26/02/2025
हिस्ट्री देवता ग्रहणेश्वर महाराज शिला घुण्ड
देवता के निवास के कारण स्थान का नाम करण हुआ 'देवठी' देवठीं इस गांव के बिल्कुल पास में जहां दैवता ग्रहणेश्वर के नाम से सुन्दर विचित्र पत्थरों से निर्मित, मठ (देवता का प्रतीक छोटा मन्दिर (देऊरा) साथ में पूर्व दिशा की ओर दो मंजिल का बंगला व एक दिशा में महिलाओं के बैठने की असंख्य पैडियां और दूसरी ओर पुरूषों की कुछ पैड़ियों का निर्माण सुन्दर सीमेन्ट से किया गया है। इन सब के मध्य में स्थित है एक देवाङ्गण जहां प्रतिवर्ष 15 और 16 अगस्त को एक स्थानीय मेले का आयोजन बड़ी धूम-धाम से होता है। यह स्थान शिमला - रोहडू सड़क में बसे भूई स्टेशन से खड़ी चढ़ाई में लगभग एक किलोमीटर की दूरी पर पड़ता है।
इस मेलें को स्थानीय भाषा में 'रहैली' या 'शिलू री रहैली' के नाम से पुकारा जाता है।
'शिलू' शब्द की परिभाषा शिला धूण्ड इलाके से है। शिला धूण्ड को बारह वीश की मान्यता प्राप्त है। ग्राम पंचायत बगैण तह. ठियोग जिला शिमला हि.प्र. में बसा हुआ है यह शिला धूण्ड ।
'रहैली' शब्द माला नृत्य को कहते है अर्थात इस मेले में मालानृत्य करते हुए बच्चे बूढ़े और जवान खूब आनन्दोत्सव मनाते है। माला नृत्य ही नहीं ठोठा खेल (धनुष बाण से खेला जाने वाला खेल) तथा स्थानीय पाठशालाओं के बच्चे भी सहर्ष सांस्कृतिक कार्यक्रम प्रस्तुत करते है।
यह कि पूर्व काल में यह मेला इसी परगने में बसे रखाहर गांव के समीप धार में रचाया जाता था देवठीधार शिला धूण्ड का मध्य केन्द्र है अतः इसी कारण अब यह मेला यहां मनाया जाता है।
दूर-दूर से कई हजारों की संख्या में मेला दर्शक प्रेमियों का तांता लगा रहता है । 14 अगस्त को ठोठे की पार्टियां एवं मेहमान लोग पहुंच कर शिला धूण्ड के दोनों परगने में मेहमानी का ऑनन्द उठाते है।
मेला कमेटी द्वारा असंख्य दुकानें ठेके पर खोल दी जाती है। 15 अगस्त का यह आजादी दिवस पूरे भारत मे बड़े हर्षोल्लास से मनाया जाता है इसी खुशी के साथ यहा की जनता इसे 'रहेली' मेले को अपने देवता की याद में मनाते है, क्योंकि 16 या 17 अगस्त को भाद्रपद मास की संक्रांति होली है इसी सक्रांति के शुभ पर्व पर मेले का समापन्न हो जाता है।
मेले के शुभारम्भ में देव मन्दिर से बाजे गाजे के साथ ग्रहेणश्वर महादेव की छड़ी को लाया जाता है। लोग बड़ी श्रद्धा से देवता को फूल पान की भेंट समर्पित करते है। तथा देवता ग्रहणेश्वर से अपने सुखी जीवन की कामना का शुभाशीर्वाद ग्रहण करते है।
देवता ग्रहेणश्वर की उत्पति के संदर्भ में दंत कथा है कि किसी समय पूर्व दसाना (शिमला धूण्ड) के किसी ब्राह्माण ने इसे गिरी गंगा से ग्रहण किया व गिरी गंगा से उत्पति होने के कारण इसका नाम ग्रहणेश्वर पड़ा ।
