Shuddh Aahar

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मृत्युंजय श्रीवास्तव 8318181134शिशुपाल 9956900139http://thekamdhenu.com
21/08/2020

मृत्युंजय श्रीवास्तव 8318181134
शिशुपाल 9956900139

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अगर हमें भारत का भविष्य तेजश्वी , यशश्वी और अंदर से वलबान बनाना है तो बालकों को माखन - मिश्री खिलाना ही पड़ेगा।और अगर हमे...
21/08/2020

अगर हमें भारत का भविष्य तेजश्वी , यशश्वी और अंदर से वलबान बनाना है तो बालकों को माखन - मिश्री खिलाना ही पड़ेगा।और अगर हमें भारत का वर्तमान निरोगी बनाना है तो मठ्ठा सभी देश बासियों को पीना ही पड़ेगा।

अगर हमें भारत का भविष्य तेजश्वी , यशश्वी और अंदर से वलबान बनाना है तो बालकों को माखन - मिश्री खिलाना ही पड़ेगा।और अगर हमे...
21/08/2020

अगर हमें भारत का भविष्य तेजश्वी , यशश्वी और अंदर से वलबान बनाना है तो बालकों को माखन - मिश्री खिलाना ही पड़ेगा।और अगर हमें भारत का वर्तमान निरोगी बनाना है तो मठ्ठा सभी देश बासियों को पीना ही पड़ेगा।

मृत्युंजय श्रीवास्तव 8318181134शिशुपाल 9956900139
21/08/2020

मृत्युंजय श्रीवास्तव 8318181134
शिशुपाल 9956900139

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19/08/2020

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This soap is helpful for hair issues also.
MRP rupees 49/free delivery

मूल्य 60रु/ली०मृत्युंजय श्रीवास्तव 8318181134शिशुपाल 9956900139खान- पान के अलावा भी सिरका का प्रयोग इतनी जगहों पर किया ज...
17/08/2020

मूल्य 60रु/ली०

मृत्युंजय श्रीवास्तव 8318181134
शिशुपाल 9956900139

खान- पान के अलावा भी सिरका का प्रयोग इतनी जगहों पर किया जा सकता है कि आप जान कर हैरान हो जाएंगे। सिरका न केवल आपके भोजन के स्वाद को बढ़ाने में मददगार है, बल्कि आपके घर को भी खूबसूरत और चमकदार बनाने में अपना महत्वपूर्ण योगदान देता है।

हटाए जिद्दी दाग- धब्बे
गरमी के दिनों में पसीना इतना निकलता है कि आप लाख कोशिश कर लें यह रुकने का नाम नहीं लेता है। पसीना निकल कर कपड़े पर लगता है और अपने दाग छोड़ जाता है। कई बार तो यह दाग कपड़े को धोने के बाद निकल जाता है लेकिन कई बार इतना जिद्दी होता है कि निकलता ही नहीं। हल्के रंग वाले कपड़ों के साथ यह अक्सर होता है। ऐसे में सिरका आपके काम आ सकता है। सिरका को स्प्रे वाली बोतल में डालकर रख लें। अब पसीने वाले कपड़ों को धोने से पहले दाग वाली जगहों पर सिरका स्प्रे कर लें। दाग आंख झपकते ही गायब हो जाएंगे।

फूलों को रखे ताजा
आपको अपने कमरे में ताजे फूल रखने का शौक है। लेकिन फूल दो- तीन दिन में ही मुरझाने लगते हैं। आप सोचती हैं कि काश कोई जादू या फॉर्मूला होता, जिसकी मदद से फूलों को लंबे समय तरो- ताजा रखा जा सकता। लेकिन आपको पता ही नहीं होगा कि ऐसी स्थिति में सिरका जादू की तरह काम करता है और आपके फूलों को लंबे समय तक ताजा रखने में मदद करता है। इसके लिए बस फ्लावर वास के पानी में एक चम्मच सिरका डाल दें, फूल लंबे समय तक फ्रेश रहेंगे।

पौधों से दूर करे कीड़े
आपके गमलों में लगे पौधों में यदि कीड़े लग रहे हैं तो आपको किसी कीटनाशक खरीदने की आवश्यकता नहीं है। पौधों के लिए एक बेहतरीन कीटनाशक आपके किचन में ही है। सिरका को स्प्रे बोतल में पानी के साथ डालें और इसे पौधों पर छिड़क दें। सारे कीड़े भाग जाएंगे और आपके गमले के पौधे लहलहा उठेंगे।

भगाए चींटियों को
गरमी शुरू हो रही है तो चींटियों का साम्राज्य घर के चारों ओर दिखने लगेगा। आप लाख लक्ष्मण रेखा लगाती हैं, कई बार अन्य दवाइयां भी डालती हैं लेकिन चींटियां हर दूसरे दिन धमक आती हैं। लेकिन क्या आप जानती हैं कि चींटियों को सिरका नहीं पसंद होता। बराबर मात्रा में विनेगर और पानी को मिला लें। इसे स्प्रे बोतल में भर लें और जहां- जहां चींटियां हैं, वहां छिड़क दें। सारी चींटियां भाग जाएंगी।

