Shuddh Aahar

Shuddh Aahar ShuddhAahar is designed to provide the best quality organic foods and products to our customers..

21/02/2025

'
कृपया पूरा सुनिए ~

इतनी सुंदर
और इतनी व्यवस्थित
"नर्मदा माता" के बारे में जानकारी..🌷
भले ही जीवन के कई वर्ष हो गए हैं
नर्मदा तट पर रहते रहते लेकिन
यह जानकारी बिल्कुल भी नहीं थी..🌸

ख़ैरिगढ़ हमारी स्थानीय गो नस्ल है। इनको संरक्षित करना हमारा नैतिक दायित्व है। इसके लिए सबसे पहले खैरीगढ़ को करेक्ट्राइज व स...
05/06/2023

ख़ैरिगढ़ हमारी स्थानीय गो नस्ल है। इनको संरक्षित करना हमारा नैतिक दायित्व है। इसके लिए सबसे पहले खैरीगढ़ को करेक्ट्राइज व स्टैंडराइज करना पड़ेगा। इस कार्य की जिम्मेवारी भारत में " नेशनल ब्योरो ऑफ एनिमल जैनेटिक रिसोर्स" नामक वैज्ञानिक संस्था पर है।

इनकी जिम्मेवारी है कि भारत के जीवों की जैनेटिक शुद्धता को संरक्षित रखे, उनके गुण धर्मों को को उजागर करें।

इसीलिए ये प्रश्न लिए कि " खैरीगढ़ जो किसान के घर 1.5- 2 लीटर दूध देती है क्या वह 4-5 लीटर तक दे सकती है, क्या?" मैं यहाँ आ पहुँचा हूँ।

खैरीगढ़ के शुद्ध नर की तलाश मैं पिछले 6 वर्ष से कर रहा हूँ।

देखते है कि क्या होता है, आज यहाँ मुलाकाते होनी हैं।

सच में।
12/01/2023

सच में।

Shuddh Aahar Organics
23/12/2022

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23/12/2022

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Shuddh Certified Products will build your HEALTH
22/12/2020

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05/08/2020

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"यह रागी हुई अभागी क्यों?"यह 'रागी' हुई अभागी क्यों?चावल की किस्मत जागी क्यों?जो 'ज्वार' जमी जन-मानस में,गेहूँ के डर से ...
04/08/2020

"यह रागी हुई अभागी क्यों?"

यह 'रागी' हुई अभागी क्यों?
चावल की किस्मत जागी क्यों?
जो 'ज्वार' जमी जन-मानस में,
गेहूँ के डर से भागी क्यों?

यूँ होता श्वेत 'झंगोरा' है।
यह धान सरीखा गोरा है।
पर यह भी हारा गेहूँ से,
जिसका हर कहीं ढिंढ़ोरा है!

जाने कितने थे अन्न यहाँ?
एक-दूजे से प्रसन्न यहाँ।
जब आया दौर सफेदी का,
हो गए मगर सब खिन्न यहाँ।

अब कहाँ वो 'कोदो'-'कुटकी' है?
'साँवाँ' की काया भटकी है।
संन्यासी हुआ 'बाजरा' अब,
गुम हुई 'काँगणी' छुटकी है।

अब जिसका रंग सुनहरा है।
सब तरफ उन्हीं का पहरा है।
अब कौन सुने मटमैलों की,
गेहूँ का साया गहरा है।

यह देता सबसे कम पोषण।
और करता है ज्यादा शोषण।
तोहफे में दिए रसायन अर
माटी-पानी का अवशोषण।

यह गेहूँ धनिया-सेठ बना।
उपभोगी मोटा पेट बना।
जो हज़म नहीं कर पाए हैं,
उनकी चमड़ी का फेट बना।

अब आएँगे दिन 'रागी' के।
उस 'कुरी', 'बटी', बैरागी के।
जब 'राजगिरा' फिर आएगा
और ताज गिरें बड़भागी के।

जब हमला हो 'हमलाई' का।
छँट जाए भरम मलाई का।
चीनी पर भारी 'चीना' हो,
टूटेगा बंध कलाई का।

बीतेगा दौर गुलामी

02/08/2020

रोग 3 प्रकार के होते हैं -
1- संक्रामक(infection)
2- जरा(chronic)
3- आनुवंशिक(genetic)
आजकल कोरोना का कहर है जो कि एक संक्रामक रोग है इस लिए इसके बारे में जाने मेरी एक पुरानी पोस्ट से -

