँ होती है, लीवर और नर्वस सिस्टम को क्षति पहुंचती है। उसके साथ साथ किडनी फेल होना, टी बी, अस्थमा, दमा, बात रोग, शुगर जैसी गंभीर बीमारियाँ होती है। एलुमिनियम के प्रेशर कूकर से खाना बनाने से 87 प्रतिशत पोषक तत्व खत्म हो जाते हैं।

*मिट्टी*

मिट्टी के बर्तनों में खाना पकाने से ऐसे पोषक तत्व मिलते हैं, जो हर बीमारी को शरीर से दूर रखते थे। इस बात को अब आधुनिक विज्ञान भी साबित कर चुका है कि मिट्टी के बर्तनों में खाना बनाने से शरीर के कई तरह के रोग ठीक होते हैं। आयुर्वेद के अनुसार, अगर भोजन को पौष्टिक और स्वादिष्ट बनाना है तो उसे धीरे-धीरे ही पकना चाहिए। भले ही मिट्टी के बर्तनों में खाना बनने में वक़्त थोड़ा ज्यादा लगता है, लेकिन इससे सेहत को पूरा लाभ मिलता है। दूध और दूध से बने उत्पादों के लिए सबसे उपयुक्त हैमिट्टी के बर्तन। मिट्टी के बर्तन में खाना बनाने से पूरे १०० प्रतिशत पोषक तत्व मिलते हैं। और यदि मिट्टी के बर्तन में खाना खाया जाए तो उसका अलग से स्वाद भी आता है।

पानी पीने के पात्र के विषय में 'भावप्रकाश ग्रंथ' में लिखा है....

*जलपात्रं तु ताम्रस्य तदभावे मृदो हितम्।*
*पवित्रं शीतलं पात्रं रचितं स्फटिकेन यत्।*
*काचेन रचितं तद्वत् वैङूर्यसम्भवम्।*
(भावप्रकाश, पूर्वखंडः4)

अर्थात् पानी पीने के लिए ताँबा, स्फटिक अथवा काँच-पात्र का उपयोग करना चाहिए। सम्भव हो तो वैङूर्यरत्नजड़ित पात्र का उपयोग करें। इनके अभाव में मिट्टी के जलपात्र पवित्र व शीतल होते हैं। टूटे-फूटे बर्तन से अथवा अंजलि से पानी नहीं पीना चाहिए।

05/06/2024

#छत्रपति #ताराबाई #भोसले
जिन्हें छत्रपति शिवाजी महाराज की पुत्रवधू के रूप में जाना जाता है, 18वीं सदी में मराठा इतिहास में महत्वपूर्ण व्यक्ति थे। 1675 में जन्मी, वह मुग़ल साम्राज्य से मराठा साम्राज्य के संघर्षों के दौरान प्रमुख भूमिका निभाई। छत्रपति शिवाजी के मृत्यु के बाद, मराठा साम्राज्य को मुग़ल साम्राज्य के हमलों का सामना करना पड़ा।

ताराबाई के पति, राजाराम प्रथम, छत्रपति के रूप में शिवाजी की सफलता के बाद उनके राज्य का प्रभार संभाला, लेकिन मुग़ल हमलों को नियंत्रित करने में मुश्किलों का सामना किया। 1700 में राजाराम की मृत्यु के बाद, ताराबाई ने मुगलो के खिलाफ मराठा लोगों को नेतृत्व करने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई।

उनकी निर्देशक क्षमताएँ और सामर्थ्य का परिचय उनकी सामरिक ( युद्ध-नीति-विषयक ) उपलब्धियों में दिया गया। उनका उदाहरण, मुग़ल बल के खिलाफ लड़ाई में स्थानीय समर्थन और मुघल हमलों के प्रतिरोध में महत्वपूर्ण था।

उनके प्रमुख उपलब्धियों में 1700 में कोल्हापुर की लड़ाई शामिल है, जहां उन्होंने मुग़ल सेना के खिलाफ सफलतापूर्वक मराठा प्रबलबल की रक्षा की। विविध चुनौतियों का सामना करते हुए भी, ताराबाई ने मराठा साम्राज्य की रक्षा करने के लिए अपने उत्साह और योजनात्मक दक्षता का परिचय दिया।