साफ करे फ्रिज
फ्रिज में कभी दूध का दाग लग जाता है तो कभी सब्जी के गिर जाने से दाग सूखे धब्बे में बदल जाता है। आपके लिए रोजाना फ्रिज को साफ करना मुश्किल तो है लेकिन नामुमकिन नहीं। खासकर जब सिरका आपके घर में हो। सिरका और पानी की बराबर मात्रा को स्प्रे बोतल में भर लें। इसे फ्रिज में प्रभावित इलाकों पर छिड़कें और रगड़कर साफ कर दें। लेकिन ध्यान यह रखें कि संगमरमर या ग्रेनाइट के फर्श पर इसका इस्तेमाल भूल से भी न करें।

आपकी खूबसूरती में भी इजाफा करे सिरका -

सिरका आपके चेहरे और स्किन ही नहीं, बालों की खूबसूरती बढ़ाने में भी मददगार है। आपकी रंगत को बढ़ाने और साथ में चेहरे पर आई मलिनता को दूर करता है सिरका।

बाल बनाए चमकदार
बाल को चमकदार और नरम लुक देने के लिए सिरका का प्रयोग किया जा सकता है। बाल को शैंपू करने के बाद कंडीशनर का प्रयोग करने के बजाय सिरका यानि सिरका का इस्तेमाल कीजिए। इसके लिए आधे मग पानी में दो- तीन चम्मच सिरका मिलाइए और इससे बाल धो लीजिए। न केवल आपके बालों की चमक बढ़ेगी बल्कि यह बालों को नरम एवं मुलायम भी रखता है।

डैंड्रफ करे दूर
आपको आज शैंपू करना है लेकिन आप अपने बाल में हुए डैंड्रफ से परेशान हैं। इसका इलाज सिरका के पास है। आधा कप पानी और आधा कप सिरका को मिलाकर बाल की मसाज करें। इसके बाद ही शैंपू करने की सोचें। वरना एक छोटी कटोरी में एक चम्मच सिरका निकालें। इसमें शैंपू को मिलाकर बाल धो लें। बाल में जमा डैंड्रफ अपने आप निकल जाएगा।

दूर करे एक्ने- पिंपल्स
आप यदि अपने चेहरे पर आए पिंपल्स और एक्ने से परेशान हैं तो एक चम्मच सिरका को दो कप पानी में मिला लें। अब रुई को इस मिश्रण में डालकर चेहरे पर लगाएं। आपके चेहरे की गंदगी इससे साफ होगी क्योंकि सिरका नैचुरल टोनिंग एजेंट की तरह काम करता है।

मुलायम होगी त्वचा
आप बाथरूम में अपनी पानी भरी बाल्टी में तो- तीन चम्मच सिरका डालकर कुछ मिनट के लिए छोड़ दें। अब इस पानी से स्नान कर लें। यह पानी आपकी त्वचा का पीएच बैलेंस सही बनाए रखने में मदद करता है।

टैनिंग करे दूर
गरमी की धूप में निकल कर आपकी त्वचा का रंग काला पड़ गया है। चेहरे के साथ हाथ और पैर में भी टैनिंग हो गई है। इस टैनिंग को दूर करने के लिए आपने कई तरह से कोशिश कर ली है लेकिन टैनिंग दूर नहीं हुई है तो सिरका आपकी स्किन पर दिख रही इस टैनिंग को दूर करने में मददगार है। आधा मग पानी में तीन- चार चम्मच सिरका मिला लें। अब कॉटन के कपड़े को इसमें डूबो कर टैन वाले एरिया पर लगा कर रखें। इससे स्किन को ठंडक पहुंचेगी और ट्रेनिंग भी दूर हो जाएगी।
सिरका के सेहत संबंधी लाभ -
सालों से विनेगर का प्रयोग चिकित्सकीय तौर पर होता आया है। आधुनिक शोध इसके सकारात्मक स्वास्थ्य संबंधी लाभ के बारे में खुलासा भी करते हैं।

दूर करे गले की खरांश
गले की खिचखिच दूर करने के लिए बाजार में तमाम तरह की टॉफी उपलब्ध होती हैं लेकिन उन सबको खाने से कोई खास फायदा नहीं होता है। आपके घर में यदि सिरका है तो आप इसके सेवन से गले की खरांश का भी खात्मा कर सकते हैं। एक चम्मच सिरका को एक कप गरम पानी में मिलाकर पी लीजिए। गले की खरांश जादू की तरह ठीक हो जाएगी।

हिच- हिच हिचकी
लगातार आ रही हिचकी कई दफा परेशान कर देती हैं। आप चाहे कितने गिलास पानी पी लें, हिचकी जाने का नाम ही नहीं लेती। हिचकी को दूर करने का रामबाण इलाज सिरका में ही है। एक चम्मच सिरका को फटाफट पी लीजिए। कुछ ही देर में हिचकी गायब हो जाएगी।