गिरी गंगा पार कोटखाई तहसील में पजौल नाम गांव में कोटी मड़ोली देवता का मन्दिर है, जो कौलू देवता के नाम से विख्यात है। दसाना गांव से बाह्मण प्रतिदिन तैर कर गिरी गंगा पार करता हुआ देवता की पूजा करने जाया करता था होनी बड़ी प्रबल होती है। एक दिन जब वह नदी पार कर रहा था तो लगातार मायारूपी देवता के तीन कलश (चरू) जिसे स्थानीय भाषा में कमोली कहते है, नदी में बहते नजर आये । पुजारी ने पहला कलश पकड़ने की कोशिश की वह छूट गया दूसरा कलश
भी छूट गया, तीसरा कलश उसने पकड़ लिया। और उसे लेकर वह पजौल मन्दिर पूजा करने निकल पड़ा। उस कलश को वह ब्रह्माण झाड़ी में छुपाना चाहता था तो किसी एक पंजौली निवासी ने उसे छुपाते हुए देख लिया वह उसे इसलिए छुपाना चाहता था किं पूजा के बाद उसे घर ले जाउंगा जिससे इसे कोई देख न ले, हुआ वही वह पजौली निवासी राजपूत भी इसका हक दार बन गया ।
वह जो पहला कलश आगे गया वह पटरोग (धमान्दरी) तथा दूसरा पराला (देवठी) में विद्यामान है। ये तीनों धर्म भाई माने जाते है। एक साथ गिरी गंगा से उत्पति होने के कारण जनता उन्हें धर्म भाई चारे की मान्यता देते है।
अभी तक उन्होंने वह कलश नहीं खोला, वे मन ही मन प्रसन्न थे, सोच रहे थे इसमे बहुत माया है। दस्तना गांव के समीप टकराऊ नामक जगह पर पहुंच कर वे इस कलश को खोल कर देखने लगे कलश खोलते ही उसमें से बहुत बड़ा सांप निकला वे दोनों डर गये, सांप निकल कर उस बहुत बड़ी चट्टान में चला गया। टकराऊ जगह बहुत बड़ी पत्थर की चट्टान है ऊंची खड़ी लंबी चट्टान है जिसमें देव शक्ति रूपी चट्टान, शिव शक्ति सर्प का वास है। अभी भी लोग शिखर पर चढ़ कर झण्डा चढ़ाते है। पूजा करते है, देवता महाराज का अप्रत्यक्ष रूप मानते है ।
डरते-2 उन दोनों ने पुनः कलश को देखा उसमें मूर्ति विद्यमान थी। पजौली निवासी जो उसमें हकदारी था, उसने उस मूर्ति और कलश को उस ब्रह्मण को दे दिया और कहा, कि यह मेरे किस काम की परन्तु देवता कहां छोड़ते है पजौली भी उसका काजी बन गया ।
दसाना निवासी ब्राह्मण इस कलश को अपने घर ले गया। अपनी धर्म पत्नी को कहते हुए, उसने इसे लकड़ी की सन्दूक में बन्द कर दिया।
उसने पत्नी को कहा, कि इसे मत छना और स्वयं पूजा करने पजौल निकल पड़ा ।
ब्राह्मण पत्नी को शक हुआ, इसमें क्या रहस्य है, जरूर कुछ न कुछ इसमे विद्यमान है क्यों न इसे देख लू, पतिदेव को क्या पता चलेगा कि मैनें कलश भी खोला है।
ब्राह्मणी ने दरवाजा अच्छी तरह बन्द किया और सन्दूक खोल दी, कलश बाहर निकाल का उसका ढक्कन खोला ही थी कि असंख्य मधु मक्खियां मडंराती - भिन्नभिन्नाती बुरी तरह टूट-2 कर ब्राह्मणी पर आक्रमण करने लगी ।
देवता की मूर्ति होने के कारण उसको स्त्री द्वारा छूना निषेद्य था, तभी ब्राह्मण ने उसे छूने से मना किया था। परन्तु स्त्री हठ, तुरन्त मक्खियों से बचने के लिए वह इधर उधर भटकने लगी, उसके हाथ में दूध का घड़ा लगा, उसने वह दूध भरा पात्र उस कलश के उपर गिरा दिया। दूध से उसकी शुद्धि हो गई मक्खियां लोप हो गई दूध के गिरने से देवता दूधाधारी बन गए। यही कारण है कि देवता ग्रहणेश्वर दूधाद्यारी है, उसको कोई बली नही लगती ।