ताराबाई का इतिहास सिर्फ सामरिक ( युद्ध-नीति-विषयक ) उपलब्धियों तक ही सीमित नहीं है। वह शासकीय क्षमताओं के लिए भी प्रसिद्ध थीं और मराठा फाटकांची ( द्वारपाल ) एकता बनाए रखने के प्रयासों में शामिल रहीं। उनके राजकीय कार्यक्षमता और महान दृढ़ता के कारण, उनका युग भारतीय इतिहास में महत्वपूर्ण है, जो महाराष्ट्र और उसके परे की पीढ़ियों को प्रेरित करता है।

ताराबाई का निधन 1761 में हो गया, अपने साहस, दृढ़ता, और नेतृत्व के विरासत छोड़कर, जो महाराष्ट्र और उसके परे के पीढ़ियों को आज भी प्रेरित करता है।

11/03/2024

11.3.2024
प्रत्येक व्यक्ति सदा सुखी रहना चाहता है, दुखी होना कोई भी नहीं चाहता। *"परंतु ईश्वर की न्याय व्यवस्था को न जानने के कारण, वह उल्टे-सीधे काम करता रहता है। दूसरों के साथ न्यायपूर्ण व्यवहार नहीं करता, बल्कि उन पर अन्याय करता रहता है, जिसके कारण ईश्वर की न्याय व्यवस्था से उसे अनेक प्रकार के दुख भोगने पड़ते हैं।"*
*"ईश्वर न्यायकारी है। वह बिना अपराध किए कभी किसी को दंड नहीं देता और अपराध करने पर कभी किसी को माफ भी नहीं करता।" "चाहे वह अपराध जानबूझकर किया गया हो, चाहे अनजाने में किया गया हो। चाहे थोड़ा अन्याय किया गया हो, चाहे अधिक किया गया हो, सभी अपराधों का दंड ईश्वर अवश्य ही देता है। यह ईश्वर की अटल न्याय व्यवस्था है।"*
इस व्यवस्था को लोग नहीं जानते। *"क्यों नहीं जानते? क्योंकि वे इस व्यवस्था को जानने के लिए कोई पुरुषार्थ नहीं करते। वेदादि सत्य शास्त्रों को नहीं पढ़ते। महर्षि दयानंद जी आदि ऋषियों के ग्रंथों को नहीं पढ़ते। इसलिए नहीं जानते। कुछ लोग पढ़ते हैं, परंतु उन्हें वेदों और ऋषियों का वह सत्य समझ में नहीं आता। क्यों नहीं आता? इसलिए कि उनका मन शुद्ध नहीं होता।
उनका मन शुद्ध क्यों नहीं होता? क्योंकि वे वेदोक्त सच्चे स्वरूप वाले ईश्वर की उपासना नहीं करते।"*
तो क्या करना चाहिए? *"महर्षि दयानंद जी आदि ऋषियों के ग्रंथों को किसी अच्छे योग्य विद्वान के मार्गदर्शन में पढ़कर, ईश्वर का सही स्वरूप जानना चाहिए। उस पर खूब चिंतन मनन करना चाहिए। उस विद्वान की सहायता से जब आप ईश्वर का स्वरूप ठीक-ठीक समझ लेंगे, तब उस ईश्वर की उपासना करनी चाहिए। उससे आपका मन शुद्ध हो जाएगा।"* फिर आपको पता चलने लगेगा, कि *"कहां-कहां पर व्यवहार में आप अन्याय करते हैं, और कहां-कहां पर न्याय करते हैं। तब न्याय का ही आचरण करें, किसी के साथ भी अन्याय न करें। थोड़ा-सा भी अन्याय न करें।" "यदि थोड़ा भी अन्याय करेंगे, तो थोड़ा दंड मिलेगा। यदि अधिक अन्याय करेंगे, तो दंड भी अधिक मिलेगा। यदि अनजाने में अन्याय करेंगे, तो दंड कम मिलेगा। यदि जानबूझकर अन्याय करेंगे, तो कई गुना अधिक दंड मिलेगा।"*
*"इसलिए वेदोक्त ईश्वर के सच्चे स्वरूप की उपासना करें। एकांत में बैठ कर खूब गहराई से चिंतन मनन करें। ऐसा करने से आपका मन शुद्ध हो जाएगा। तब आप किसी पर भी अन्याय नहीं करेंगे, बल्कि सबके साथ न्यायपूर्ण व्यवहार करेंगे। तब आपको ईश्वर सुख शांति आनन्द देगा, अन्यथा नहीं।"*
---- *"स्वामी विवेकानन्द परिव्राजक, निदेशक दर्शन योग महाविद्यालय, रोजड़, गुजरात।"*

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