ब्लड शुगर कंट्रोल
कई अध्ययनों से पता चलता है कि सिरका का सेवन ब्लड शुगर को कम करने के साथ ही इंसुलिन के स्तर को भी कम करता है।

वजन प्रबंधन में कारगर

कुछ अध्यनन बताते हैं कि सिरका के सेवन से पेट देर तक भरा हुआ महसूस होता है। इस तरह से आपका कैलोरी इनटेक कम रहता है और वजन कम करने में मदद मिलती है।

मांसपेशियों को दे राहत
दिन भर काम के बाद कई बार मांसपेशियों में तेज दर्द हो जाता है। ऐसे में मन करता है कि काश यह दर्द गायब हो जाए। दवाइयां लेने की बजाय बेहतर तो यह होगा कि आप सिरका से प्रभावित हिस्से पर मसाज कीजिए। इसके बाद आप महसूस करेंगी कि आपकी मांसपेशियों का दर्द कम हो गया है।

कोलेस्ट्रॉल करे कम
जानवरों पर किए गए शोध में चूहे को सिरका पिलाया गया और उसका कोलेस्ट्रॉल स्तर कम पाया गया। हालांकि सिरका और कोलेस्ट्रॉल के बीच के रिश्ते को समझने के लिए और अधिक शोध होने की आवश्यकता है।

एंटीमाइक्रोबियल - Antimicrobial
सिरका में एंटीमाइक्रोबियल तत्व होते हैं, जिसकी वजह से सिरका का सेवन नाखूनों के फंगस, वाट्र्स और कान के इंफेक्शन के इलाज में कारगर है। स्किन इंफेक्शन और बर्न के इलाज में भी यह लाभदायक है।

सौंदर्य ही नहीं, सेहत के लिए भी बहुत फायदेमंद है नारियल का तेल

सिरका के साइड इफेक्ट्स - Side Effects of Vinegar in Hindi
सिरका अमूमन सुरक्षित है लेकिन इसका ज्यादा प्रयोग हानिकारक है। इसके ज्यादा सेवन से हार्टबर्न या अपच की समस्या हो सकती है। दांत का इनेमल खराब होने की आशंका रहती है। यह ब्लड शुगर और पोटैशियम के स्तर को जरूरत से ज्यादा कम कर सकता है। इसलिए अपनी डाइट में किसी भी तरह का बदलाव करने से पहले डॉक्टर से सलाह लेना जरूरी है।

भादेव का घीकीमत 2500/-  प्रति लीटर100 ml मात्र 200/-डिस्काउंट- 20%समय- स्टॉक उपलव्ध रहने तक।मृत्युंजय श्रीवास्तव 8318181...
16/08/2020

भादेव का घी
कीमत 2500/- प्रति लीटर
100 ml मात्र 200/-
डिस्काउंट- 20%
समय- स्टॉक उपलव्ध रहने तक।