Super bug षड्यंत्र :
हाल ही में एक अमेरिकन स्त्री की मृत्यु एक ऐसे जीवाणु के संक्रमण से हो गयी जिस पर अब तक ज्ञात सभी ऐंटीबायोटिक बेअसर साबित हुए उसके अंदर मौजूद निमोनिया के जीवाणु ने एक जीन विकसित कर लिया जिसके कारण उस पर सभी एंटीबीओटिक फेल हो गयी उस महिला का इलाज़ भारत में हुआ था इस लिए उस जीवाणु(सुपर बग नाम न्यू दिल्ली म्युटेलो वायरस) की उत्पत्ति भारत से मानी गयी और कारण भारत में सभी एंटीबीओटिक के अत्यधिक प्रयोग को माना गया ।
ये क्या हुआ इसको समझने के लिए प्रकर्ति के सामान्य सिद्धांत को समझ लेते हैं जहाँ कहीं भी आहार होगा उसको पंचतत्वों (अग्नि,वायु, जल , भूमि, आकाश) में विलीन करने के लिए चारों और से माइक्रोब्स(जीवाणु) सक्रीय हो जाएंगे और तब तक कार्य करेंगे जब तक विलीनीकरण की क्रिया सम्पूर्ण नहीं हो जाती । उदहारण के लिए यदि हम एक हंडिया में मल भरकर रख देते हैं तो उसमें जीवाणु और कीड़े पैदा हो जाएंगे और तेजी से उसको मिटटी में बदलने का कार्य करने लगेंगे अब यदि प्रक्रिया के बीच में हम उसमे गमैक्ससीन नामक जहर डाल दें तो जीवाणु मर जायेंगे किन्तु प्रक्रिया अधूरी रहने की वजह से जीवाणु गमैक्ससीन से प्रतिरोध पैदा करके फिर सक्रीय होंगे और अब गमैक्सीन जहर से नहीं मरेंगे अब उनको मारने के लिए अगली पीढ़ी का ज्यादा शक्तिशाली जहर चाहिए जैसे एंडोसल्फान आदि लेकिन जीवाणु तब तक प्रतिरोध पैदा करके वापसी करता रहेगा जब तक मल का मिटटी में रूपांतरण न कर ले । यही होता है शरीर में जब हमारा शरीर मल से भर जाता है कब्ज और कफ के रूप में । और शरीर की प्रतिरक्षा प्रणाली जब मल बाहर फेंकने के लिए दस्त व जुखाम शुरू करती है (इनको आयुर्वेद में मित्र रोग कहां जाता है) तो एलोपैथिक डॉक्टर उसको रोग कह कर दवाई देकर रोक देते हैं और एंटीबायोटिक नामक जहर से जीवाणु (इन्फेक्शन) को मार देते हैं परंतु शरीर की मल फैंकने की क्षमता को नहीं बढ़ाते । इस लिए इन्फेक्शन बार बार रिपीट करता है और हर बार ज्यादा शक्तिशाली की जरूरत पड़ती है ऐसा भी होता है जब वो मल और इन्फेक्शन अंतरंग अंगों को फैल करने लगते हैं (सेप्टीसीमिया)WHO ने 2019 तक सभी एंटीबायोटिक के जीवाणुओं पर बेअसर होने की भविष्यवाणी की है ।

नोट : उम्र के साथ मल की मात्रा शरीर मे बढ़ती है यही कारण है वायरस अधिक उम्र के लोगों को प्रभावित कर रहा है ।

क्या है :

आयुर्वेद में ऐसे मरीज़ जिन पर दवाइयों का असर समाप्त हो जाता है उनको पंचकर्म(उलटी,दस्त,पसीना,तेल मालिश,वस्ति) द्वारा शरीर के मल निकाल दिए जाते हैं तो औषधि उन पर पुनः कार्य करने लगती है ।

यही कार्य योग में शंखप्रक्षालन की क्रिया द्वारा किया जाता है जिसमे गर्म पानी सेंधा नमक व् नींबू दाल कर पिया जाता है व विशेष आसान किये जाते हैं जिससे दस्त शुरू हो जाते हैं ये तब तक किया जाता है जब तक पानी पीकर पानी ही बाहर न आने लगे ।

कफ निकालने के लिए जल नेति एवं कुंज्जर क्रिया (पानी पीकर उलटी करना) का अभ्यास किया जाता है जिससे नज़ला जुखाम दमा निमोनिया आदि का जड़ से निदान हो जाता है और वो दुबारा नहीं होते ।

ऊपर दिए उदाहराण से स्पष्ट है कि एलोपेथी ने कितना विकास किया है दरअसल वो गन्दगी को बिना साफ़ किये जहर से इन्फेक्शन नियंत्रण करना चाहते हैं जो की सिद्धांतत: गलत है और उसका अंत आखिर में हार के रूप में ही मिलना है तो भारत पर इसका आरोप डाल कर पश्चिम जगत अपनी इलाज़पद्दति की हार को सदा नहीं छुपा पायेगा ।
तब तक आइये स्वच्छ भारत अभियान की शुरुआत अपने शरीर की मलशुद्धि के साथ शुरू करते हैं और दिखा देते हैं पश्चिम जगत को की एंटीबायोटिक के फ़ैल होने से हम नहीं मरने वाले उनको जीवित रहना है तो हमारी शरण में आना ही होगा ।
सर्वाणाम रोगणाम कारणं कुपित मलं ।


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