सन्यासी सरकार सुतिक्ष जी महाराज

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20/06/2026
शस्त्र चलाना भी जानता हूँ, और थमाना भी, क्योंकि मैं राम का वंशज, ऋषियों की संतान, दयानन्द का सिपाही और चाणक्य का शिष्य ह...
06/05/2025

शस्त्र चलाना भी जानता हूँ, और थमाना भी, क्योंकि मैं राम का वंशज, ऋषियों की संतान, दयानन्द का सिपाही और चाणक्य का शिष्य हूँ।

22/03/2025

"पुस्तक" व "व्यक्ति "
दोनों को पढना चाहिए
ज्ञान और अनुभव इनसे ही प्राप्त होता है।

13/03/2025

*_होली उत्सव यज्ञीय परम्परा का पवित्रतम् उत्सव..._*
ग्राम आमकी दीपचंदपुर में होली महोत्सव पर सन्यासी सुतिक्ष जी, व अम्बरेश चंदेंना ने यज्ञ,प्रवचन किए।

*भारतीय संस्कृति में 'यज्ञो वै भुवनस्य नाभिः' अर्थात् यज्ञ को सम्पूर्ण ब्रह्मांड के नाभिकेन्द्र की मान्यता है। कहते हैं सम्पूर्ण सृष्टि में सतत यज्ञ का संचालन हो रहा है। यही यज्ञ संस्कृति समाज व्यवस्था, परिवार व्यवस्था एवं जीवन का अंग बने इस निमित्त ऋषियों ने पर्व त्योहारों की परम्परा विकसित की, जनमानस को इससे जोड़ा और इन पर्वों के मूल में स्थापित किया यज्ञीय विधान। दीपावली, रक्षाबंधन, दशहरा, करवाचौथ, नवरात्रि से लेकर प्रत्येक पर्व में यज्ञ का विधान है। होली उत्सव यज्ञीय परम्परा का पवित्रतम् उत्सव कहा जा सकता है।*

*होली भारतवर्ष सहित सम्पूर्ण विश्व में मनाया जाने वाला लोकपर्व है। इसे मन्वन्तरारंभ का भी पर्व कह सकते हैं, यह पर्व जन-जन आंतरिक उल्लास को उभारने के लिए यज्ञीय संकल्प से जुड़कर सांस्कृतिक संदेश भी देता है। इसमें कृषि संस्कृति से लेकर ऋषि मूल्यों तक का समावेश है। प्राचीन समय से प्रचलित इस सार्वभौम पर्व में देश के हर वर्ग, जाति, धर्म एवं संप्रदाय के लोगों को उत्साह व आनन्द की अनुभूति होती है।*

*जीवन को उल्लास के साथ जीने की रीति-नीति का शिक्षण देने वाले इस प्रकृति पर्व पर प्रकृति की सुन्दर छटा बिखरती है, उसी छटा की अभिव्यक्ति हेतु लोग आपस में गुलाल-अबीर से अपनी आन्तरिक पुलकन को प्रकट करते हैं।*

*वैदिक व पौराणिक स्वरूप–*

*वैदिककाल से ही होली पर्व मनाने की परम्परा है। यह पर्व कृषियज्ञ प्रसूत हमारी संस्कृति की अभिव्यक्ति का त्योहार है। इसे नवसस्येष्टी यज्ञ भी कहा जाता है। “तृणाग्नि भ्राष्टर्छपक्व शर्माधायं होलकः” अर्थात् तिनकों की अग्नि में भुने हुए अधपके फली वाले अन्न जिसे ‘होलक’ कहते हैं। होलक को लोक परम्परा में कृषि यज्ञ प्रसाद रूप में ग्रहण करने का विधान है। होलिका शब्द की व्युत्पत्ति इसी होलक शब्द से हुई होगी। इन नवान्न बालियों को प्रज्वलित अग्नि में भूनने की यह यज्ञीय परंपरा अति प्राचीन है, वैदिक ऋचाएं भी यही कहती हैं। पौरोहित्य ग्रन्थों में होली को ‘यवाग्रयन यज्ञ’ नाम से संबोधित किया गया है।*