मृत्युंजय श्रीवास्तव 8318181134

शिशुपाल 9956900139

"भादवे का घी"
भाद्रपद मास आते आते घास पक जाती है।
जिसे हम घास कहते हैं, वह वास्तव में अत्यंत दुर्लभ #औषधियाँ हैं।
इनमें धामन जो कि गायों को अति प्रिय होता है, खेतों और मार्गों के किनारे उगा हुआ साफ सुथरा, ताकतवर चारा होता है।
सेवण एक और घास है जो गुच्छों के रूप में होता है। इसी प्रकार गंठिया भी एक ठोस खड़ है। मुरट, भूरट,बेकर, कण्टी, ग्रामणा, मखणी, कूरी, झेर्णीया,सनावड़ी, चिड़की का खेत, हाडे का खेत, लम्प, आदि वनस्पतियां इन दिनों पक कर लहलहाने लगती हैं।
यदि समय पर वर्षा हुई है तो पड़त भूमि पर रोहिणी नक्षत्र की तप्त से संतृप्त उर्वरकों से ये घास ऐसे बढ़ती है मानो कोई विस्फोट हो रहा है।
इनमें विचरण करती गायें, पूंछ हिलाकर चरती रहती हैं। उनके सहारे सहारे सफेद बगुले भी इतराते हुए चलते हैं। यह बड़ा ही स्वर्गिक दृश्य होता है।
इन जड़ी बूटियों पर जब दो शुक्ल पक्ष गुजर जाते हैं तो चंद्रमा का अमृत इनमें समा जाता है। आश्चर्यजनक रूप से इनकी गुणवत्ता बहुत बढ़ जाती है।
कम से कम 2 कोस चलकर, घूमते हुए गायें इन्हें चरकर, शाम को आकर बैठ जाती है।
रात भर जुगाली करती हैं।
अमृत रस को अपने दुग्ध में परिवर्तित करती हैं।
यह दूध भी अत्यंत गुणकारी होता है।
इससे बने दही को जब मथा जाता है तो पीलापन लिए नवनीत निकलता है।
5से 7 दिनों में एकत्र मक्खन को गर्म करके, घी बनाया जाता है।
इसे ही #भादवे_का_घी कहते हैं।
इसमें अतिशय पीलापन होता है। ढक्कन खोलते ही 100 मीटर दूर तक इसकी मादक सुगन्ध हवा में तैरने लगती है।
बस,,,, मरे हुए को जिंदा करने के अतिरिक्त, यह सब कुछ कर सकता है।
ज्यादा है तो खा लो, कम है तो नाक में चुपड़ लो। हाथों में लगा है तो चेहरे पर मल दो। बालों में लगा लो।
दूध में डालकर पी जाओ।
सब्जी या चूरमे के साथ जीम लो।
बुजुर्ग है तो घुटनों और तलुओं पर मालिश कर लो।
इसमें अलग से कुछ भी नहीं मिलाना। सारी औषधियों का सर्वोत्तम सत्व तो आ गया!!
इस घी से हवन, देवपूजन और श्राद्ध करने से अखिल पर्यावरण, देवता और पितर तृप्त हो जाते हैं।
कभी सारे मारवाड़ में इस घी की धाक थी।
इसका सेवन करने वाली विश्नोई महिला 5 वर्ष के उग्र सांड की पिछली टांग पकड़ लेती और वह चूं भी नहीं कर पाता था।
मेरे प्रत्यक्ष की घटना में एक व्यक्ति ने एक रुपये के सिक्के को मात्र उँगुली और अंगूठे से मोड़कर दोहरा कर दिया था!!
आधुनिक विज्ञान तो घी को #वसा के रूप में परिभाषित करता है। उसे भैंस का घी भी वैसा ही नजर आता है। वनस्पति घी, डालडा और चर्बी में भी अंतर नहीं पता उसे।
लेकिन पारखी लोग तो यह तक पता कर देते थे कि यह फलां गाय का घी है!!
यही वह घी था जिसके कारण युवा जोड़े दिन भर कठोर परिश्रम करने के बाद, रात भर रतिक्रीड़ा करने के बावजूद, बिलकुल नहीं थकते थे (वात्स्यायन)!
एक बकरे को आधा सेर घी पिलाने पर वह एक ही रात में 200 बकरियों को "हरी" कर देता था!!
कुंवारे रात भर कबड्डी खेलते रहते थे!!
इसमें #स्वर्ण की मात्रा इतनी रहती थी, जिससे सर कटने पर भी धड़ लड़ते रहते थे!!

बाड़मेर जिले के #गूंगा गांव में घी की मंडी थी। वहाँ सारे मरुस्थल का अतिरिक्त घी बिकने आता था जिसके परिवहन का कार्य बाळदिये भाट करते थे। वे अपने करपृष्ठ पर एक बूंद घी लगा कर सूंघ कर उसका परीक्षण कर दिया करते थे।
इसे घड़ों में या घोड़े के चर्म से बने विशाल मर्तबानों में इकट्ठा किया जाता था जिन्हें "दबी" कहते थे।
घी की गुणवत्ता तब और बढ़ जाती, यदि गाय पैदल चलते हुए स्वयं गौचर में चरती थी, तालाब का पानी पीती, जिसमें प्रचुर विटामिन डी होता है और मिट्टी के बर्तनों में बिलौना किया जाता हो।
वही गायें, वही भादवा और वही घास,,,, आज भी है। इस महान रहस्य को जानते हुए भी यदि यह व्यवस्था भंग हो गई तो किसे दोष दें?
पुनःश्च
अपनी सामर्थ्य अनुसार कुछ मित्रों को यह घी, इधर उधर से जुगाड़ करके उपलब्ध करवाता रहा हूँ। वे ही इसके अनुमोदन में अपनी प्रतिक्रिया दें। जो इस अमृत का उपभोग कर रहे हैं वे निश्चय ही भाग्यशाली हैं। यदि घी शुद्ध है तो जिस किसी भी भाव से मिले, अवश्य ले लें।
यदि भादवे का घी नहीं मिले तो गौमूत्र सेवन करें। वह भी गुणकारी है।

"भादवे का घी"भाद्रपद मास आते आते घास पक जाती है।जिसे हम घास कहते हैं, वह वास्तव में अत्यंत दुर्लभ  #औषधियाँ हैं।इनमें धा...
16/08/2020