शास्त्र एंव देशाचार के अनुसार जब भी कभी नये मकान व मन्दिर तथा मूर्ति इत्यादि का निर्माण होता है तो बकरे की बली देते है ब्राह्मण इस मूर्ति की प्रतिष्ठा के लिए बकरे का प्रबन्ध करके घर पहुंचा । घर में पत्नी से प्रत्यक्ष दृष्टान्त सुन- कर वह हैरान रहा उसने बकरे की बली नही दी आज जब कभी अनुष्ठान आदि इस मन्दिर में सम्पन्न होते है तो गरी के गोले की बली दी जाती है तथा दूध की धारा मूर्ति पर चढ़ाई जाती है।
आदिकाल में एक समय देवता केदार नाथ की यात्रा के लिए ग्यारह व्यक्तियों का समूह निकला था। पूर्व समय यात्रा करना अति कठिन कार्य होता था, पैदल यात्रा करते हुए, मार्ग में कई प्रकार का भय, बिमारी, लूट - चोरी इत्यादि की घटनायें घटती रहती थी। यह कि, शिला के इस देवता के साथ भी यही घटना घटी, सारे यात्री मृत्यु को प्राप्त हो चुके थे। देवता महाराज की मूर्ति जोशी मठ (हेलग) के पास एक साधु महात्मा को मिली। शिला धूण्ड की प्रजा को इस दुर्घटना का अति दुःख था। उन्होंने नई मूर्ति का निर्माण कर दिया। देवता की शक्ति का करिश्मा यह है कि यह साधु महात्मा, यहां शिला धूण्ड पहुंचा, यहां की प्रजा ने अपना देवता पहचान दिया। यह साधु महात्मा अणु (कोटखाई) गांव के निवासी है। ये इस देवता के काजी है। उसने देवता को शिला वाले को दे दिया। अब भी जब कभी देवता महाराज तीर्थ यात्रा में जाते है तो इन्हे मार्ग दर्शक एवं सूचना इत्यादि का कार्य सहर्ष भाव पूर्वक करना पड़ता है ।
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पजौल में डूमेश्वर कुठाण तथा शिला धूण्ड में चिखडेश्वर देव कुलेष्ट थे । भाट ब्राह्मण के इस कुल देवता की शाक्ति का वर्णन किया जा रहा है कि वह शिला धूण्ड के देवता कैसा बना ?
डमयाणा नामक गांव में एक दुहिता अपने पिता के घर में निवास करती थी उसकी एक कन्या थी किसी शरारत में वह एक दिन शाम संध्या के उपरांत अंधेरी रात्रि में रोने लगी। माता श्री ने उसे बहुत समझाया परन्तु उसने रोना बन्द नही किया, उसके सिर पर काल मंडरा रहा था। क्रोध में आकर उसने अपनी बेटी को सबक सिखाने के लिए कुछ देर के लिए घर से बाहर फेंक दिया और दरवाजा बंद कर दिया, वह कन्या बाहर रोती रही, डाँकनी ने उसे उठा कर खा लिया, डमयाणा के इस गांव में सात जगह में अभी भी पाप की स्थापना है। जहां उसका डाकनी ने सर्व प्रथम सिर खाकर फैका दूसरी जगह बाजू, तीसरे स्थान पर पैर क्षत-विक्षत
करके फेंके कन्या कहां थी उस डॉकनी के पेट में? रोने के शब्द कहां से सुनाई देते। मां ने दरवाजा खोला कन्या को न पाकर उसके रोगटें खड़े हो गये नंगे पैर वह आवाजें देती हई चारो ओर खोजने निकली जब उसे पहले स्थान पर खून से लतपत अपनी प्राण प्यारी बेटी का सिर मिला. उसके होश उड़ गये बेटी कि इस प्राण हत्या की दोषी मां रोती-बिलखती चारों और भागने लगी, वह अपना सन्तुलन खो बैठी, पागल मन वह घर लौटी और घर से रस्सी लेकर उसके बेटी के सिर के स्थान पर आत्म हत्या कने का निश्चय किया। कन्या के इस पाप से दुःखी मन होकर, उसका यह तुरन्त निर्णय अत्यन्त दुखदायह था उसने लम्बे वृक्ष पर रस्सी बान्ध दी और फन्दा डालकर, अपनी भी इस लीला समाप्त कर डाली ।