*वैदिक काल में नवसस्येष्टी यज्ञ ने ही कालान्तर लोक परम्परा में होलिकोत्सव का रूप ले लिया।*

*“गिरा च श्रुष्टिः सभरा असन्नो नेदीय इत्सृण्यः पक्वमेयात्।“*

*सूत्र से जहां ऋग्वेद इस नवान्न महोत्सव की प्राचीनता को वर्णित करता है, वहीं भविष्यपुराण होली को हास्य-विनोद का पर्व बतलाता है-*

*नानारंग मर्येर्वस्त्रैश्चंदनागरु मिश्रितैः*

*अबीरं च गुलालं च मुखे ताम्बूल मसतम्।*

*वशोत्थं, जलमंत्रं च धर्म मंत्रं करैघृतम्।।*
*करैघृतम् गालिदानं तथा हास्य ललनार्त्तनं स्फुटम्।।*

*इससे स्पष्ट है कि होली सदियों से भारतीय जनमानस में रची-बसी है और यह प्रतिवर्ष लोक जीवन की जड़ता को तोड़कर नवीनता, नवउल्लास, उमंग लाने का माध्यम मनता रहा। यह मंत्र इसी संदेश को देते हुए कहता है कि होलिकोत्सव को मनाने के लिए भांति-भांति के सुन्दर व रंगीन वस्त्र पहनें। अबीर, गुलाल, चन्दन एक-दूसरे को लगाएं। हाथों में बांस की पिचकारियों लेकर एक-दूसरे के घर जाएं और उनपर रंग डालें। नर-नारी सभी इस हास्यविनोद के पर्व में शामिल हों।*

*लोक परम्परा में होली–*

*जैमिनी एवं शबर ने भी इसी तरह होली पर्व को वर्णित किया है। अनुसंधान बताते हैं कि ‘होलाका’ उन 20 क्रीड़ाओं में से एक था, जो संपूर्ण भारतभर में किसी समय कई सदी तक प्रचलित था। इसके अनुसार फाल्गुन पूर्णिमा पर लोग इसे पर्व को अनेक रूप में एक-दूसरे के साथ मिलकर मनाते रहे। लिंगपुराण इस पर्व को ‘फाल्गुनिका’ कहकर संबोधित करता है एवं इसे विभूति एवं ऐश्वर्य प्रदायक पर्व मानता है।*

*यद्यपि बंगाल में आज भी इस होली का स्वरूप बिल्कुल भिन्न दिखता है। पर्व में यह परिवर्तन चैतन्य महाप्रभु के प्रभाव से आया। वास्तव में चैतन्य महाप्रभु का जन्म इस दिन होने के कारण यहां होली ढोलयात्र पर्व के रूप में मनाया जाता है। बंगाल में तीन से पांच दिन तक चलने वाले इस पर्व में 16 खम्बों से युक्त मण्डप में भगवान श्री कृष्ण की प्रतिमा स्थापित की जाती है। प्रतिमाओं को पंचामृत से स्नान कराकर रंगों, गुलाल, चन्दन आदि से उसका पूजन किया जाता है, तत्पश्चात सभी मिलकर फाल्गुन शुक्ल चतुर्दशी को रात्रि को आनन्दोत्सव मनाते हैं। दक्षिण भारत में इसे ‘कामदहन पर्व’ के रूप में मनाया जाता है।*

*होली का बहुदेशीय स्वरूप–*

*भारत के बाहर भी होली पर्व जैसे मनाने की परम्परा है, बस इसके रूप अवश्य भिन्न हैं। चीन में इसे “फ़ोश्चेइचिये” कहते हैं। चार दिन तक चलने वाले इस उत्सव में पुराने साल की विदाई एवं नए वर्ष के स्वागत के संकल्प समाहित होते हैं। इस उत्सव की शुरुआत ‘काओशंग’ नामक आतिशबाजी से होती है, तत्पश्चात सभी नर-नारी एक-दूसरे को बधाई देते हैं, मुंह मीठा कराते हैं।*