"भादवे का घी"
भाद्रपद मास आते आते घास पक जाती है।
जिसे हम घास कहते हैं, वह वास्तव में अत्यंत दुर्लभ #औषधियाँ हैं।
इनमें धामन जो कि गायों को अति प्रिय होता है, खेतों और मार्गों के किनारे उगा हुआ साफ सुथरा, ताकतवर चारा होता है।
सेवण एक और घास है जो गुच्छों के रूप में होता है। इसी प्रकार गंठिया भी एक ठोस खड़ है। मुरट, भूरट,बेकर, कण्टी, ग्रामणा, मखणी, कूरी, झेर्णीया,सनावड़ी, चिड़की का खेत, हाडे का खेत, लम्प, आदि वनस्पतियां इन दिनों पक कर लहलहाने लगती हैं।
यदि समय पर वर्षा हुई है तो पड़त भूमि पर रोहिणी नक्षत्र की तप्त से संतृप्त उर्वरकों से ये घास ऐसे बढ़ती है मानो कोई विस्फोट हो रहा है।
इनमें विचरण करती गायें, पूंछ हिलाकर चरती रहती हैं। उनके सहारे सहारे सफेद बगुले भी इतराते हुए चलते हैं। यह बड़ा ही स्वर्गिक दृश्य होता है।
इन जड़ी बूटियों पर जब दो शुक्ल पक्ष गुजर जाते हैं तो चंद्रमा का अमृत इनमें समा जाता है। आश्चर्यजनक रूप से इनकी गुणवत्ता बहुत बढ़ जाती है।
कम से कम 2 कोस चलकर, घूमते हुए गायें इन्हें चरकर, शाम को आकर बैठ जाती है।
रात भर जुगाली करती हैं।
अमृत रस को अपने दुग्ध में परिवर्तित करती हैं।
यह दूध भी अत्यंत गुणकारी होता है।
इससे बने दही को जब मथा जाता है तो पीलापन लिए नवनीत निकलता है।
5से 7 दिनों में एकत्र मक्खन को गर्म करके, घी बनाया जाता है।
इसे ही #भादवे_का_घी कहते हैं।
इसमें अतिशय पीलापन होता है। ढक्कन खोलते ही 100 मीटर दूर तक इसकी मादक सुगन्ध हवा में तैरने लगती है।
बस,,,, मरे हुए को जिंदा करने के अतिरिक्त, यह सब कुछ कर सकता है।
ज्यादा है तो खा लो, कम है तो नाक में चुपड़ लो। हाथों में लगा है तो चेहरे पर मल दो। बालों में लगा लो।
दूध में डालकर पी जाओ।
सब्जी या चूरमे के साथ जीम लो।
बुजुर्ग है तो घुटनों और तलुओं पर मालिश कर लो।
इसमें अलग से कुछ भी नहीं मिलाना। सारी औषधियों का सर्वोत्तम सत्व तो आ गया!!
इस घी से हवन, देवपूजन और श्राद्ध करने से अखिल पर्यावरण, देवता और पितर तृप्त हो जाते हैं।
कभी सारे मारवाड़ में इस घी की धाक थी।
इसका सेवन करने वाली विश्नोई महिला 5 वर्ष के उग्र सांड की पिछली टांग पकड़ लेती और वह चूं भी नहीं कर पाता था।
मेरे प्रत्यक्ष की घटना में एक व्यक्ति ने एक रुपये के सिक्के को मात्र उँगुली और अंगूठे से मोड़कर दोहरा कर दिया था!!
आधुनिक विज्ञान तो घी को #वसा के रूप में परिभाषित करता है। उसे भैंस का घी भी वैसा ही नजर आता है। वनस्पति घी, डालडा और चर्बी में भी अंतर नहीं पता उसे।
लेकिन पारखी लोग तो यह तक पता कर देते थे कि यह फलां गाय का घी है!!
यही वह घी था जिसके कारण युवा जोड़े दिन भर कठोर परिश्रम करने के बाद, रात भर रतिक्रीड़ा करने के बावजूद, बिलकुल नहीं थकते थे (वात्स्यायन)!
एक बकरे को आधा सेर घी पिलाने पर वह एक ही रात में 200 बकरियों को "हरी" कर देता था!!
कुंवारे रात भर कबड्डी खेलते रहते थे!!
इसमें #स्वर्ण की मात्रा इतनी रहती थी, जिससे सर कटने पर भी धड़ लड़ते रहते थे!!

बाड़मेर जिले के #गूंगा गांव में घी की मंडी थी। वहाँ सारे मरुस्थल का अतिरिक्त घी बिकने आता था जिसके परिवहन का कार्य बाळदिये भाट करते थे। वे अपने करपृष्ठ पर एक बूंद घी लगा कर सूंघ कर उसका परीक्षण कर दिया करते थे।
इसे घड़ों में या घोड़े के चर्म से बने विशाल मर्तबानों में इकट्ठा किया जाता था जिन्हें "दबी" कहते थे।
घी की गुणवत्ता तब और बढ़ जाती, यदि गाय पैदल चलते हुए स्वयं गौचर में चरती थी, तालाब का पानी पीती, जिसमें प्रचुर विटामिन डी होता है और मिट्टी के बर्तनों में बिलौना किया जाता हो।
वही गायें, वही भादवा और वही घास,,,, आज भी है। इस महान रहस्य को जानते हुए भी यदि यह व्यवस्था भंग हो गई तो किसे दोष दें?
पुनःश्च
अपनी सामर्थ्य अनुसार कुछ मित्रों को यह घी, इधर उधर से जुगाड़ करके उपलब्ध करवाता रहा हूँ। वे ही इसके अनुमोदन में अपनी प्रतिक्रिया दें। जो इस अमृत का उपभोग कर रहे हैं वे निश्चय ही भाग्यशाली हैं। यदि घी शुद्ध है तो जिस किसी भी भाव से मिले, अवश्य ले लें।
यदि भादवे का घी नहीं मिले तो गौमूत्र सेवन करें। वह भी गुणकारी है।

