02/02/2026
यमुना जी की शीतल हवाओं और ब्रज की रज में सने तीन साधु अपनी मस्ती में चले जा रहे थे। तीनों विरक्त संत थे, जो केवल हरि नाम के सहारे यात्रा कर रहे थे। उनमें से एक साधु वृद्ध थे, शरीर अब जवाब दे रहा था।
जब वे एक गाँव के समीप पहुँचे, तो वृद्ध साधु ने स्नेहपूर्वक अपने युवा साथियों से कहा, "भाइयो, अब यह शरीर और चलने की अनुमति नहीं देता। मैं यहीं गाँव के बाहर इस मन्दिर में आसन जमाता हूँ। तुम दोनों युवा हो, तुम आगे की यात्रा करो।"
गुरुतुल्य वृद्ध संत की आज्ञा पाकर दोनों युवा साधु आगे बढ़ गए।
चलते-चलते गोधूलि बेला (संध्या) हो गई। आकाश में लालिमा छा गई थी और सामने ही 'बरसाना' धाम दिखाई देने लगा। बरसाना यानी करुणा की साक्षात मूर्ति, श्री राधारानी जी का गाँव!
दोनों साधुओं ने आपस में चर्चा की, "बरसाना आ गया है, पर अब रात्रि हो रही है। भिक्षा के लिए कहाँ जाएँगे? किससे माँगेंगे?"
तभी एक साधु के मन में एक अद्भुत, नटखट भाव आया। संतों की मौज ही अलग होती है। उसने हँसते हुए कहा, "अरे भाई! माँगना कैसा? हम तो राधारानी के गाँव जा रहे हैं, हम तो उनके मेहमान हुए न! अगर वो खिलाएंगी तो खा लेंगे, नहीं तो मन्दिर में आरती के समय जो भी थोड़ा-बहुत प्रसाद मिलेगा, उसे खाकर और यमुना जल पीकर सो जाएंगे।"
यह बात उन्होंने मज़ाक और मस्ती में कही थी, पर उनके भीतर कहीं न कहीं एक पूर्ण समर्पण था। वे बरसाना पहुँचे, मन्दिर में भव्य आरती के दर्शन किए। उस दिन मन्दिर में बड़ा उत्सव था, भारी भीड़ थी।
दर्शन के बाद साधुओं ने अपनी बात पक्की रखी, किसी से कुछ माँगा नहीं। "हम तो राधारानी के मेहमान हैं," यह सोचकर वे मन्दिर के एक कोने में भूखे पेट ही चादर ओढ़कर सो गए।
रात गहरा गई। घड़ी की सुइयां 11 बजा रही थीं। पूरा बरसाना सो रहा था, पर जगत की स्वामिनी जाग रही थीं।
अचानक मन्दिर के प्रधान पुजारी, जो गहरी नींद में थे, एक झटके से जागे। उन्हें एक दिव्य स्वप्न ने हिला दिया था। स्वप्न में साक्षात राधारानी ने उन्हें झकझोरा और उलाहना दिया:
> "अरे! तू यहाँ मजे से सो रहा है और मेरे मेहमान भूखे हैं?"
पुजारी जी हड़बड़ा गए, "मेहमान? कौन मेहमान सरकार?"
राधारानी ने स्पष्ट कहा, "वही दो साधु जो मन्दिर प्रांगण में सो रहे हैं। वे मेरे अतिथि हैं, उन्हें जाकर भोजन करा।"
पुजारी जी के तो होश फाख्ता हो गए। पसीना पोंछते हुए वे बिस्तर से कूदे और दौड़ते हुए मन्दिर प्रांगण में पहुँचे। उन्होंने देखा कि सचमुच दो साधु कोने में सिकुड़ कर सो रहे हैं।
पुजारी जी ने उन्हें झकझोर कर उठाया, "महाराज! उठिए! क्या आप ही राधारानी के मेहमान हैं?"