*कार्निवाल जो लोगों में वर्षभर के तनाव-घुटन से मुक्त करता है–*

*जर्मनी में यह पर्व वसंत के आगमन पर हंसी उमंग एवं मस्ती का पर्व ‘कार्निवाल’ नाम से मनाया जाता है। जर्मनी के सारे शहर 15 दिन तक चलने वाले इस पर्व पर रंगों से सराबोर हो जाते हैं। इस दौरान वहां जगह-जगह मूर्ख सम्मेलन के आयोजन भी किये जाते है। जर्मनवासियों के अनुसार होली जैसा यह कार्निवाल पर्व लोगों में वर्षभर से तनाव-घुटन से मुक्त करने का एक सफल प्रयास रहा है।*

*होली का नैसर्गिक संबंध ऋतुपरिवर्तन से भी है। गर्ग संहिता सहित फागुकाव्य, वसन्तविलास, सूरदास एवं परमानन्द के काव्यों तथा अन्य जगह होली एवं कृष्ण का सरस, सजीव एवं सुन्दर चित्रंकन मिलता है। वैसे होली तत्कालिक आजादी के दीवानों को संगठित करने एवं आजादी की हूक जनमानस में जगाने हेतु विशिष्ट पर्व बना रहा। जहां एक ओर होली विषम काल में भी संगठित करने में सफल रहा, वहीं आज कितनी विड़म्बना है कि भारतवर्ष आज भी जातिवाद, क्षेत्रवाद, संकीर्णता, साम्प्रदायिकता से घिरा हुआ है।*

*युवाशक्ति नशे में डूबी है, संस्कृति के नाम पर अश्लीलता का नंगानाच देखने को मिलता है। ऐसी स्थिति मे होली हमें पुनः-पुनः याद दिलाती है समरसता व उमंगो से भरे एक ऐसे अवसर की, जब हम छोटे-बड़े का भेद मन से निकालकर स्वयं के मन का मैल निकाल फेंकें। हर वर्ष होली का त्यौहार सामूहिकता, संगठन और एकता को सुदृढ़ बनाने ही तो आता है।*

*मनुष्य दीन- दुर्बल, डरपोक होकर न रहे–*

*होली यह भी संदेश देता है कि मनुष्य दीन- दुर्बल, डरपोक होकर न रहे, अपितु इस संसार में नृसिंह की तरह निर्भय और वीर का जीवन जिये। तभी तो प्रह्लाद ने असुरता को अपनाने के बजाय उसके सामने सीनातान कर खड़े होने का साहस दिखाया। संदेश यह भी है कि अनीतिकर्ता भले ही अभिभावक ही क्यों न हो, भगवत्सत्ता को श्रेष्ठता व पूर्ण साहस प्रिय है, होली लोक जीवन में इसी साहस को ही तो जगाना चाहती है राष्ट्र आंगन में पर्व पर गलियों की लोक परम्परा प्रतीकात्मक साहस अभिव्यक्ति ही है। आइये! हम भी होली को बहुआयामी बनाने का संकल्प लें।*
🚩सन्यासी सुतिक्ष 🚩

05/03/2025

ओम नम: शिवाय च

वेदो में ईशवर को शिव कहा गया है ,शिव का अर्थ है कल्याणकारी। ओम नम: शिवाय का शाब्दिक अर्थ है मैं कल्याणकारी ईश्वर को नमन करता हूँ। पुराण निर्माता ने निराकार ईशवर के स्थान पर काल्पनिक चित्र का निर्माण करके शिव का चित्र बना डाला जिससे हिन्दू निराकार ईशवर को छोड़ उस चित्र की उपासना करने लगे।
वेदोअखिलो धर्म मूलम्
वेद सभी धर्मों का मूल है ।

अन्धन्तम: प्र विशन्ति येsसम्भूति मुपासते
ततो भूयsइव ते तमो यs उसम्भूत्या-रता:
( यजुर्वेद अध्याय 40 मंत्र 9 )
अर्थ – जो लोग ईश्वर के स्थान पर जड़ प्रकृति या उससे बनी मूर्तियों की पूजा उपासना करते हैं । वह लोग घोर अंधकार ( दुख ) को प्राप्त होते हैं। ,