कहानी आगे को बढ़ चली, नासिकेत पुराण के अनुसार आत्म हत्या करने वाला प्रेतयोनि में जाता है। प्रेतात्मा और पापात्मा का प्रभाव पूरी इलाके में व्याप्त हो गया, वह प्रेत लोगों को बहुत डराता, जगह - 2 में भूत बन कर भयभीत करता, इस प्रेत ने यहां की वंशवृद्धि को भी कुप्रभावित कर डाला। यहां कि जनता ने बड़ा उपाय किया पण्डितों के पास जाकर इस प्रेत- प्रभाव को शांत करने के उपाय पूछे परन्तु कोई भी लाभ नही हुआ। कुलेष्ट डूमेश्वर कुठाण तथा चिखड़ेश्वर से यहां की जनता उनकी शरण मे जाकर निवेदन करती रही परन्तु चिखड़ेश्वर देव ने भी पूरा जोर लगाया वे भी इस भूत बाधा का परिहार करने में असमर्थ रहे ।
अन्तत' किसी सज्जन महानुभाव ने कहा ? क्यों न दसाना के देवता से पूछे? हो सके शायद इसका समाधान कर दे, कुछेक कहने लगे, जब अपने कुल पुरोहित पण्डित तथा कुलेष्ट इसका समाधन न करे सके तो दसाना का देवता भी क्या कर देगा? परन्तु नही, होनी बड़ी प्रबल होती है। डमयाणा बगैण निवासी दसाना गये, देवता ने कहा? मैं इसका परिहार करूंगा, परन्तु मुझे इनाम देना पडेगा। मैं इस भूत बाधा का अवश्य कुछ न कुछ समाधान कर लूंगा। वगैण निवासी ने कहा मैं साक्षी रहा, यदि आपने यह काम कर दिया, तो आपको खुश करके रहूंगा ।
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इसी कारण बगैण निवासी ज्येष्ठ खान-दान का अभी तक इस देवता का बजीर है। क्योंकि वे देवता के मध्य साक्षी रहा।
बगैण इस गांव में देवता की ठौड़ है। कहावत है कि जब नई ठौड़ बनती है तो आदमी के सिर जीत कर व काट कर लाये जाते थे और ठौड़ के दबाये जाते थे यह ठौड़ ठीक बगैण के नाम से विख्यात है। ठौड शब्द में राजपूतो की शक्ति का वास होता है इसमें सभी देवताओं का निवास भी माना जाता है।
देवता ने अपनी पूर्ण शक्ति से पाप को पुकारा डर के मारे, पाप कांपता हआ देवता की शरण में आया और विलख - विलख कर अपनी मुक्ति की प्रार्थना करने लगा। देवता ने उसे मुक्त किया और डमयाणा इस गांव में लगभग सात स्थान में चौरें अर्थात् स्थान देकर पाप को स्थापित कर दिया ।
यहां की जनता भय मुक्त हुई अब बारी आई इनाम देने की इसमें देवता का साक्षी चन्देल वंशज सतेईक खानदान ने देवता को जो वचन दिये थे उसे पूरा करने के लिए अपने कुलेष्ट चिखडेश्वर के पास जा कर कहा, आप तो हार गये, देवता दसाना का जीता गया उसने पाप को शांत किया यह कार्य पूरा किया, 'अब इसे क्या इनाम दे देवता चिखडेश्वर ने शिलाधूण्ड की सारी जागीर दसाना के देवता के नाम कर दी केवल याद के लिए अपने पास रैणा नामक गांव रखा वह आते तो इसी देवता के अधीन परन्तु उनका कुलेष्ट चिखडेश्वर ही है। देवता ने अपनी याद के लिए भेट स्वरूप (पाऊड़) देकर चिखडेश्वर देव को यह गांव दे दिया।
पजौल गांव भी पूर्व काल में डूमेश्वर देवता के अधीन था अब वह देवठी ग्रहणेश्वर को अपना कुलेष्ट मानते है। कार