साधु हड़बड़ा कर उठे, "नहीं-नहीं बाबा, हम तो साधारण साधु हैं, ऐसे ही सो गए थे।"
पुजारी जी ने हाथ जोड़ लिए, "नहीं महाराज, आप साधारण नहीं हैं। स्वयं लाली जू (राधारानी) ने मुझे जगाया है आपके लिए। आप बैठिए, मैं अभी व्यवस्था करता हूँ।"
पुजारी जी ने तुरंत आसन बिछाए, हाथ-पैर धुलाए और मन्दिर का उत्तम से उत्तम प्रसाद—गरमा-गरम पूड़ियाँ, रसीली सब्जियाँ, खीर, मालपुए, लड्डू—सब पत्तलों में परोस दिया। साधुओं ने पेट भरकर, तृप्त होकर 'टनाटन' भोजन किया।
भोजन के बाद टहलते हुए साधुओं की आँखों में आँसू आ गए। वे गद्गद कंठ से बोले, "हे करणामयी! हमने तो मज़ाक में कहा था, पर तूने सचमुच हमारी लाज रख ली। तूने सच में हमें अपना मेहमान मान लिया माँ!"
राधारानी के इस वात्सल्य और प्रेम में डूबे हुए दोनों साधु फिर सो गए।
सोते ही दोनों को एक साथ, एक जैसा स्वप्न आया। स्वप्न भी कैसा? साक्षात 12 वर्ष की बालिका के रूप में श्रीजी (राधारानी) उनके सामने खड़ी थीं। मुख पर करोड़ों सूर्यों का तेज और वाणी में शहद सी मिठास।
बालिका रूप में राधारानी ने बड़े दुलार से पूछा, "साधु बाबा! भोजन तो कर लिया न? पेट भर गया? तृप्ति मिली?"
साधु (स्वप्न में): "हाँ मैया, बहुत आनंद आया।"
राधारानी: "भोजन और जल सब सुखद लगा न?"
साधु: "हाँ लाली, सब बहुत अच्छा था।"
राधारानी: "अब कोई और आवश्यकता तो नहीं है?"
साधु: "नहीं-नहीं मैया, अब क्या चाहिए, हम पूर्ण तृप्त हैं।"
तभी राधारानी तनिक मुस्कुराईं और बोलीं, "देखो, वो पुजारी मेरे आदेश से डर गया था। उसने हड़बड़ाहट में तुम्हें भोजन तो करा दिया, लेकिन मेरा 'पान-बीड़ा' (मुखवास) देना भूल गया। मेहमान नवाज़ी बिना पान के कैसे पूरी होगी? लो, मैं ये पान-बीड़ा तुम्हारे सिरहाने रख रही हूँ।"
स्वप्न में साधु देख रहे हैं कि राधारानी झुककर उनके सिरहाने पान रख रही हैं... और तभी उनकी आँख खुल गई।
दिल जोर-जोर से धड़क रहा था। क्या यह सिर्फ सपना था?
जैसे ही उन्होंने करवट ली और अपने सिरहाने देखा, तो उनके रोंगटे खड़े हो गए। उनकी आँखों से अविरल अश्रुधारा बह निकली।
सचमुच! उनके सिरहाने ताज़ा लगा हुआ 'पान-बीड़ा' रखा था!
हवा में एक अलौकिक सुगंध फैली थी जो इस धरा की नहीं थी। वह केवल स्वप्न नहीं था, वह करुणा की देवी का साक्षात आगमन था।
मज़ाक में कहे गए शब्दों को भी राधारानी ने इतना मान दिया कि न केवल भोजन कराया, बल्कि ताम्बूल सेवा (पान) देने स्वयं पधारीं।
मेरी राधा प्यारी की अहैतुकी कृपा का क्या कहना! वह भाव की भूखी हैं, उन्हें रीझते देर नहीं लगती।
जय जय श्री राधे! ❤️🙏🏼
लाडली लाल की जय! ❤️🙏🏼