मृत्युंजय श्रीवास्तव
8318181134

शिशुपाल
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"भादवे का घी"भाद्रपद मास आते आते घास पक जाती है।जिसे हम घास कहते हैं, वह वास्तव में अत्यंत दुर्लभ  #औषधियाँ हैं।इनमें धा...
16/08/2020

"भादवे का घी"
भाद्रपद मास आते आते घास पक जाती है।
जिसे हम घास कहते हैं, वह वास्तव में अत्यंत दुर्लभ #औषधियाँ हैं।
इनमें धामन जो कि गायों को अति प्रिय होता है, खेतों और मार्गों के किनारे उगा हुआ साफ सुथरा, ताकतवर चारा होता है।
सेवण एक और घास है जो गुच्छों के रूप में होता है। इसी प्रकार गंठिया भी एक ठोस खड़ है। मुरट, भूरट,बेकर, कण्टी, ग्रामणा, मखणी, कूरी, झेर्णीया,सनावड़ी, चिड़की का खेत, हाडे का खेत, लम्प, आदि वनस्पतियां इन दिनों पक कर लहलहाने लगती हैं।
यदि समय पर वर्षा हुई है तो पड़त भूमि पर रोहिणी नक्षत्र की तप्त से संतृप्त उर्वरकों से ये घास ऐसे बढ़ती है मानो कोई विस्फोट हो रहा है।
इनमें विचरण करती गायें, पूंछ हिलाकर चरती रहती हैं। उनके सहारे सहारे सफेद बगुले भी इतराते हुए चलते हैं। यह बड़ा ही स्वर्गिक दृश्य होता है।
इन जड़ी बूटियों पर जब दो शुक्ल पक्ष गुजर जाते हैं तो चंद्रमा का अमृत इनमें समा जाता है। आश्चर्यजनक रूप से इनकी गुणवत्ता बहुत बढ़ जाती है।
कम से कम 2 कोस चलकर, घूमते हुए गायें इन्हें चरकर, शाम को आकर बैठ जाती है।
रात भर जुगाली करती हैं।
अमृत रस को अपने दुग्ध में परिवर्तित करती हैं।
यह दूध भी अत्यंत गुणकारी होता है।
इससे बने दही को जब मथा जाता है तो पीलापन लिए नवनीत निकलता है।
5से 7 दिनों में एकत्र मक्खन को गर्म करके, घी बनाया जाता है।
इसे ही #भादवे_का_घी कहते हैं।
इसमें अतिशय पीलापन होता है। ढक्कन खोलते ही 100 मीटर दूर तक इसकी मादक सुगन्ध हवा में तैरने लगती है।
बस,,,, मरे हुए को जिंदा करने के अतिरिक्त, यह सब कुछ कर सकता है।
ज्यादा है तो खा लो, कम है तो नाक में चुपड़ लो। हाथों में लगा है तो चेहरे पर मल दो। बालों में लगा लो।
दूध में डालकर पी जाओ।
सब्जी या चूरमे के साथ जीम लो।
बुजुर्ग है तो घुटनों और तलुओं पर मालिश कर लो।
इसमें अलग से कुछ भी नहीं मिलाना। सारी औषधियों का सर्वोत्तम सत्व तो आ गया!!
इस घी से हवन, देवपूजन और श्राद्ध करने से अखिल पर्यावरण, देवता और पितर तृप्त हो जाते हैं।
कभी सारे मारवाड़ में इस घी की धाक थी।
इसका सेवन करने वाली विश्नोई महिला 5 वर्ष के उग्र सांड की पिछली टांग पकड़ लेती और वह चूं भी नहीं कर पाता था।
मेरे प्रत्यक्ष की घटना में एक व्यक्ति ने एक रुपये के सिक्के को मात्र उँगुली और अंगूठे से मोड़कर दोहरा कर दिया था!!
आधुनिक विज्ञान तो घी को #वसा के रूप में परिभाषित करता है। उसे भैंस का घी भी वैसा ही नजर आता है। वनस्पति घी, डालडा और चर्बी में भी अंतर नहीं पता उसे।
लेकिन पारखी लोग तो यह तक पता कर देते थे कि यह फलां गाय का घी है!!
यही वह घी था जिसके कारण युवा जोड़े दिन भर कठोर परिश्रम करने के बाद, रात भर रतिक्रीड़ा करने के बावजूद, बिलकुल नहीं थकते थे (वात्स्यायन)!
एक बकरे को आधा सेर घी पिलाने पर वह एक ही रात में 200 बकरियों को "हरी" कर देता था!!
कुंवारे रात भर कबड्डी खेलते रहते थे!!
इसमें #स्वर्ण की मात्रा इतनी रहती थी, जिससे सर कटने पर भी धड़ लड़ते रहते थे!!

