11/05/2026
कानपुर की यात्रा मेरे लिए केवल एक परीक्षा देने की यात्रा नहीं थी, बल्कि यह एक ऐसा अनुभव बन गई जिसने गुरु, मित्र और शिष्य के रिश्तों की गहराई को मेरे हृदय में और भी मजबूत कर दिया।
मैं घर से निकला तो मन में केवल एक ही विचार था—पीजीटी का पेपर देना है। मन थोड़ा उदास भी था क्योंकि न कोई साथी था और न कोई हमसफर। बार-बार यही सोच रहा था कि अकेले जाना है, अकेले रुकना है और फिर वापस घर लौट आना है। लेकिन शायद ईश्वर ने उस यात्रा को कुछ खास बनाने की योजना पहले से ही बना रखी थी।
चलते-चलते जब मैं महमूदाबाद स्टेशन के पास बस स्टॉप पर पहुंचा तो वहां मेरे परम आदरणीय गुरुजी नरेंद्र वर्मा सर जी से मुलाकात हो गई। थोड़ी ही देर में दूसरे गुरुजी भवानी शंकर तिवारी जी भी वहां आ गए। अपने गुरुजनों को देखकर मन प्रसन्न हो उठा। मैंने दोनों गुरुजनों का आशीर्वाद लिया। फिर गुरु और शिष्य के बीच बातें शुरू हो गईं। शिक्षा, जीवन और पुराने दिनों की यादों के बीच समय कब बीत गया, पता ही नहीं चला।
हम तीनों लोग बस में सवार होकर कानपुर की ओर निकल पड़े। रास्ते भर बातचीत और अनुभवों का सिलसिला चलता रहा। जब हम लखनऊ पहुंचे तो वहां बस बदलनी पड़ी। आलमबाग पहुंचकर जैसे ही दूसरी बस में बैठे, तभी अचानक मेरे साथ पढ़ने वाले आरिफ भाई से मुलाकात हो गई। उनके साथ उनके दो मित्र भी थे। कुछ ही देर में ऐसा लगा जैसे वर्षों पुरानी दोस्ती फिर से जीवंत हो उठी हो।
हम दोनों पुराने दिनों की बातें करने लगे—वो पढ़ाई का समय, हंसी-मजाक, संघर्ष और सपनों की बातें। काफी समय बाद हुई यह मुलाकात मन को एक अलग ही खुशी दे रही थी। अब यात्रा में अकेलापन बिल्कुल खत्म हो चुका था। गुरुजन साथ थे, मित्र साथ थे और यादों का कारवां भी साथ चल पड़ा था।
धीरे-धीरे रात होने लगी। कानपुर पहुंचने का समय करीब आ रहा था। मन में अनेक प्रश्न उठ रहे थे—रात कहां रुकेंगे? सुबह परीक्षा केंद्र कैसे ढूंढेंगे? क्या व्यवस्था होगी? लेकिन शायद ऊपर वाला हर मोड़ पर मेरे लिए कोई नई खुशी तैयार कर रहा था।
जैसे ही हम बस से उतरे, तभी अचानक मेरे द्वारा पढ़ाया गया विद्यार्थी विपिन वर्मा सामने आ गया, जो आज उत्तर प्रदेश पुलिस में सेव कर रहा है। मुझे देखते ही वह भावुक हो उठा और बोला—
“गुरुजी, बहुत दिनों बाद आज मुलाकात हुई है, अब आप हमारे साथ चलिए।”
उसकी बात सुनकर मेरा हृदय गर्व और भावनाओं से भर गया। एक शिक्षक के लिए इससे बड़ी खुशी क्या हो सकती है कि उसका शिष्य आज एक जिम्मेदार पद पर रहकर सम्मान के साथ अपने गुरु को अपने साथ ले जाने का आग्रह कर रहा था।
विपिन हमें अपने कमरे पर ले गया। वहां उसने जिस आत्मीयता से नाश्ते और रहने की व्यवस्था की, वह सच में अविस्मरणीय थी। उसकी सेवा, उसका सम्मान और उसका अपनापन देखकर मन भावुक हो उठा। उसने इतनी अच्छी व्यवस्था की थी कि मैंने कभी कल्पना भी नहीं की थी।
उस रात मुझे ऐसा महसूस हुआ कि शिक्षक का जीवन वास्तव में सबसे धन्य जीवन होता है। धन-दौलत से बड़ी कमाई वह सम्मान है जो एक शिष्य अपने गुरु को देता है। विपिन का वह स्नेह, उसका आदर और उसकी सेवा मेरे हृदय में हमेशा के लिए अमिट याद बन गई।
उस यात्रा ने मुझे यह सिखाया कि जीवन में इंसान अकेला कभी नहीं होता। रास्तों में कभी गुरु मिल जाते हैं, कभी पुराने मित्र और कभी अपने ही शिष्य जीवन की सबसे बड़ी ताकत बनकर सामने खड़े हो जाते हैं।
" रामनिवास राजपूत (लोधी)"