देवता महाराज सामूहिक रूप से पाऊणचारी (मेहमानी समफलो) के लिए डमयाणा, वगैण, पजौल, दसाना वनाहल तथा खाहर इन छ: गांवों में क्रमशः जाया करते है। लोग इन्हें अपनी इच्छानुसार अपने घर भी ले जाते है।
यह बात कितनी सत्य होगी कि पूर्वज कहते है कि अपनी शक्ति के प्रभाव से टकराऊ (दसाना) स्थान से देवठी की दूरी तक चिंटियों की एक लम्बी लाईन लग गई। चिंटियों की लम्बी लाईन लगभग 2 किलोमीटर की दूरी तक थी जिसका आदि टकराऊ स्थान तथा अन्त देवठी थी। इसी कारण यहां की प्रजा ने इस स्थान को मध्य केन्द्र माना और मन्दिर का निर्माण कर दिया ।
मन्दिर का निर्माण कार्य चौहाल के बढ़ेई द्वारा किया गया। यह मन्दिर इतना विचित्र एवं सुन्दर है कि इसकी जितनी उपमा की जाये उतनी कम है। लकड़ियों में मूर्तियों की रचना का अनुमान लगाना कठिन हे कि इसे बनाने में कितना समय लगा होगा ।
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मन्दिर में पत्थरों का निर्माण कार्य अत्यन्त सराहनीय है। लगभग दस फुट हि लम्बे चौड़े पत्थर मन्दिर की शोभा को चार-चांद लगाते है। बड़ी हैरानी होती है, इन्हें देखकर इतने बड़े पत्त्थरों को मन्दिर में कैसे लाया एवं लगाया गया यह जनता की आस्था, भक्ति, परिश्रम एवं बहादुरी का प्रतीक है।
प्राचीन स्थानीय भाषा में कहो या देव भाषा में कहो, जब देवता की पूजा की जाती है तो मन में बड़ी शान्ति एवं आनन्द की अनुभूति होती है।
जैसे मुख्य पूजा मंत्र निम्न प्रकार से है दीपक जलते समय
शेहण कलशे सोवरदान, अनेक दीवा वले, विघ्न टले, कालिका वाहन रक्षा करे। दीवे की ज्योत जली का भारा, सती नगर सरा। शेहण कलशे
सोवरदान.
स्नान जीधाम
हर गंगा, नाहण गंग, वाहण गंगा जले गंगा, थले विष्णु, गंगा बड़ी गोदवारी तीर्थ बड़ा केदार, छाला पड़े समुन्द्र की, पाप कटे हरिद्वार, गया पड़े बनासरी, नीलकण्ठ नेपाल श्री सोमनाथ हर हर गंगा, नाहण गंगा
तिलक ब्राह्मण रे हाथे, देवते रे माथे ।
जितनी देवते रे तिलक चढ़े, तेतिणी देवरी कला चढ़े ।
पूजा - देवता ग्रहणेश्वर शिव रूप हैं, मूल रूप से नागों की भी पूजा की जाती है, जिसमें आवला र देवों, मंगलेश्वर देवों, शिव देवों, शिरगुल देवो देवो शंकर द्वारे,
दसाना गांव के भाट ब्राह्मण लेदईक, रधेइक तथा हरदेईक खानादान के पुजारी एवं देवें अर्थात माली है।
देव कुल पुरोहित शलौहा से आयें कैहराली निवासी ज्येष्ठ खानदान के पण्डित द्वारा देवता का मुहूर्त मान तथा बड़ा देव कार्य जागरा- शांद आदि देवठी के पण्डितों के सहयोग से विधिवत् सम्पन्न होता है।
बनाहल और खाहर गांव के क्रमश इस देवता के भण्डारी के पद पर पांच-5 वर्षों के लिए नियुक्त होते है।
देवता ग्रहेणश्वर के भण्डार में कोई कमी नही यह तो शिव का भण्डार है जो सच्चे मन से इस मन्दिर में आकर चरण वन्दना करता है । देवता ग्रहणेश्वर उसकी प्रार्थना ग्रहण करते है। औऔर सुखमय जीवन जीने का शुभाशीर्वाद प्रदान करते है।