बाड़मेर जिले के #गूंगा गांव में घी की मंडी थी। वहाँ सारे मरुस्थल का अतिरिक्त घी बिकने आता था जिसके परिवहन का कार्य बाळदिये भाट करते थे। वे अपने करपृष्ठ पर एक बूंद घी लगा कर सूंघ कर उसका परीक्षण कर दिया करते थे।
इसे घड़ों में या घोड़े के चर्म से बने विशाल मर्तबानों में इकट्ठा किया जाता था जिन्हें "दबी" कहते थे।
घी की गुणवत्ता तब और बढ़ जाती, यदि गाय पैदल चलते हुए स्वयं गौचर में चरती थी, तालाब का पानी पीती, जिसमें प्रचुर विटामिन डी होता है और मिट्टी के बर्तनों में बिलौना किया जाता हो।
वही गायें, वही भादवा और वही घास,,,, आज भी है। इस महान रहस्य को जानते हुए भी यदि यह व्यवस्था भंग हो गई तो किसे दोष दें?
पुनःश्च
अपनी सामर्थ्य अनुसार कुछ मित्रों को यह घी, इधर उधर से जुगाड़ करके उपलब्ध करवाता रहा हूँ। वे ही इसके अनुमोदन में अपनी प्रतिक्रिया दें। जो इस अमृत का उपभोग कर रहे हैं वे निश्चय ही भाग्यशाली हैं। यदि घी शुद्ध है तो जिस किसी भी भाव से मिले, अवश्य ले लें।
यदि भादवे का घी नहीं मिले तो गौमूत्र सेवन करें। वह भी गुणकारी है।

मृत्युंजय श्रीवास्तव
8318181134

शिशुपाल
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15/08/2020

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100% Natural soap/The soap contains all natural ingredients like Multani mitti , Haldi etc.This will help you to clean dirt infections and will prevent all typs of skin problems like acne , blackheads etc.
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"यह रागी हुई अभागी क्यों?"यह 'रागी' हुई अभागी क्यों?चावल की किस्मत जागी क्यों?जो 'ज्वार' जमी जन-मानस में,गेहूँ के डर से ...
15/08/2020

"यह रागी हुई अभागी क्यों?"

यह 'रागी' हुई अभागी क्यों?
चावल की किस्मत जागी क्यों?
जो 'ज्वार' जमी जन-मानस में,
गेहूँ के डर से भागी क्यों?

यूँ होता श्वेत 'झंगोरा' है।
यह धान सरीखा गोरा है।
पर यह भी हारा गेहूँ से,
जिसका हर कहीं ढिंढ़ोरा है!

जाने कितने थे अन्न यहाँ?
एक-दूजे से प्रसन्न यहाँ।
जब आया दौर सफेदी का,
हो गए मगर सब खिन्न यहाँ।

अब कहाँ वो 'कोदो'-'कुटकी' है?
'साँवाँ' की काया भटकी है।
संन्यासी हुआ 'बाजरा' अब,
गुम हुई 'काँगणी' छुटकी है।

अब जिसका रंग सुनहरा है।
सब तरफ उन्हीं का पहरा है।
अब कौन सुने मटमैलों की,
गेहूँ का साया गहरा है।

यह देता सबसे कम पोषण।
और करता है ज्यादा शोषण।
तोहफे में दिए रसायन अर
माटी-पानी का अवशोषण।

यह गेहूँ धनिया-सेठ बना।
उपभोगी मोटा पेट बना।
जो हज़म नहीं कर पाए हैं,
उनकी चमड़ी का फेट बना।

अब आएँगे दिन 'रागी' के।
उस 'कुरी', 'बटी', बैरागी के।
जब 'राजगिरा' फिर आएगा
और ताज गिरें बड़भागी के।

जब हमला हो 'हमलाई' का।
छँट जाए भरम मलाई का।
चीनी पर भारी 'चीना' हो,
टूटेगा बंध कलाई का।

बीतेगा दौर गुलामी

15/08/2020

रोग 3 प्रकार के होते हैं -
1- संक्रामक(infection)
2- जरा(chronic)
3- आनुवंशिक(genetic)
आजकल कोरोना का कहर है जो कि एक संक्रामक रोग है इस लिए इसके बारे में जाने मेरी एक पुरानी पोस्ट से -