वेदों में ईशवर की व्याख्या के अनेको मंत्र है। जिसमें ईशवर को शिव नाम से सम्बोधित किया गया है।
”ओं नमः शंभवाय च , मयोभवाय च ।
नमः शंकराय च मयस्कराय च ।
नमः शिवाय च शिवतराय च ।।”यजुर्वेद अ० १६ मंत्र ४१
भाषार्थ :-
(शंभवाय )सुखस्वरूप सुखों को देने वाले
(नमः शंकराय) कल्याण करने वाला (मयस्कराय) धर्मयुक्त कामों को करने वाले अपने भक्त को सुख देने वाला (नमः शिवाय च शिवतराय ) अत्यंत मंगल स्वरूप और धार्मिक मनुष्यो को मोक्ष देने वाले ईश्वर को हमारा बारम्बार नमस्कार हो।
इस मंत्र में शिव और शंकर नाम ईशवर के लिए आया है न कि शिव मुर्ति के लिए।

महामृत्युंजय मंत्र ("मृत्यु को जीतने वाला महान मंत्र") ॐ त्र्यम्‍बकं यजामहे सुगन्धिं पुष्टिवर्धनम्
उर्वारुकमिव बन्‍धनान्
मृत्‍योर्मुक्षीय मामृतात् -यजुर्वेद अध्याय ३ मंत्र ६०
इस मंत्र से भगवान शिव की स्तुति हेतु की गयी एक वन्दना है। इस मन्त्र में शिव को 'मृत्यु को जीतने वाला' बताया गया है। लेकिन यह मंत्र भी निराकार ईशवर जिसका नाम शिव अर्थात कल्याणकारी है उसी की वंदना है।

भावार्थ :-तीनों कालों के ज्ञाता परमेश्वर की हम नित्य उपासना करते है आप जीवन में सुगंध फैलाने और पौष्टिकता बढ़ाने वाले हैं, आप हमें संरक्षण प्रदान करते है हम संसारीक बंधनों से उसी प्रकार छूट जाऐं जैसे वृक्ष से फल पक कर अलग हो जाता है लेकिन अपनी सुगंधी मिठास मधुरता नही छोड़ता हम भी यशस्वी जीवन वाले होकर जन्म मरण के बन्धन से छूटकर आप की कृपा से मोक्ष को प्राप्त करें।

मुर्ति में शिव को मुर्तिकार ने समाधी मुद्रा में दिखाया है जिससे स्पष्ट होता है की शिव भी उसी निराकार ईशवर का ध्यान करते थे।
एक शिव नाम के बहुत बड़े विज्ञानी भी हुए हैं। महाराजा शिव ने एक यन्त्र का निर्माण किया था जिसमे स्वर शक्ति थी। जब रावण को यह प्रतीत हुआ कि महाराजा शिव के पास ऐसी अमोघ शक्ति है और वह यन्त्र उन्होने मार्कण्डेय ऋषि की सहायता से प्राप्त किया हैं उस यन्त्र को धारण करके युद्ध करने वाले योद्वा को कोई वध नहीं कर सकता। रावण ने शिव के द्वारा प्रार्थना की, चरणो की वन्दना की, प्रसन्न होने से शिव ने वह यन्त्र रावण को प्रदान कर दिया। इस यन्त्र का नाभि और हृदय से समन्वय रहता था।जिस कारण श्री राम के लिए रावण को मारना बहुत कठिन हुआ था ( ब्रह्मचारी कृष्णदत जी की पुस्तक से )

आओ महाराजा शिव का अनुकरण करते हुए निराकार ईशवर की उपासना में ध्यान व समाधी को प्राप्त करें।—

02/03/2025

सत्यवान का वरण सावित्री ने किया था !अर्थात
सत्याचरण से सावित्री जप से ही गायत्रीमंत्र सिद्ध होता है, योगी के ध्यान में सावित्री प्रकट होती है , यमपाश-मुक्ति, आध्यात्मिक सिद्धियां, भौतिक साम्राज्य, आदि परिणाम स्वरूप प्राप्त होती है !!

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