03/05/2026
शर्मनाक! तंत्र की संवेदनहीनता ने ली एक और जान"
कोटा के सबसे बड़े अस्पताल में जो हुआ, वह केवल एक हादसा नहीं बल्कि व्यवस्था की क्रूरता है। एक तरफ मरीज जिंदगी की जंग लड़ रहा था, दूसरी तरफ अस्पताल का स्टाफ 'आधार कार्ड' की फाइलें खोल रहा था।
सवाल यह है:
क्या अस्पताल अब सेवा के केंद्र नहीं, कागजी दफ्तर बन गए हैं?
क्या डॉक्टर और स्टाफ के लिए 'नियम' एक इंसान की जान से बड़े हो गए हैं?
आखिर कब तक 'आधार' के अभाव में लोगों को बिना उपचार के मरने के लिए छोड़ दिया जाएगा?