Super bug षड्यंत्र :
हाल ही में एक अमेरिकन स्त्री की मृत्यु एक ऐसे जीवाणु के संक्रमण से हो गयी जिस पर अब तक ज्ञात सभी ऐंटीबायोटिक बेअसर साबित हुए उसके अंदर मौजूद निमोनिया के जीवाणु ने एक जीन विकसित कर लिया जिसके कारण उस पर सभी एंटीबीओटिक फेल हो गयी उस महिला का इलाज़ भारत में हुआ था इस लिए उस जीवाणु(सुपर बग नाम न्यू दिल्ली म्युटेलो वायरस) की उत्पत्ति भारत से मानी गयी और कारण भारत में सभी एंटीबीओटिक के अत्यधिक प्रयोग को माना गया ।
ये क्या हुआ इसको समझने के लिए प्रकर्ति के सामान्य सिद्धांत को समझ लेते हैं जहाँ कहीं भी आहार होगा उसको पंचतत्वों (अग्नि,वायु, जल , भूमि, आकाश) में विलीन करने के लिए चारों और से माइक्रोब्स(जीवाणु) सक्रीय हो जाएंगे और तब तक कार्य करेंगे जब तक विलीनीकरण की क्रिया सम्पूर्ण नहीं हो जाती । उदहारण के लिए यदि हम एक हंडिया में मल भरकर रख देते हैं तो उसमें जीवाणु और कीड़े पैदा हो जाएंगे और तेजी से उसको मिटटी में बदलने का कार्य करने लगेंगे अब यदि प्रक्रिया के बीच में हम उसमे गमैक्ससीन नामक जहर डाल दें तो जीवाणु मर जायेंगे किन्तु प्रक्रिया अधूरी रहने की वजह से जीवाणु गमैक्ससीन से प्रतिरोध पैदा करके फिर सक्रीय होंगे और अब गमैक्सीन जहर से नहीं मरेंगे अब उनको मारने के लिए अगली पीढ़ी का ज्यादा शक्तिशाली जहर चाहिए जैसे एंडोसल्फान आदि लेकिन जीवाणु तब तक प्रतिरोध पैदा करके वापसी करता रहेगा जब तक मल का मिटटी में रूपांतरण न कर ले । यही होता है शरीर में जब हमारा शरीर मल से भर जाता है कब्ज और कफ के रूप में । और शरीर की प्रतिरक्षा प्रणाली जब मल बाहर फेंकने के लिए दस्त व जुखाम शुरू करती है (इनको आयुर्वेद में मित्र रोग कहां जाता है) तो एलोपैथिक डॉक्टर उसको रोग कह कर दवाई देकर रोक देते हैं और एंटीबायोटिक नामक जहर से जीवाणु (इन्फेक्शन) को मार देते हैं परंतु शरीर की मल फैंकने की क्षमता को नहीं बढ़ाते । इस लिए इन्फेक्शन बार बार रिपीट करता है और हर बार ज्यादा शक्तिशाली की जरूरत पड़ती है ऐसा भी होता है जब वो मल और इन्फेक्शन अंतरंग अंगों को फैल करने लगते हैं (सेप्टीसीमिया)WHO ने 2019 तक सभी एंटीबायोटिक के जीवाणुओं पर बेअसर होने की भविष्यवाणी की है ।

नोट : उम्र के साथ मल की मात्रा शरीर मे बढ़ती है यही कारण है वायरस अधिक उम्र के लोगों को प्रभावित कर रहा है ।

क्या है :

आयुर्वेद में ऐसे मरीज़ जिन पर दवाइयों का असर समाप्त हो जाता है उनको पंचकर्म(उलटी,दस्त,पसीना,तेल मालिश,वस्ति) द्वारा शरीर के मल निकाल दिए जाते हैं तो औषधि उन पर पुनः कार्य करने लगती है ।

यही कार्य योग में शंखप्रक्षालन की क्रिया द्वारा किया जाता है जिसमे गर्म पानी सेंधा नमक व् नींबू दाल कर पिया जाता है व विशेष आसान किये जाते हैं जिससे दस्त शुरू हो जाते हैं ये तब तक किया जाता है जब तक पानी पीकर पानी ही बाहर न आने लगे ।

कफ निकालने के लिए जल नेति एवं कुंज्जर क्रिया (पानी पीकर उलटी करना) का अभ्यास किया जाता है जिससे नज़ला जुखाम दमा निमोनिया आदि का जड़ से निदान हो जाता है और वो दुबारा नहीं होते ।

ऊपर दिए उदाहराण से स्पष्ट है कि एलोपेथी ने कितना विकास किया है दरअसल वो गन्दगी को बिना साफ़ किये जहर से इन्फेक्शन नियंत्रण करना चाहते हैं जो की सिद्धांतत: गलत है और उसका अंत आखिर में हार के रूप में ही मिलना है तो भारत पर इसका आरोप डाल कर पश्चिम जगत अपनी इलाज़पद्दति की हार को सदा नहीं छुपा पायेगा ।
तब तक आइये स्वच्छ भारत अभियान की शुरुआत अपने शरीर की मलशुद्धि के साथ शुरू करते हैं और दिखा देते हैं पश्चिम जगत को की एंटीबायोटिक के फ़ैल होने से हम नहीं मरने वाले उनको जीवित रहना है तो हमारी शरण में आना ही होगा ।
सर्वाणाम रोगणाम कारणं कुपित मलं ।


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